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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता
अभिलाषा
डॉ. दीप्ति गुप्ता

जगता जब दानव मानव में
रचता महाभारत साँसो में
रण ठनता बातों - बातों में

डाल पात सब डर जाते
सूरज चन्दा भी ढल जाते
पल में रौख सा रच जाता
एक भीषण नरक उभर आता
चीख पुकार, कहीं
चीर - हरण कहीं
बहनें करती मौत वरण
दुर्योधन के पड़े जहाँ चरण
वहाँ कहाँ मिले अपनों को शरण

सुन करुण पुकार और हाहाकार
तब धरती पर कृष्णा आता
ले साथ त्वरित हर अर्जुन को
रण न्याय का, लड़ता जाता
कर धराशायी कौरव को
कौरव से निर्मित रौरव को
पुनर्जीवित करता दलबल से
धूलधूसरित गौरव को
द्रौपदी को देकर अभय-दान
पग-पग पर ब्रज और मथुरा की
सुन्दर रचना करता जाता
रण न्याय का लड़ता जाता

पर होगा तब महाभारत बन्द नहीं
उभर-उभर कर आयेगा जब
ईर्ष्या, द्वेष, कपट और बैर
आँसू बन बह - बह जायेगा
शंका की कपटी लपटें जब
हर जन-मन में बुझ जायेगीं
तुझमें - उसमें इसमें - सबमें

तब वह पल भी आ जाएगा
जब एक भाव उमड़ायेगा
वह एक भाव, वह धवल भाव
कोमल सा निश्छल प्रेम-भाव
नहीं आना होगा, तब
तुम्हें धरती पर कृष्णा
पुनः-पुनः हम ग्वाल-बाल बन जायेगें
आँसू अमृत हो जायेगें

बोलों में फूल समायेगें
तुम कहो तो, हम सब खुद ही
कान्हा, कृष्णा बन जायेगें !!
कहते चलो बला टली
माने ईश्वर का एहसान

तब मैं हँसता उन पर
जी भर नहीं जानते वे सब
क्योंकर मैं ईश्वर के कहने पर ही
उन्हें चेताने आता हूँ
सुख सुमनों का बाग लगाकर
झट गायब हो जाता हूँ
मुझे पता है नहीं चाहते
मेरा वे तिल भर भी साथ

फिर भी मुझको आना पड़ता
और पकड़ना पड़ता हाथ
कि डूब न जाए अँधेरों में
हो न जाए वे बरबाद
बद अच्छा, बदनाम बुरा
इसका होता मुझको खेद
कितना दर्द मुझे होता है
उन आँखों में नफरत देख
              करने भला मैं आता हूँ
और बुरा बन जाता हूँ
दिल में गहरी चोट लिए
रोता - रोता जाता हूँ !!

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