अन्तरजाल पर साहित्य
प्रेमियों की विश्राम स्थली
मुख्य पृष्ठ
12.25.2008

आओ सुनाऊँ एक कहानी
रचनाकार
: सीमा सचदेव

रंग रँगीली होली
सीमा सचदेव

रंग रँगीली आई होली
नन्ही गुड़िया माँ से बोली

माँ मुझको पिचकारी ले दो
इक छोटी सी लारी ले दो

रंग-बिरंगे रंग भी ले दो
उन रंगों में पानी भर दो

मैं भी सबको रंग डालूँगी
रंगों के संग मजे करूँगी

मैं तो लारी में बैठूँगी
अन्दर से गुलाल फेंकूँगी

माँ ने गुड़िया को समझाया
और प्यार से यह बतलाया

तुम दूसरो पे रंग फेंकोगी
और अपने ही लिए डरोगी

रंग नहीं मिलते हैं अच्छे
हुए बीमार जो इससे बच्चे

तो क्या तुमको अच्छा लगेगा
जो तुम सँग कोई न खेलेगा

जाओ तुम बगिया मे जाओ
रंग- बिरंगे फूल ले आओ

बनाएँगे हम फूलों के रंग
फिर खेलना तुम सबके संग

रंगों पे खरचोगी पैसे
जोड़े तुमने जैसे तैसे

उसका कोई उपयोग न होगा
उलटे यह नुकसान ही होगा

चलो अनाथालय में जाएँ
भूखे बच्चों को खिलाएँ

आओ उन संग खेले होली
वो भी तेरे है हमजोली

जो उन संग खुशियाँ बाँटोगी
कितना बड़ा उपकार करोगी

भूखा पेट भरोगी उनका
दुनिया में नहीं कोई जिनका

वो भी प्यारे-प्यारे बच्चे
नन्हे से है दिल के सच्चे

अब गुड़िया को समझ में आई
उसने भी तरकीब लगाई

बुलाएगी सारी सखी सहेली
नहीं जाएगी वो अकेली

उसने सब सखियों को बुलाया
और उन्हें भी यह समझाया

सबने मिलके रंग बनाया
बच्चों
संग त्योहार मनाया

भूखों को खाना भी खिलाया
उनका पैसा काम में आया

सबने मिलकर खेली होली
और सारे बन गए हमजोली


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें