अन्तरजाल पर साहित्य
प्रेमियों की विश्राम स्थली
मुख्य पृष्ठ
12.25.2008

आओ सुनाऊँ एक कहानी
रचनाकार
: सीमा सचदेव

महलों की रानी
सीमा सचदेव

एक कहानी बड़ी पुरानी
आज सुनो सब मेरी
ज़ुबानी

विशाल सिन्धु का पानी गहरा
टापू एक वहाँ पर ठहरा

छोटा सा टापू था प्यारा
कुदरत का अदभुत सा नज़ारा

स्वर्ग से सुन्दर उस टापू पर
मछ्लियाँ आ कर बैठती अकसर

धूप मे अपनी देह गर्माने
टापू पे बैठती इसी बहाने

उस पर इक जादू का महल था
जिसका किसी को नहीं पता था

चाँद की चाँदनी में बाहर आता
और सुबह होते छुप जाता

उसको कोई भी देख न पाता
न ही किसी का उससे नाता

इक दिन इक भूली हुई मछली
रात को टापू की राह पे चल दी

सोचा रात वही पे बिताए
और सुबह होते घर जाए

देखा उसने अजब नज़ारा
चमक रहा था टापू सारा

सुन्दर सा इक महल था उस पर
फूल सा चाँद भी खिला था जिस पर

देख के उसको हुई हैरानी
पर मछली थी बड़ी स्यानी

जाकर खड़ी हुई वह बाहर
पूछा
-  बोलो कौन है अन्दर?

क्यों तुम दिन में छिप जाते हो?
नज़र किसी को न
हीं आते हो?

अन्दर से आई आवाज़
खोला उसने महल का रा

रानी के बिन सूना ये महल
इसलिए रक्षा करता है जल

ढक लेता इसे दिन के उजाले
क्योंकि दुनिया के दिल काले

मछली रानी बड़ी सयानी
समझ गई वो सारी कहानी

चली गई वो महल के अन्दर
अब न रहेगा महल भी खण्डहर

छली बन गई महल की रानी
अब न रक्षा करेगा पानी

महल को मिल गई उसकी रानी
खत्म हो गई मेरी कहानी


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें