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ISSN 2292-9754

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03.21.2016



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इधर मौन थे मुनि उधर मौन रमणी।
प्रणय के भँवर में फँसी प्राण-तरणी॥
मिलन मेनका-मुनि नयन का अचंचल।
इड़ा गाधि-सुत की अजाने गई छल॥

मदन-मेनका मत्त मघवा मुदित थे।
सफल देख षड्‌यन्त्र सब हर्षचित थे॥

उधर चल रहा था प्रबल द्वन्द्व मन में।
लगी थी अगन साधना के सदन में॥

सहस्त्र फन लिये डस रहीं मन - उमंगें
जगीं उर-उदधि में मदन की तरंगें॥

हृदय ही हृदय में जले जा रहे थे।
महाऋषि मदन से छले जा रहे थे॥

चिर संचित वैराग को, डसे राग का नाग।
भोगवाद विजयी हुआ, हुआ पराजित त्याग॥

रख न सकें संयम कभी, देव-दनुज-नर वीर।
हर अन्तर आहत करें, नारि-नयन के तीर॥

नारी ममता, भक्ति है, नारी नर की शक्ति।
घातक सिद्ध हुई सदा, पर नारी-आसक्ति॥

नारी पातक-पुंज भी, नारी पुण्य पवित्र।
समझ न सके त्रिदेव भी, अब तक नारि चरित्र॥

चितवन में भर मोहनी, वाणी से हो दीन।
संयत होकर मेनका, बोली वचन प्रवीण॥

"हूँ अभागिन, प्रेम पुजारिन, निशि-वासर वर खोज रही ।
घर-द्वार नहीं, परिवार नहीं, सह सपनों का गुरु बोझ रही।
आश्रय न मिला, हो गई शिला, पूजती सदेव मनोज रही।
स्वीकार करो, उद्धार करो, पड़ प्रभु के चरण-सरोज रही॥"

पकड़ लिये ऋषि के चरण, आई अधिक समीप।
हुआ ज्वलित मुनि-हृदय में, पावन प्रणय-प्रदीप॥

बोध हुआ सहसा उन्हें, देख प्रसंग विचित्र।
जगत्‌ कहेगा क्या मुझे, मैं हूँ विश्वामित्र॥

रहते दूर विकार से, सदा साधु औ’ संत।
मैं योगी हूँ, भोग का त्याग चुका हूँ पंथ॥

"हे नित्य नवीना! हे उपमा हीना!
कौन? कहाँ से आई?
मुख पर उषा, निशा नयनों में,
अधर अनूप, तृषा वचनों में,
हे कटि-तट-क्षीणा!
हे नृत्य-प्रवीणा!
कौन? कहाँ से आई?
गति में मयूर, लय में विद्युत,
संयम-जग हरने को उद्यत,
पहने पट झीना!
निज में लवलीना!
कौन? कहाँ से आई?

एक योगी को न यूँ भोगी बनाओ।
है विनय रूपसि! दया कर दूर जाओ॥

मानता हूँ रूप-पारावार हो तुम ,
मत्त यौवन का चरम अवतार हो तुम।
छवि न तुम-सी, विश्व में कोई, कहीं भी,
कुशल कवि की कल्पना साकार हो तुम।

कल कटाक्षों के कठिन शर कमल-नयनी!
एक वैरागी हृदय पर मत चलाओ॥

घिर रहीं नयनाम्बर में रति-घटाएँ,
कर रहीं क्रीड़ा कपोलों पर छटाएँ।
है अधर पर हास-मन्मथ-पाश मानो,
मुक्त होने को हृदय-गज छटपटाएँ।

मोहनी डालो न जड़ हो जाए मेधा,
दे न मादक स्पर्श-सुख पागल बनाओ।

मैं मरुस्थल हूँ, न जीवन दे सकूँगा,
वीतराग हूँ, न तन-मन दे सकूँगा।
रूप औ’ तारुण्य की साम्राज्ञी को,
में न स्तुति के कुछ सुमन भे दे सकूँगा।

खोज लो आश्रय कहीं अन्यत्र जाकर,
विश्व-सुन्दरि! लौट जाओ! लौट जाओ!!

मत करो संहार संयम का अदय हो,
मत हरो संसार साधका का अभय हो।
मत करो रति-वज्र से निर्वेद आहत
मत उठाओ पग कि असमय ही प्रलय हो।

हो न वल्गा शिथिल संयम-स्यनदनों की,
कामिनी! मेरी तपस्या मत डिगाओ॥"

चलित चित्त मुनिवर हुए मौन कहकर।
नयन में नयन डाल देखा निमिष-भर।
पड़ी मोहनी रह गए देखते ही,
कहा मेनका ने, प्रणय-भाव भरकर॥

"भोग ही है जीवन का ध्येय!"

जहाँ कर्म है, वहाँ भोग है,
जहाँ धर्म है, वहाँ भोग है।
देह बनी है कर्म-भोग हित,
जीवन केवल महाभोग है।

भोग बिना होते न प्रसन्न
देव-गण अपराजेय॥

भोग बिना सुख-वृष्टि न होती,
अखिल सृष्टि की सृष्टि न होती।
भोग बिना जीवन निरर्थ है,
जग-जीवन में तुष्टि न होती॥

भोग स्वर्ग के पावन पथ का
है केवल पाथेय॥

नारी से ही हर्ष-वेदना,
नारी समग्र विश्व-चेतना।
नारी ही है मूल सृष्टि की,
नारी ही है सृजन-प्रेरणा।

हो स्वच्छन्द जिओ जीवन तुम,
कल की गति अज्ञेय॥"  


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