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12.31.2008

आओ सुनाऊँ एक कहानी
रचनाकार
: सीमा सचदेव

मम्मी और मुन्ना
सीमा सचदेव

इक दिन माँ से मुन्ना बोला
छोटा सा पर बड़ा मुँह खोला

आओ माँ टी.वी पे देखो
वैसा घोला(घोड़ा) मुझे भी ले दो

मैं भी घोले पे बैठूँगा
फिर न कभी भी मैं रोऊँगा

मुन्ने ने ऐसी जिद्द मारी
चाहिए अभी घोड़े की सवारी

माँ ने मुन्ने को समझाया
तरह तरह से भी ललचाया

ले लो चाहे कोई खिलौना
पर घोड़े के लिए न रोना

घोड़ा जो लातों से मारे
तो दिख जाएँ दिन मे तारे

तुम घोड़े को कहाँ बाँधोगे ?
भूखा होगा तो क्या करोगे ?

पर नन्हा सा मुन्ना प्यारा
दिखाया गुस्सा सारा का सारा

जब तक घोला नहीं मिलेगा
तब तक कुछ भी न खाऊँगा

न तो किसी से बात कलूँगा(करूँगा)
न ही खिलौनो संग खेलूँगा

करती क्या अब माँ बेचारी ?
घोड़े की तो कीमत भारी

कैसे मुन्ने को समझाए ?
और घोड़े की जिद्द हटाए

आया माँ को एक ख्याल
चली समझदारी की चाल

ले गई एक खिलौना घर
जहाँ पे बच्चे खेलते अकसर

भरा खिलौनो से वो घर
एक से बढ़कर एक थे सुन्दर

वहाँ पे था लकड़ी का घोड़ा
चलता था जो थोड़ा - थोड़ा

उस पर मुन्ने को बिठाया
और फिर घोड़े को घुमाया

पकड़ लिया मुन्ने ने घोड़ा
घोड़ा दुम दबा के दौड़ा

इतने में मुन्ना खुश हो गया
मम्मी का मसला हल हो गया

माँ बेटा दोनों खुश हो गए
हँसते-हँसते वो घर को गए


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