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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता
भाव - बिन्दु
डॉ. दीप्ति गुप्ता

सुहाना सा मौसम,
उदासी भरा है
लगता है एकदम अकेला जिया है !

बादल का टुकड़ा
रूठा हुआ है
बारिश के जाने से
टूटा हुआ है !

संध्या क्यों
इतनी धुंधला रही है
दिन से बिछड़ कर
चली आ रही है !

झुग्गी के बच्चे,
मकानों के छज्जे
खामोश चुप,
वीराने से क्यों है ?

इन्हें गम है कैसा
कोई दुख है झेला
या बदले जमाने के
मारे हुए हैं ?


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