अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.21.2016



9

पकड़ पाँव ऋषि के पुन: यूँ विनय की।
"नहीं पाप प्रभु! बात पावन प्रणय की।
प्रथम दर्श में कर चुकी आत्म-अर्पण,
न प्रस्तावना है प्रभो! यह प्रलय की।।"

तुरंत हट गए ऋषि कमण्डल उठाया।
गमन हेतु तत्क्षण सबल पग बढ़ाया।
कहा मेनका ने, "कहाँ जा रहे प्रभु!"
दिया शान्त उत्तर, न रमणी को भाया।।

"डूब जाऊँ मैं न तेरे
भाव-भीने दृग-भँवर में,
इसलिए तुझ से बहुत ही
दूर जाना चाहता हूँ।।

ये लहरते केश,
मेघों के मचलते खण्ड हों ज्यूँ।
अरुण बिन्दी,
सूर्य का आलोक प्रबल प्रचण्ड हो ज्यूँ।
नयन का काजल,
घने अँधियार का ही दूत बनकर।
शिथिल करता नित्य
संयम औ’ विवेक अव्याज हँसकर।

रम न जाऊँ, रूप! तेरे
रूप की सित चाँदनी में,
इसलिए तुझसे बहुत ही,
दूर जाना चाहता हूँ।।

अधर की मुसकान,
करती है सदा आकृष्ट मन को।
आयु की यह बाढ़,
करती है सदा ही भ्रष्ट तन को।
मदभरी, मदहोश,
मतवाली मतंग-सी गति मनोहर।
भंग करती कठिन
अनुशासन तपस्वी हृदय का वर।

खो ना जाऊँ वासना के
विजन बीहड़-वनों में,
इसलिए तुझसे बहुत ही,
दूर जाना चाहता हूँ।।"

"हृदय तोड़कर यूँ न जाओ तपस्वी।
न मुख मोड़के दूर जाओ मनस्वी।
तुम्हारी हूँ, तुम बिन न मैं जी सकूगी,
मुझे छोड़कर यूँ न जाओ यशस्वी।।"

हुई बुद्धि जड़वत्‌, सुने रूप के स्वर।
बनी स्मृति विस्मृति की अचानक धरोहर।
मची क्रान्ति मन में मदन-ज्वार जागा,
गए भूल योगेश उत्तर-प्रत्युत्तर।।

उठी मेनका, डाल दी बाहु-माला।
जगी यति-हृदय में प्रबल काम-ज्वाला।
बढ़े पग प्रणय के पृथकता मिटाएँ,
पृथक्‌ हट गई पर स्वत: रम्य बाला।।

"जगाकर प्रणय-ज्वाल मत दूर जाओ,
निवेदन करें ऋषि, प्रिये! पास आओ।
न घूँघट न गिराओ विमल विधु-वदन पर,
मुझे पाश में ले हृदय से लगाओ।।

तुम्हीं ने जगाया सुरति-भाव मन में।
तुम्हीं ने बसाया प्रणय-गाँव मन में।
तुम्हीं ने उगाया क्षुधा औ’ तृषा को,
दिया छेड़ तुमने विषय-बाघ मन में।।

तुम्हारे बिना अब नहीं रह सकूगा।
तुम्हारे विरह को नहीं सह सकूगा।
सताओ न बिन व्याज मेरे हृदय को,
मनीषा हुई जड़, न कुछ कह सकूगा।।

"न हों व्यग्र इतना, धरो धीर ऋषिवर!
करो आत्म-संयम हृदय-देव! पल-भर।"
गया फन्द में फँस अजय बाघ अब तो
समझ मेनका ने कहा मुस्कुराकर।।

"ग्रहण पाणि कर लें प्रथम देव विधिवत्‌।
बना लें मुझे भार्या जब महाव्रत।
करें कामना पूर्ण जी भर पुन: प्रभु,
करूँ पूर्ण कर्त्तव्य मैं भी यथावत्‌।।

अगर भाँवरे डाल पाएँ न भगवन्‌!
करें ब्याह गन्धर्व मुझसे महात्मन!
अलंकार वस्त्रादि की है न इच्छा,
मुझे दान सिन्दूर का दें महामन!"

पराजित किया पाप ने पुण्य पल में।
हुआ ह्रास ऋषि के अतुल आत्म-बल में।
किया भोग ने योग को पद-विमर्दित,
हुई साधना क्षत प्रथमजन्य छल में।।

न कुछ कह सके और कुछ कर न पाए।
इड़ा-व्योम में वासना-मेघ छाए।
किया ब्याह गन्धर्व विधिवत्‌ अचाहे,
गृस्थाश्रम में पुन: लौट आए।।

निबाहीं परस्पर प्रणय की प्रथाएँ।
मिलन-माँग में भर मनोरम प्रभाएँ।
तपोवन बना स्वर्ग अमरावती-सा,
समय की शिला पर लिखीं नव कथाएँ।।

हुई गत मिलन-यामिनी प्रात आया।
हुई बुद्धि पर शासिका पूर्ण माया।
रही खेलती मेनका खेल नित नव,
मगर गाधि-सुत को नहीं चेत आया।।

प्रणय-केलि करते सकल सुधि बिसारी।
नियति ने चलाए विशिष प्राणहारी।
बने एक औ’ एक मिल तीन अविकल,
हुए मेनका के अपल पाँव भारी।।

उभरने लगे गर्भ के चिह्नन तन में।
चमकने लगी रूप-आभा वदन में।
अवधि वृद्ध होने लगी उत्तरोत्तर,
छिपाए रही मेनका भेद मन में।।

हुआ आचरण भिन्न व्यवहार बदला।
बदलता गया नित्य क्रम, प्यार बदला।
बढ़ी मात्र स्वच्छन्दता हर दिशा में,
नया रंग ले सर्व संसार बदला।।

उपेक्षा-तिरस्कार ऋषि सह न पाए।
किया यत्न कितना मगर कह न पाए।
दिया दर्प दाम्पत्य का तोड़ स्त्री ने,
बिना व्यक्त कर रोष ऋषि रह न पाए।।

"आभास हो चला है मुझको,
हम साथ नहीं चल पाएँगे।।

मैं पुजारी प्राची का,
पर तुमको प्यार प्रतीची से।
है दक्षिण तुम्हें रास आता,
पर मुझे लगाव उदीची से।

विपरीत दिशाओं के पंथी,
एक पग न साथ चल पाएँगे।।

मैं योगी हूँ, अनुशासक हूँ,
स्वच्छन्द भाव भाते न मुझे।
लय-ताल-स्वरों का साधक हूँ,
हैं मुक्त छन्द आते न मुझे।

अब भोगवाद के भाव रंच,
मुझको न और छल पाएँगे।।

मैं समझा, मैं हूँ प्रेम-दीप,
तुम शिखा समुज्ज्वल हो इसकी।
मैं प्रकाश तुम वर्तिका विमल,
पर समझ गया अब गति विधि की।

जीवन-दीपक में तैल-वारि,
संग-संग न अधिक जल पाएँगे।।"

हँसी मेनका सुन, विहँस बात बोली।
"महात्मन्‌! सुनें वाम हूँ मैं न भोली।
समझते रहे आज तक आप जो कुछ,
नहीं प्रेम है, मात्र है एक ठिठोली।।

न मानव-सुता हूँ, न दानव-सुता हूँ।
नहीं देव-यक्षादि की पोषिता हूँ।
प्रभो! अप्सरा स्वर्ग की लोक-विश्रुत,
न आई स्वयं, इन्द्र की प्रेषिता हूँ।।

सेविका हूँ, शचिपति की देव!
मेनका है संज्ञा अभिराम।
कह सकूँ किस विधि विधि का मर्म,
सोचती थी मुनिवर! अविराम।।

आपसे मिला असीमित प्यार।
अनूठे सपनों का संसार।
गई कुछ पल को मैं भी भूल,
लगी थी करने मैं भी प्यार।।

सत्य पर मृषा आवरण डाल।
रही हूँ पल-पल सदा बिहाल।
जी रही वसुधा पर निरुपाय,
दोहरा जीवन कठिन कराल।।

आपके तप से हिले त्रिलोक।
स्वयं हरि शंकर ब्रह्म अशोक।
लक्ष कर अतुलित पुण्य प्रताप,
हुआ भय छिन न जाए सुर-लोक।।

हो गए इतने त्रस्त सुरेश।
मुझे देकर सविनय आदेश।
किया था प्रेषित मन्मथ साथ,
डिगाऊँ तप आपका विशेष।।

सुरेश्वर की ही आज्ञा मान।
किया है महापाप श्रीमान।
वासना की वेदी पर देव!
किया तप मैंने लहूलुहान।।

हो रहा प्रकट समस्त अदृश्य।
छा रहा तम-मन पर आलस्य।
कुक्षि में पले आपका बीज,
विकलता का है यही रहस्य।।

हुआ आचरण अधिक स्वच्छन्द।
हो गई हैं गतिविधियाँ मन्द।
व्यक्त कर पाऊँ कैसे सत्य,
चल रहा मन में अन्तर्द्वन्द्व।।

तपस्वी रचे न रति-सन्दर्भ।
करे शार्दूल न भक्षण दर्भ।
स्वर्ग-नियमों के पालन हेतु,
अप्सरा धारण कर न गर्भ।।

रखूँ मैं अथवा करूँ समाप्त।
यही चिन्ता थी मन में व्याप्त।
आपके हेतु, प्यार के हेतु,
सहूँगी प्रसव-पीर हे आप्त।।

धर्म नारी का बनना मात।
उगाना ममता के जलजात।
गर्भ-धारन करना है पुण्य,
पाप है जघन्य गर्भ का पात।।

न मिलती शान्ति, न मिटे विषाद।
न फलती जग में कोई साध।
करे जो जानबूझ निरुद्देश्य,
भ्रूण-वध का अक्षम्य अपराध।।

मात्र जन-संख्या निरोध हेतु।
भोगने या भौतिक सुख-हेतु।
नियति को नियमों के प्रतिकूल,
मिटाएँ जो ममता के केतु।।

न नैतिकता का जिनको ध्यान।
मनुजता के हैं शत्रु महान्‌।
जन्म-जन्मों तक मिलता दण्ड,
रहा करते वे निस्सन्तान।।

न करता क्षमा उन्हें है काल।
डसा करते तापों के व्याल।
महापापी अति क्रूर कृतघ्न,
दैत्यवत्‌, वधिक, महा चण्डाल।।

प्राण देने वाला भगवान।
प्रान लेने वाला भगवान।
वही अभिभावक, सबका त्राण,
व्यवस्थापक जग के भगवान।।

करूँगी प्रभु! न रंच उत्पात।
करूँगी मैं न गर्भ का पात।
चली जाऊँगी अपने धाम,
आपको दे ममता-पयजात।।"

रहा ऋषि को न अधिक श्रोतव्य।
हो गए मौन समझ भवितव्य।
रह गए किंकर्त्तव्य-विमूढ़,
मेनका का सुनकर वक्तव्य।।
"किया जो कृत्य हेय विकराल।
करेगा क्षमा न तुमको काल!
श्राप दूँगा, पाओगी क्लेश,
चली जाओ भू से तत्काल।।"
"निकट है प्रभो! प्रसव का काल।
न दें प्रभु! शाप मुझे विकराल।
धरा को दे अनूप उपहार,
चली जाऊँगी मैं तत्काल।।"

खुले चक्षु ऋषि के पुन: चेत आया।
वृथा वासना में वृहत्‌ तप गँवाया।
लिया पाणि में वारि, छिड़का उदर पर,
अपल मेनका का प्रसव-काल आया।।

उगा शुक्र ऋषि का अवधि पूर्ण करके।
तपस्या-जनित गर्व को चूर्ण करके।
हुई मेनका-कुक्षि से एक कन्या,
प्रकृति के नियम सर्व सम्पूर्ण करके।।

अनुपमेय अद्वितीय अमरत्व-अर्चित।
अiनंद्य सुन्दरी बालिका गन्ध-चiर्चत।
"करें भेंट स्वीकार सन्तान अपनी,
भवत्‌ शुक्र-कलिका पिता को समर्पित।।" 


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें