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ISSN 2292-9754

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12.18.2018


हिन्दी टाईपिंग रोमन या देवनागरी और वर्तनी
अमिताभ वर्मा

आदरणीय घई साहब,

’साहित्य कुञ्ज’ का दिसम्बर अंक देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई। वर्ष 2018 में पत्रिका का प्रकाशन नियमित रूप से नहीं हो पाया था। आशा है, अब आपकी छत्रछाया में ’साहित्य कुञ्ज’ एक बार फिर हर महीने स्तरीय साहित्य उपलब्ध कराने लगेगा।

हिन्दी के कुछ अक्षर पहले ही ’की बोर्ड’ की अक्षमता की बलिवेदी पर चढ़ चुके हैं। कुछ आधुनिकता और उच्चारण का ज्ञान न होने के कारण लुप्त हो गए हैं। जैसे, अब ’गङ्गा’ न दिखकर ’गंगा’ ही दिखता है। अगर मैं कहीं ’गङ्गा’ लिखकर भेज दूँ तो पाठक शायद समझ ही न सकें कि मैंने लिखा क्या है। ’साहित्य कुञ्ज’ का सही अनुस्वार केवल पत्रिका की साइट पर ही दिखता है। अब ’घण्टा’ नहीं, घंटा बजता है। अब ’उँगलियों’ से नहीं, उंगलियों से इशारे होते हैं। चलिए, यहाँ तक तो फिर भी मान लें, लेकिन अब तो हिन्दी में एम. ए. पास लोगों को ’आशीर्वाद’ की जगह ’आर्शीवाद’ और ’जाएँगे’ की बजाय ’जाऐगें’ लिखते देखना आम बात है। ’द्वन्द्व’ को ’द्वन्द’ और ’संन्यासी’ को ’सन्यासी’ कहना अब सही माना जाता है। ’शेष’ का उच्चारण प्रायः त्रुटिपूर्ण ही होता है। हिन्दी लेखन और बोलचाल में शुद्ध भाषा का प्रयोग अब सम्भवतः दकियानूसी माना जा रहा है। यह बात बड़े दुःख की है। पहले ’नागरी प्रचारिणी सभा’ और भारत सरकार का एक मन्त्रालय शुद्ध हिन्दी का प्रचार करते थे, पर अब सरकारी विज्ञापनों में भी कभी-कभी दयनीय हिन्दी पढ़ने को मिल जाती है।

भवदीय,
अमिताभ वर्मा
amitabh.varma@gmail.com


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