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अन्तर्यात्रा |
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सस्नेह-निवेदन
मलमल से भावों और रेशमी ख्यालों को शब्दों की पँखुड़ी से सजा कर, सँवार कर
छन्दों के नन्हे-नन्हे नूपुर पहना कर लय की लहर पर हौलेसे तिरा कर कागज के
तट पर हौले से उतारा तो देखा कि, गगन की नीलिमा सी धरती की हरीतिमा सी झील
की कमलिनी सी मनमोहिनी हरिणी सी सम्वेदना का सागर और वेदना की गागर लिए रूप
को उड़ेलती और मधुरता बिखेरती
‘कविता’
सलोनी सी, सामने मुस्काती थी ! मन को लुभाती, आत्मा में गहरे उतरती चली
जाती थी....! अंतस में जाकर, न जाने कौन से रसायन से तालमेल बिठाती थी कि,
कविता पे कविता की झड़ी लग जाती थी ! प्यार में पगी, कभी दर्द से भरी भावों
में खरी, कभी सम्वेदना गढ़ी रोके न रूकती, बही चली जाती थी नम आँखों की
कोरों से, साँसों के कम्पन से सागर की लहरों सी मचलती, लहराती थी ! लच्छे
सी कोमल कविताओं को समेट के अँजुरी में भर के, सम्हाल के, सहेज के कागज के
पाट पे उतारा गया कैसे बस, मैं ही जानती हूँ, और धन्य मानती हूँ ! आपकी नजर
ये आज किए देती हूँ जैसे मैने प्यार से पन्नों पे इनको उतारा और सहेजा
है-वैसे ही दुलार से आप इन्हें आँखों से दिल में उतारना इनकी गहराई में
डूबना, उतरना मेरी मेहनत का होगा यह नजराना
!! डॉ. दीप्ति गुप्ता |