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ISSN 2292-9754

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03.26.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?
भाग - २ के सम्बन्ध में प्रतिक्रिया
अमिताभ वर्मा

आदरणीय घई साहब,

अक्तूबर अंक का सम्पादकीय प्रश्न खड़ा करता है - भारत में माँ शिशु को हिन्दी की किताब पढ़ कर सुनाती है या अंग्रेज़ी की? सम्पादकीय में बाल पत्रिकाओं का ज़िक्र भी है।

हिन्दी बाल पत्रिकाओं का भारत में अकाल-सा है। ’चंपक’ के अलावा कोई ऐसी लोकप्रिय पत्रिका दिमाग़ में नहीं आती जिसे बच्चा ख़ुद पढ़ सके। शिशुओं के लिए कोई हिन्दी ’बेबी बुक’ भी मैंने नहीं देखी। हाँ, अंग्रेज़ी में ऐसी बहुत-सी किताबें मिलती हैं जिनमें विदेशी लोक कथाएँ छपी होती हैं। यानी, अगर माँ इन्हें पढ़ कर शिशु को सुनाए तो बच्चा स्कूल की दहलीज़ तक पहुँचते-पहुँचते सिन्ड्रेला और लिटल रेड राइडिंग हुड से तो परिचित हो जाएगा, लेकिन वीर भरत तथा एकलव्य के बारे में अनजान ही रहेगा। मैंने ऐसे परिवार भी नहीं देखे जहाँ शिशुओं को भारत की संस्कृति की परिचायक कहानियाँ सुनाई जाती हों।

वैसे, बच्चे अब किताबों में कहानी पढ़ने की बजाय टैब और टेलिविज़न पर एनिमेटेड कहानी का मज़ा लेते हैं। विदेशी ऐनिमेटेड कहानियाँ तकनीकी तौर पर बेहतर होने की वजह से बाज़ी मार लेती हैं, और बच्चे एक बार फिर भारतीय साहित्य नकार कर विदेशी साहित्य की शरण ले लेते हैं।

सादर,

भवदीय,
अमिताभ वर्मा
amitabh.varma@gmail.com


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