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09.16.2007
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता
आत्मबल
डॉ. दीप्ति गुप्ता


दीपक की रौशनी में उजले हुए
अँधेरे धुँधलाए थे जो अब तक,
जगमग हुए वे चेहरे सहमे हुए थे जो मन,
डर से जो बुझ रहे थे विश्वास से झलकते,
उत्साह से भर गए वे
दीपक की रौशनी में ................

डगमगा रहे थे जो पग,
हर पल भटक रहे थे मंजिल की ओर उठते,
बढ़ते चले गए वे
दीपक की रौशनी में ................

बेजान से हुए सब,
एक बोझ से दबे थे बल से दमकती लौ के,
जीवन्त हो गए वे !
दीपक की रौशनी में .....................

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