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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता

शुभेच्छा
बालकवि बैरागी


 

मंथर गति से चलता एक व्यक्तित्व - एक जीवन !

कुलांचे भरते मनोभाव!

हर नजर में उभरते नये बिम्ब !!

लेखन की रजत- जयन्ती और काव्य प्रकाशन

का प्रथम सोपान !!!

डॉ. दीप्ति गुप्ता का यह पहला काव्य - संग्रह उनके पाठकों के हाथों में है। सन् 1980 से उन्होंने लिखना शुरू किया। पत्र-पत्रिकाओं में दिखाई देती रहीं, किन्तु अपनी ही रस रँगीं पंक्तियों और रचनाओं को इस रूप में वे स्वयं भी पहली बार देखकर-प्रथम रोमांच का अनुभव करके, नई दीप्ति से दीप्त, दीप्ति बन रहीं हैं। इस प्रकाशन के बाद जब उन्होंने पहली बार अपना दर्पण देखा होगा, तो शायद स्वयं को भी पहचान नहीं पाई होंगी ! ऐसा होता भी है और ऐसा होना भी चाहिए, हुआ भी यही होगा-बशर्ते कि दीप्ति अपनी रचनाओं की तरह ही सच बोलें ! उनकी कविताओं में समाया जिन्दगी का सच्चा और खरापन दिल को छूता है। अब अगली पुस्तक आने तक चाँद काला नहीं होगा। काला चाँद कविता का रूपहला उजाला हर पँक्ति के साथ दिल में उतरता चला जाता है।

यत्र तत्र दीप्ति को पढ़ना और एक साथ इतने पृष्ठों पर सुव्यव्यवस्थित-सुसम्पादित पढ़ना-देखना हमारा अतिरिक्त सुख है। बेशक अधिकांश कविताएँ छन्द मुक्त हैं, तब भी निरानन्द नहीं हैं। कई पूर्ण विरामों से पहले उन्होंने तुकान्तों का सहारा लेकर अपने को छन्द से जोड़ने का अनायास और सफल प्रयत्न किया है। पाठक को भी एक राहत लेने का पड़ाव चिन्हित कर दिया - काव्य कौशलके व्याकरण में यह प्रमुख उपादान माना जाता है।

सुखद बात यह है कि कंटकाकीर्ण उच्च सरकारी और विश्वविद्यालयी पदों पर अपनी दिनचर्चा का अधिकांश समय स्वाहा करने के उपरान्त भी, दीप्ति की कविताओं में वैसी झुँझलाइट कहीं नहीं है, जैसी कि ऐसे में अक्सर उभर आती है। 

सम्वेदना और करूणा अभिव्यक्ति को प्रांजलता देती है। भाषा में कहीं भी उलझाव और भटकाव नहीं है - यह एक बड़ी बात है। लगता है कि यह सब सहज ही होता चला गया है। कवयित्री को प्रयास नहीं करना पड़ा। सायास होता तो एक ठिठकाव आ जाता । सहज, सुन्दर भाषा ने, कविताओं में बहते भावों को मर्मस्पर्शी बनाया है।

दीप्ति को इस उत्तम काव्य -संग्रह हेतु ढेर सारी बधाई !! मेरी शुभकामना है कि दीप्ति की कलम सतवंती तो रहेगी ही, इसी तरह रसवंती भी बनी रहे! एक सम्वेदनशील लेखिका से यह आशा करना हमारा भारतीय सँस्कार है। कविताओं के उध्दरण देना मैं इसलिए ठीक नहीं समझता हूँ कि पूरी की पूरी कविताएँ आपके हाथ में हैं, अपनी - अपनी पसन्द की पँक्तियों को आप स्वयं रेखांकित कर सकते हैं।

दीप्ति स्वयं को दीप्त - प्रदीप्त रखती हुई साहित्य सर्जना में रत रहें, लीन रहें, यह शुभेच्छा करते हुए मैं यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि भारतीय साहित्य की आत्मा सदा से सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् रही है। हमारे यहाँ जब-जब बहस हुई है, केवल शरीर (Form) पर हुई है आत्मा (Content) पर नहीं; प्राणों का स्पर्श आत्मा ही करती है, शरीर नही और कविता का यह प्राणतत्त्व दीप्ति की कविताओं में बखूबी विद्यमान है

तद्हेतु दीप्ति को हार्दिक बधाई !! अभिनन्दन ..!!! 


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