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ISSN 2292-9754

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03.30.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?
भाग - २ के सम्बन्ध में प्रतिक्रिया
मधु शर्मा

आदरणीय घई साहब,

आपके इस सम्पादकीय ने कितनी ही भूली-बिसरी यादों को एक चलचित्र के समान आँखों के आगे ला खड़ा कर दिया।

आधुनिक माता-पिता भी अपने छोटे-छोटे बच्चों को रात्रि में सुलाने के समय रंग-बिरंगी पुस्तकों में से कहानियाँ (Bedtime stories) पढ़ कर सुनाते हैं, परन्तु ज्यों ही उनकी संतान ७-८ वर्ष की होती है तो न जाने माता-पिता की सहनशीलता एवं रुचि पहले जैसी क्यों नहीं रहती? हाँ, दादा-दादी या नाना-नानी अभी भी बच्चों को बिन पुस्तकों के कहानी सुनाने के लिए सदा तत्पर रहतें हैं..और बच्चे भी उन्हें सुन कर जितना प्रसन्न होते हैं वैसी प्रतिक्रिया वे अपने माता-पिता को क्यों नहीं दे पाते, इसका समाधान संभवतः एक सुलझा हुआ लेखक ही बता सकता है।

शुभकामनाओं व सादर सहित,

मधु शर्मा
बर्मिंघम, यू.के.
madhu.sharma@hotmail.co.uk


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