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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता

भाव मन्थन
डॉ. गोपालदास नीरज


काव्य के सम्बन्ध में समीक्षकों और आचार्यों के अनेक मत, अनेक सिद्धान्त और अनेक विचारधाराएँ प्रचलित हैं। किसी ने काव्य की आत्मा रस, तो किसी ने वक्रोक्ति, किसी ने अलंकार, किसी ने गुण और किसी ने रीति मानी है। सभी सिद्धान्त आंशिक रूप से सत्य हैं और काव्य के किसी एक पक्ष की ओर इंगित करते हैं। अंग्रेजी के समीक्षकों ने कल्पना को काव्य की शक्ति कहा है। इसके अतिरिक्त योगीराज अरविन्द ने इसे आत्मसाक्षात्कार माना है। मेरा अपना विचार है कि जब लिखने के लिए लिखा जाता है, तो जो कुछ  लिखा जाता है, उसका नाम गद्य है और जब  लिखे बिना न रहा जाए, और जो खुद लिख जाए, उसी का नाम कविताहै ! क्योंकि कविता हृदय का वह भावोच्छ्वास है, जो अनजाने ही अनचाहे ही, हृदय में विस्फोट बन कर फूट पड़ता है - जैसे, सूर्योदय होने पर सुनहरा प्रकाश, चन्द्रोदय होने पर रुपहली चाँदनी, वसन्तागमन पर फूलों से सुगन्ध और भीतर से हलचल होने पर पहाड़ों से झरने फूट पड़ते हैं।

दीप्ति के भीतर भी कविता कुछ इसी प्रकार अनायास, अप्रयास जन्मी है। कविता शायद उनके जीने की शर्त बन कर आई है। वो न होती तो, शायद दीप्ति न होती! कविता जब होने की शर्त बन कर उमड़ती है, तो उसकी यात्रा भीतर से बाहर की ओर होती है। उसमें समाया दर्द समूची मानवता का दर्द बन जाता है। इसलिए दीप्ति की कविता जहाँ अपने अकेलेपन की पीड़ा को वाणी देती है; वहीं वह दूसरों के दुख-दर्द की भी साझीदार बन जाती है। यदि मैं कहूँ कि उनकी कविता व्यष्टि से समष्टि तक और अहम् से परम् तक की यात्रा है, तो शायद अत्युक्ति नहीं होगी। आज पारस्परिक रिश्ते और सम्बन्ध कितने खोखले, कितने सारहीन, कितने भावशून्य और स्वार्थ आधारित हो गए हैं - इस सच को दीप्ति की रिश्ते कविता की इन पँक्तियों से समझा जा सकता है -

 अकसर रिश्तों की रोते हुए देखा है

अपनों की बाँहों में मरते हुए देखा है....!

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स्वार्थ पर बनें रिश्ते बुलबुले की तरह उठते हैं,

कुछ देर बने रहते हैं, फिर गायब हो जाते हैं !

इसी तरह उनकी उधेड़ बुन कविता के ये भाव बड़े सुन्दर बन पड़े हैं - 

खुद - ब- खुद बुने - बने,

उस प्रगाढ़ रिश्ते को ओढ़

हम   पुलक   से   भरे,

लगन    में     मगन,

खोए - खोए   रहते  हैं

मधुर,  मदिर  जीते  हैं !

नीलगगन में हंस बना करते हैं!

 

यद्यपि दीप्ति के काव्य संग्रह में भँवर’, ‘बोझिल हवा’, ‘अन्तरात्मा’, ‘तलाश’, ‘अन्तर्यात्रा’, ‘धरती का दुख’, ‘काला चाँद’, ‘अवमूल्यन’, ‘पुखराजी धूप’, ‘सुख की हार’, ‘सलोने बन्धन’, ‘पानी’, ‘दिन’, ‘यादों के पतझड़ आदि ऐसी कविताएँ हैं, जो मन को गहराई से छूती हैं। किन्तु इन कुछ कविताओं का उल्लेख करना भी मुझे उचित नहीं लग रहा है, क्योंकि दीप्ति की सभी, छोटी बड़ी कविताओं में मानवता और समाज को कुछ न कुछ उत्तम और श्रेष्ठ देने के लिए भरा हुआ है। दो-दो पँक्तियो के सीधे-सरल कलेवर में उन्होने बड़ी पैनी बात कह डाली है। इंसान अपने दुख का कारण अक्सर खुद ही होता है -

 अजनबी चेहरों में, अपनों को खोजते हो

सहरा में क्यों, गुलिस्तां खोजते हो

दोस्ती बदकिस्मती से, किस्मत को कोसते हो!

 

वर्तमान परिवेश की चीख-पुकार से त्रस्त वह सबको, प्यार से गले लग कर सुख - शान्ति का आधान करने के के लिए प्रेरित करती है -

   उठो, बढ़ाएँ हाथ प्यार से

   आओ,और गले लग जाएँ

   आँसू से  धो डालें कटुता

   प्रेमपाश  में  बँध जाएँ !

 

दीप्ति की कविताएँ कुछ ऐसा अपने में समेटे हुए हैं कि दिल, दिमाग और आत्मा में गहरे उतरती चली जाती है; अन्दर हलचल सी मचाती हैं। यह उनके लेखन की बहुत बड़ी विशेषता हैं। दीप्ति की अभिव्यक्ति बेहद सशक्त शालीन और उनके अपने एक अन्दाज का अनोखापन लिए है। उनकी लगभग सभी रचनाएँ, उनके गहरे सोच व गहन अनुभूतियों का सच्चा दर्पण हैं। उनकी ये पँक्तियाँ निरसन्देह निश्छल भावसे भरपूर हैं

मेरे अन्दर एक सूरज है,

जिसकी सुनहरी धूप मन्दिर पे ठहर कर

मस्जिद पे पसर जाती है !

 

इसी तरह काला चाँद बड़ी ही मनमोहक कविता है। यादों के पतझड कविता प्रकृति की उदासी और सन्नाटे से, मन की उदासी का सजीव बिम्ब सहज ही चित्रित करती है।

दीप्ति अतिप्रतिभा सम्पन्न एवं विदुषी है। शिक्षा सलाहकार जैसे केन्द्रीय सरकार के उच्च सरकारी पद और अनेक प्रतिष्ठित विश्व-विद्यालयों में वे बड़ी गरिमा, निष्ठा एवम् गौरव के साथ कार्यरत रहीं। मगर विशेष रूप से वे एक रचनाकार हैं और उनकी रचनाधर्मिता का सबसे सशक्त माध्यम कविता ही है। उनके काव्य में आत्मबोध और युगबोध का मणिकांचन योग उनके काव्य-संग्रह को उत्कृष्ट एवं सारगर्भित बना, बहुमूल्य बनाता है और हमारे सोच को बहुत गहराई तक प्रभावित करता है।

 

दीप्ति को उनके अति सुन्दर काव्य संग्रह पर हार्दिक बधाई , ढेर सारी शुभकामनाएँ एवम् बड़ा-बड़ा आशीर्वाद !! वह इसी तरह साहित्य - साधना में सत संलग्न रहें, यशस्वी होए, सृजन की ऊँचाईयों पर पहुँचे !!!

 

(डॉ. गोपालदास नीरज’)

यश भारती, रजतश्री, भारती-तिलक,

साहित्य वाचस्पति, टैगौर वाचस्पति,

विद्या-वाचस्पति, गीत-सम्राट,

गीत-गंधर्व, गीत-ऋषि, राष्ट्र-गौरव।


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