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ISSN 2292-9754

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12.18.2018


हिन्दी टाईपिंग रोमन या देवनागरी और वर्तनी
राजेन्द्र कुमार शास्त्री 'गुरु'

प्रिय सुमन जी,

यह जानकर बेहद अच्छा लगा की अब आपकी आँखें ठीक हो गई हैं। आप के साहित्य कुञ्ज के नए अंक की तलाश हमेशा रहती है। इसकी मुख्य वजह यह है, कि आपके लेखों से मेरे जैसे नए लेखकों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है । हिन्दी भाषा की दयनीय स्थिति के बारे में मुझ जैसे अज्ञानी का ज्यादा बोलना शायद ठीक नहीं होगा लेकिन फिर भी अपने विचार रखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। आज की युवा पीढ़ी को हिन्दी भाषा का इतना ज्ञान न होने के पीछे बहुत से कारण है। जिनमें से मुख्य हैं, विद्यालययी स्तर पर हिन्दी भाषा को कमतर आँकना , अच्छे व उच्च शिक्षित प्राध्यापकों द्वारा हिन्दी का शिक्षण न दिया जाना। इसके अतिरिक्त हिन्दी का स्तर दिन-ब-दिन कमजोर होने का एक मुख्य कारण और है और वो है , युवा पीढ़ी को हिन्दी के क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम प्राप्त होना। हमारे भारत में आज ये सोच रखी जाती है कि जो लोग अंग्रेजी अच्छी तरह से बोल व लिख लेते हैं, उन्हें अच्छा खासा पैसा मिलता है। जो कि एक सच भी है। आज की युवा पीढ़ी हिन्दी भाषा की त्रुटियों के बारे में इस लिए सोच नहीं पाती क्योंकि उन्हें हिन्दी पढ़ने का अवसर नहीं मिलता और जिन्हें मिलता है वो शायद इस विषय को इतनी गहराई से लेना नहीं चाहते। ठीक उसी तरह जैसे बड़ों का ज्ञान जिन्दगी जीने के लिए सहायक होता है लेकिन हम उसे नकार देते हैं ये सोचकर कि ये बूढ़ा ऐसे ही बोल रहा है। लेकिन फिर भी मैं एक बात बोलना चाहूँगा। आप की हिन्दी भाषा के स्तर को बढाने के प्रति सोच की सराहना करनी होगी।

आशा है, आप मेरी त्रुटियों पर ज्यादा ध्यान नहीं देंगे। काश आप जैसी सोच रखने वाला व्यक्ति इस समूचे भारत में हिन्दी पढ़ाने वाला हर अध्यापक होता तो शायद हिन्दी की ये दुर्दशा नहीं होती। लेकिन फिर भी हमें इस बात पर गर्व करना चाहिए की आज भी हिन्दी के स्तर को बढ़ाने के लिए साहित्य कुञ्ज जैसी पत्रिकाएँ उपलब्ध हैं।

धन्यवाद!

सादर
राजेन्द्र कुमार शास्त्री `गुरु`
rk399304@gmail.com


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