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05.03.2012
अन्तर्यात्रा

 


अली रजा
पटकथा लेखक एवं निदेशक
जुहू, मुम्बई


प्यारी बेटी दीप्ति,

ईमान को क्या हो गया है
रोते - रोते सो गया है !

      गहरे अर्थो से भरी इन पँक्तियों के बारे में कितना कुछ लिखा जा सकता है !!

      जीवन की विकट और गहरी सच्चाईयों को सरल जुबान में सादगी से बयान कर, दिलों दिमाग में उतार देना तुम्हारी रचनाओं की एक अनूठी पहचान है।

तुम्हारी सभी कविताएँ इस खूबी से लबरेज है। अन्तर्यात्रा, अवमूल्यन, रिश्ते, निश्छल भाव, भाव-बिन्दु, दुख का दर्द, धरती का दुख, जिन्दगी के एहसासों की ऐसी खूबसूरत तस्वीरें खींचतीं है कि दिल में परत-दर-परत समाती चली जाती हैं।

अक्सर रिश्तों को रोते हुए देखा है
अपनों की ही बाहों में मरते हुए देखा है।

      कितना कुछ भरा है इन लफ्जों में ! इसी तरह तुम्हारी आठ लाइनों एक छोटी सी कविता है; उसमें - रंगों और होली, दीपों और दीवाली, भौरों और कलियों और अन्त में दर्द और कविता के कुदरती बन्धन को जिस सलोनेपन से तुमने कहा है, वे भाव, वे अलफाज रह रह कर जहन में उभरते रहते हैं।

दर्द गुनगुनाए, तो कविता लहर आई

      यही है, तुम्हारी कलम की खूबी और खासियत कि वह रूह को, मन को पूरी तरह गिरफ्त कर लेती है। निम्मी जी ने और मैंने बार-बार तुम्हारी उम्दा रचनाओं को पढ़ा और जितनी बार पढ़ा, उतनी ही बार वे नई व और अधिक खूबसूररत नजर आई ! निम्मी जी को तो जितनी मुहब्बत तुमसे है, लगता है कि उससे अधिक मुहब्बत तुम्हारी ही तरह प्यारी तुम्हारी कविताओं से हो गई है। हम चाहते हैं कि अपनी किताब के साथ तुम हमारे पास बम्बई आओ और अपनी कविताएँ खुद हमें सुनाओं।

      निम्मी जी की और मेरी ओर से तुम्हें दिली मुबारकबाद, बड़ी - बड़ी दुआएँ !! ऐसे ही लिखती रहो और आसमान की भी बुलन्दियों के पार पहुँचो..!!!

 

(अली रजा)                       (निम्मी)
पटकथा लेखक                     अभिनेत्री

                            

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