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ISSN 2292-9754

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03.26.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं
धर्म जैन

प्रिय सुमन जी,

'हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?' सितम्बर (द्वितीय) व अक्तूबर (प्रथम) 2017 अंकों में आपने अपने सम्पादकीय में वह प्रश्न उठाया है जो प्रवासी रचनाकार ही नहीं वरन् भारत में बसे प्रबुद्ध रचनाकार भी ख़ुद से पूछ रहे हैं। नई दिल्ली में आयोजित होने वाले वार्षिक पुस्तक मेलों में हिन्दी प्रकाशकों के मुक़ाबले दस-बीस गुना भीड़ अंग्रेज़ी के प्रकाशकों के स्टॉलों पर होती है। भारतीय भाषाओं में प्रकाशित साहित्य की स्थिति तो और भी बुरी है।

हिन्दी के ई-प्रकाशनों की स्थिति भी मुद्रित साहित्य जैसी ही है। सैकड़ों स्तरीय लघु पत्रिकाएँ/गूगल बुक्स आदि अपने ई-संस्करण मुफ़्त में पढ़े जाने के लिए उपलब्ध कराती हैं, पर उनके मासिक डाउनलोड के आँकड़े दो अंकों से आगे नहीं पहुँच पाते।

हिन्दी के प्रति इस उदासीनता की रचयिता हमारी पीढ़ी है। अंग्रेज़ी को कमाऊ और कैरियर प्रधान भाषा के रूप में स्थापित करने का सर्वाधिक श्रेय हमारी पीढ़ी को ही मिलेगा। आज भारत में ही किताबों के अंग्रेज़ी संस्करणों की माँग हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं से अधिक है। ऐसे में आपका, तेजेन्द्र शर्मा या भारत में बसे मेरे कवि मित्र राजेंद्र चौधरी का यह प्रश्न कि 'हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?', कई मंचों पर रचनाकारों को उद्वेलित कर रहा है। आपने नब्ज़ पकड़ी है, छोटे बच्चों के साथ उनके बचपन से ही हिन्दी किताबें पढ़ने की शुरुआत करना। निश्चित ही ऐसी सोच और उसका कार्यान्वयन हिन्दी साहित्य को प्रतिबद्ध पाठक दे सकता है।

सादर,

धर्म जैन
ईमेल : dharmtoronto@gmail.com



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