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04.15.2012

तपती रेत

क्षितिज तक धूप पसरी हुई थी। दोपहर की लू से चक्कर काटती रेत के बवंडर दौड़ रहे थे। सूरज आकाश में जल रहा था और धरती तप रही थी।

अन्नो की छाती भी धरती की तरह जल रही थी। सामने छत की मुँडेर पर सूखने डाले गए कपड़े फरफरा रहे थे। उसे लगा मेरा दुख भी इसी तरह फरफरा रहा है। वह खिड़की में अपनी कुहनियाँ टिकाये खड़ी थी। दोनों हथेलियों पर ठुड्डी रखकर चुपचाप सामने खंडहर को देखती रही।
"क्या हुआ," बशीरा ने अन्दर आते ही पूछा। वह चुप रही।
"अरी बताती क्यों नहीं क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा है क्या?...आजकल तेरा दिमाग आसमान पर चढ़ गया है, हरामखोर गूँगी हो गई क्या? क्या हुआ बता नहीं तो...."
"तो क्या कर लेगा तू....बोल क्या करेगा....मारेगा मुझे?...घर से निकाल देगा? क्यों नहीं सब अधिकार तो तुम मर्दों को ही तो मिले हुए हैं।" वह बिफर कर बोली। आज अन्नो को पूरी पुरुष जाति पर क्रोध आया हुआ था।
"अरे जा बहुत देखे तेरे जैसे...."
"आज क्या तू पागल हो गयी है?" उसने हैरत से पूछा।
"हाँ इतने साल मैं पागल ही तो थी। अब अक्ल आ गयी है। क्यों डरती फिरुँ मैं मर्दों से... जा निकल मेरे घर से।"

अनारकली ने दरवाज़े के पास जाकर दरवाज़े की चिटकनी खोल दी। अंगुली से बाहर का रास्ता दिखाया। बशीरा उसे आश्चर्य से देख था। यूँ तो रोज़ ही छोटी-छोटी बातों में तू-तू मैं-मैं होती रहती थी। एक दूसरे को फाड़ खाने की नौबत आ जाती थी पर जल्दी वापस दोस्ती हो जाती थी और गले में बाहें डाले खुशी से जीने लगते।
"मैं तुझे तलाक देती हूँ," वह ज़ोर से बोली "जा भाग यहाँ से ...!"
"तुझे होश नहीं है ...," न जाने क्या सोचकर वह तेज़ी से बाहर चला गया।

मृदुला ने ख़ुद को कागज की नाव की तरह अतीत के प्रवाह में बहने छोड़ दिया अतीत की घटनाएँ उसकी आँखों के सामने तैरने लगी। अगर उसकी ज़िंदगी में वो लम्हे नहीं आते तो शायद वह कभी मशहूर दाई का काम नहीं करती होती। किसी करोड़पति घराने की बहू बनकर ऐश कर रही होती।

तब उसके चारों तरफ उजाला था। शाम होते ही आसमान रंग-बिरंगा हो जाता था। हर सुबह ख़ुशबुओं से महकती थी।

कहीं कोई अभाव नहीं था। वे दिन कितने ख़ुशनुमा थे। चिड़ियों की उड़ान उसे कितनी अच्छी लगती थी। अब तो आसमान मटमैला हो गया है। धूप सवेरे की ठंडी हवा को जलाने लगी है। किरणें तिलमिला कर गर्म हो गई। उसे लगा किसी अभिशापपूर्ण निश्वास सी गर्म हवा मेरे चारों तरफ बह रही है।

जब वह इस गाँव में आई थी उसके पास कोई सामान नहीं था बस प्रेमी द्वारा दिया गया नाम था अनारकली।

अनारकली.... अनार की कली सी सुन्दर...गोरे गुलाबी रंगत की नाज़ुक, नादान लड़की।

अधिक पैसे व प्यार ने उसे विद्रोही बना दिया था। माता-पिता ने मेरी बात नहीं मानी तो मैं उनकी बात क्यों मानूँ? मुझे प्रेम करनेवाला साथी मिल गया है तो घरवालों को ऐतराज़ क्यों?

बाहर वर्षा की झड़ी लगी थी। रिम-झिम की ध्वनि के बीच रेलगाड़ी अपनी तेज़ गति से दौड़ी जा रही थी। उनींदी आँखों से मृदुला ने चन्दनसिंह के सीने पर सिर रखते हुए पूछा "हम कहाँ जा रहे हैं? इस धरती पर हमारा स्वर्ग कहाँ है?"
‘‘शिमला...होटल में कमरा बुक है। वहाँ शादी करके वापस आ जायेंगे फिर तो हमें घरवाले अपना लेंगे।" चन्दन ने कहा
"ओ डार्लिंग ...माई लव," वह ख़ुश होकर बोली।
"तुम दुल्हन बनने के लिए गहने कपड़े लायी हो ना?"
"हाँ, पूरी तैयारी है ... देखो उन दोनों अटैचियों को रुपये...कपड़े, गहने सब...।"
"वैल!" उसके होठों पर भेद भरी मुस्कान थी।

चार दिन शिमला की यात्रा के रोमाँचक क्षणों में मन पसन्द साथी को पा कर स्वयं ही समझ न पायी कि कब वह समर्पिता बन गयी। प्रणय सागर में आकंठ डूबती रही।

उसका न तो मन कुंवारा रहा न तन। देह का सामीप्य और मन का नैकट्य पाकर वह ख़ुश थी। जिस पुरुष को पाने की अभिलाषा थी। वह सहज ही प्राप्य हो गया। उसके सान्निध्य से वह सम्पूर्ण नारी बन गयी।

मृदुला... मेरी प्रेमिका ने मेरे लिए त्याग किया है। मुझे लखपति बनाया है... तो मैंने भी उसे चार दिन भरपूर प्यार दिया है।
"अनार हमें यहाँ कोई पहचान लेगा। शाम की गाड़ी से हम नैनीताल चल रहे हैं...अब शादी वहीं होगी।"

गाड़ी अपनी रफ्तार से बढ़ रही थी। आस-पास प्राकृतिक दृश्य को देखते-देखते वह शादी के सपनों में खो गई। वह बेफिकर हो कर सो गई या चाय में मिलाई गयी नींद की गोली का असर था। जब उसकी आँख खुली सामने बर्थ पर चन्दन के स्थान पर एक महिला को सोते देखकर उसे आश्चर्य हुआ। उसने देखा चन्दन के साथ उसकी दोनों अटैचियाँ भी गायब हैं। वह घबरा गई। गहना, कपड़ा सब लेकर वह गायब हो गया।

ढलती रात में पीला चाँद खिड़की से रेल के साथ अकेला दौड़ता नज़र आ रहा था। उसका सब कुछ बिखर गया। वह डर व सर्दी से काँपने लगी।

सामने लेटी महिला ने उसे काँपते देखा तो अपने थर्मस से गर्म कॉफी निकाल कर प्याला थमाते हुए कहा "लो पी लो...तुम्हें ..."
"हाय मैं लुट गयी.... दीदी मुझे ...क्या हो रहा है?" वह रोने लगी।

डॉक्टर नीला गहरे सोच में डूब गई। उसे रोते देखकर उसकी स्थिति समझते देर नहीं लगी।

मृदुला को चन्दन से ऐसी आशा नहीं थी। अब यंत्रणाकातर दिल को किस तरह समझाये। उसके कपोलों पर आँसुओं की मोटी धार बह निकली। दर्द भरी सिसकियाँ गूँजने लगी।

अचानक उसके लुभावने सपनों को झटका लगा। अन्नो को लगा मेरे पाँव तपती रेत में धंस गये हैं। तपती रेत की जलन में उसके लिए ख़तरनाक स्थिति उत्पन्न हो गयी। चादर में मुँह ढक कर रोती रही।

गाड़ी एक छोटे स्टेशन पर रुकी। फेरीवालों की आवाज़ें उसके कानों से टकरायीं तो वह घबरा कर बैठ गई। खिड़की से चन्दन को तलाशने लगी।

"प्यार के ख़ातिर लोग क्या-क्या कर गुज़रते हैं। मैंने भी इतना बड़ा कदम उठाया। वह महीनों से मुझे छलता रहा और मैं उसके हाथों कठपुतली बनी नाचती रही।" उसने नीला को बताते हुए कहा "और मैं उसके पीछे चल दी। सच है कुछ फैसले माता-पिता को शामिल करके ही करने चाहिए," वह स्वयं से बतियाती रही।

"मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगी.... ये कुछ रुपये रख लो। टिकट बनवा लेना...घर चली जाओ...फिर किसी गलत हाथों में पड़..." डॉक्टर नीला ने समझाया लेकिन वह नहीं मानी। नीला ने सोचा घटनाएँ इंसान के जीवन को बनाती हैं और बिगाड़ती हैं। सच दुधारी तलवार की तरह होता है। इसने तो प्यार किया था। परिस्थितियों ने उससे ऐसा करवा दिया।

नारी का शत्रु कभी समाज होता है कभी प्रेमी। लेकिन कभी सबसे बड़ा शत्रु होता है उसका प्रेम। उसने सोचा इस हालत में इसे छोड़ना उचित नहीं होगा। कहीं गलत हाथों में पड़ जायेगी। चेहरे मोहरे से तो किसी उच्च घराने की लगती है।
"तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो। तुम्हारे घरवालों को बुलाकर सौंप दूंगी।"
"नहीं दीदी मुझे अपने साथ ही रहने दो। नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूँगी...में आपके पैर पकड़ती हूँ..." रोते हुए बोली "दीदी अब मैं घर नहीं जा सकती। देव तुल्य पिता की इज़्ज़त को पैरों के तले रौंदकर आयी हूँ। ऐसी कृतध्न औलाद हूँ मैं। उनके सामने क्या मुँह लेकर जाऊँगी।"

आसमान में बादल कभी दिखाई देते और दबे पाँव गायब हो जाते। एक-एक बूँद को तरसते लोग मन्दिरों में भजन-कीर्तन करते मस्जिदों में दुआएँ पढ़ते। उसे किसी से कोई मतलब नहीं था। गर्मी का दिन....चिलचिलाती धूप में बाहर निकलना कठिन होता दूर आसमान आग उगलता लेकिन नीला का काम ऐसा था कि मातृ दौड़ में कोई कमी नहीं आयी। बच्चे तो दुनिया में आने ही थे और डॉक्टर को उनका साथ देना ही था। अनार ने नीला के घर का काम सम्भाल लिया।

गहरे रंग का लहंगा चुन्दरी में उस छोटे से गाँव के बाज़ार में इधर-उधर घूम कर अन्नो सामान खरीदती तो कई उल्टी- सीधी बातें कर देती। उसने तो कोई काम किया ही नहीं था। सब औरतें उसे हैरत से देखती दाँतों तले अँगुली दबा लेतीं और मर्द ललचायी नज़रों से देखते। खुसर-पुसर करते। इतनी सुन्दर, देखने में रईस और काम नौकरानी का?

नीला तो उसे तराशने लगी थी। उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए कठिन से कठिन काम कराती। प्रसव कराना व दूसरा काम सिखाने लगी। मुँह पर कालिख लगने का दर्द उसने तब जाना जब उसे ज्ञात हुआ कि चन्दन का अंश उसके गर्भ में पल रहा है तो...? नीला ने उसे समय रहते फिर उभार लिया।

पाँच साल में अन्नो ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। नीला तो चली गयी लेकिन वह वहीं बस गयी। अन्नो दाई.... अचानक अपने अन्दर की पीड़ा और त्रासदी में गोते लगाने लगी। अब तो मैं चाहूँ तब भी नहीं लौट सकती। वह स्मृतियों के दंश चुपचाप सहती इस गाँव से गहरा रिश्ता जोड़ लिया।

माद्य महीने की कुनकनी धूप धरती पर पसर गयी फिर बूँदा-बूँदी शुरू हो गई। थोड़ी देर बाद जमकर बरसने के बाद वर्षा शांत हो जाती। सूरज बादलों के बीच झाँकने लगा।। पेड़-पौधे बरसात में नहाकर जैसे ताज़ा हो गए।

कभी फागुन आता टेसू की लालिका से गाँव रंग जाता। फागुनी बयार से वातावरण मादक बन जाता। खेतों में गेहूँ लहलहाते तो उसका मन मयूर नाच उठता।

उसका पेशा खूब फल-फूल रहा था। अतीत को भूलाने स्वयं को काम की व्यस्तता में बाँध लिया। लेकिन अकेली सुन्दर, भरपूर जवान औरत कदम-कदम पर परेशानियाँ आने लगी। एक दिन जागीरदार की हवेली से बुलावा आया। लड़का होने की... ख़ुशी की ख़बर देने जागीरदार के सामने गई।

"बहुत नाम सुना है अन्नो बाई तेरा।"

वह जागीरदार की नज़र चढ़ गई। कदम-कदम पर परेशानी ऐसे में कोई साथ नहीं देता। जब ऐसी ही ज़िंदगी गुजारनी है तो यही सही। दर-दर की ठोकरें खाने से तो... वह जागीरदार की शरण में आ गई। जागीरदार रईस हुसैन ने उसे रहने के लिए एक हवेली दे दी। ज़िंदगी में बेफिकरी व चैन तो आ गया। अब किसी प्रकार का किसी से डर नहीं। लेकिन अपनी दोस्ती के सदके रईस हुसैन अपने कई ऐसे काम साधता जो अन्नो का दिल गवाह नहीं करता फिर भी करने पड़ते।

अन्नो पैदाइशी दाई तो नहीं थी पर अनुभव बहुत था। साधारण प्रसव तो वह बातों -बातों में करा देती। पेचीदा से पेचीदा प्रसव भी हाथों हाथ निपटाने में माहिर थी।

दाई से कभी पेट छुपता? एक-एक मर्द, औरत, जवान, विधवा, तलाकशुदा व कुँवारी सभी औरतों की करतूतों पर पर्दा डालने वाली अन्नो दाई का सबसे गहरा रिश्ता था। गाँव की कोई गली ऐसी नहीं थी जहाँ अन्नो दाई के कदम नहीं पड़े। वह पूरे गाँव की राज़दार थी।

जज़्बात के बहाव में लड़कियाँ खुद को लुटाकर उस मंज़िल पर पहुँच जाती थीं जहाँ बदनामी की आग उनके पूरे वजूद को घेर लेती है।

उनकी माताएँ अन्नो के आगे हाथ जोड़ती, मिन्नतें करतीं अपनी इज़्ज़त आबरू बचाने की गुहार करतीं। अपनी बेटी को मारती-पीटती,उसके हवाले करतीं और एक मोटी रकम उसके कदमों में रख देतीं। उस लड़की की ज़िंदगी तबाह होने का दर्द... दूसरी तरफ भगवान का डर। लेकिन उसे अपने दिन याद आ जाते और उनकी ज़िंदगी बचाने का अहसास उसमें साहस भर देता। दिल में भगवान का डर निकल जाता और काली रात की ख़ामोशी के सीने में वो राज़ दफ़न कर देती।

अतीत कैसा ही मीठा हो या कड़वा वह उसे भूलना ही अपना हित समझती। बीस साल का समय कैसे सरका उसे पता ही नहीं चला। अन्नो दाई यश व कीर्ति के शिखर पर खड़ी थी।

जब बशीरा कालेज से निकल कर आया तो कोई काम-धंधा नहीं करता था। नौकरी लगी नहीं, बाप की रोटियाँ तोड़ता अधेड़ होने तक बाप का खून शराब के जरिए पी गया। आखिर बाप भी ख़त्म हो गया। माँ पैदा होते ही छोड़ गई थी।

एक दिन भूखा-प्यासा अनारकली के द्वार पर आ बैठा। एक बार खाना दिया तो सिलसिला चलता रहा। अन्नो को भी अपना अकेलापन खलता था। अपने दिल की बात किसी से करना चाहती थी।

बशीरे की बड़ी-बड़ी आँखों में खो कर वह अपने दुःख-सुख की बातें कर लेती। बशीरे ने उसका मन मोह लिया।
"बशीरा मुझ से शादी करेगा?" तन्हाईयों से उबकर अन्नो ने एक दिन अचानक पूछा।
"किस बूते पर? मैं तुझे बैठाकर रोटी नहीं खिला सकता...रोटी तो तुझे ही जुटानी पड़ेगी फिर शादी..,"
वह हँस दिया।
मृदुला..... नहीं...वह तो अनारकली है। बशीरा ने पूछा "मौलवी को बुला लाऊँ...?"

दोनों ने शादी कर ली। बशीरा के हाथ सोने की चिड़िया लग गई। ज्योंही अन्नो के हाथ में रुपये आते वह झपट लेता। कभी मज़ाक से...तो कभी जोर ज़बरदस्ती से। अन्नो दाई के पैसों के दम पर दनदनाता फिरता। शराब की नदी में डुबकी लगाकर मकान के सामने पीपल के नीचे पलंग पर पड़ा रहता। शादी से पहले जो ज्ञान की बातें करता था सब भूल गया।

अन्नो को शुरू से ही चाँदनी रातों में नींद नहीं आती थी। वह लेटे-लेटे देर तक चाँद को देख मन की बातें करती। माँ के नाम हवाओं को संदेश देती.... चाँद में छोटी बहन का चेहरा तलाशती.... उसकी आँखें चाँद पर टिकी रहती थीं।

अब भी उसकी रातें सोते-जागते पहले की तरह ही अजनबी घरों की औरतों के बीच गुज़रती थीं जो प्रसव पीड़ा से बेहाल उसके सामने कराहती पड़ी रहती थीं। उस वक्त अन्नो दाई नहीं एक हमदर्द माँ बन जाती।

अक्सर, बेहद कमज़ोर होने के बावजूद एक के बाद एक बच्चा जनने को मजबूर औरतें उसके पास आतीं। मर-मर के बच्चे को जन्म देने की तकलीफ उठाती। तब वह अपना क्रोध उन पर निकालती। फटकारती....गुस्से में उसके मुँह से हिन्दी, अंग्रेज़ी के शब्दों का उच्चारण सुनकर सब उसे हैरत से देखते। उन पर क्रोध बरसाने के बाद उस औरत का ख्याल भी बहुत रखती। वह औरतों की मजबूरी जानती थी। उसका गुस्सा मर्दों के प्रति होता था।
"ए बाई तुझे इतनी उम्र में भी बच्चे जनने का चाव है। अपने पति को क्यों नहीं कहती बस..."
कई औरतों से मज़ाक भी खूब करती।
"ए बीबी अब पता चलेगा कि प्रसव में कितना मज़ा आता है"

बशीरा प्यार तो बहुत जताता लेकिन उसकी कमाई पर राज करता। वह सोचती मेरा कौन बैठा है खानेवाला। सोचा था बशीरा पढ़ा लिखा है समझदार है पर हुआ उल्टा। हालात ने उसे तन्हा ज़िंदगी जीने को मजबूर कर दिया।

अगर किसी औरत को पति से दबते देखती तो उसे शेरनी बनने को उकसाती लेकिन ख़ुद बशीरा के आगे दब्बू बनी रहती।

यूँ तो जमींदार रईस हुसैन ने कई औरतों को अपनी ज़िंदगी में साथी बनाया था चाहे घंटे-दो घंटों के लिए ही पर अन्नो से दोस्ती पक्की थी। एक दिन हवेली जाते ही रईस ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, "कमरू मोची की बीबी पर मेरा दिल आ गया...अन्नो कुछ कर...।"
"लेकिन वह नहीं मानेगी...शेरनी है फाड़कर खा जायेग।"
"तेरे आगे सब पानी भरती हैं...तेरी कोशिश के आगे सब हथियार डाल देती हैं।"
"अच्छा कोशिश करती हूँ।"

चंदा तालाब पर पानी भरने जा रही थी। अन्नो पीछे चल दी। चंदा नाम की ही नहीं तन से भी चाँद है। सफेद दुधिया रंगत की तीस वर्षीय चंद्री के भाग्य में काली चादर थी। अपने से तिगुनी आयु वाले पति के साथ ज़िंदगी की नाव को जी-जान से खेती रही। कुछ महीनों में ही विधवा हो गयी।

विधवापन की काली चादर की पर्तों में खुद को छिपाने की नाकाम कोशिश करती पर चाँदनी छिटक ही जाती है। कमरू की मृत्यु के बाद कई लोग उसके पीछे लगे। कई प्रस्ताव भी आए लेकिन वह नहीं मानी। सास व कमरू के बच्चे ही उसके अपने थे। प्रस्ताव सुनते ही वह बिफर गयी।
"तू क्यों नहीं बन जाती उसकी रखैल?" चन्दा ने तड़ से जवाब दिया।
"मैं तो बहुत पहले ही अपना सब कुछ दे चुकी हूँ बहना। देख चन्दा मैंने तो बहुत भुगता है। सबको बस एक ही चाह होती है। अरे जब ऐसी ही ज़िंदगी गुज़ारनी है तो क्यों ना एक का दामन पकड़कर बैठा जाए। दर-दर की ठोकरों से क्या मिलेगा? ये गिद्ध वैसे भी नहीं छोड़ेगे।"
"हटो अन्नो बाई मुझे परेशान मत करो ... ।"
"कभी किसी ने सताया तो?... कौन बचायेगा ...इससे तो मैं कहती हूँ कि ऐसे वैसे मर्दों से बचना है तो एक की हो ले.... बंधी-बंधाई रकम हाथ आयेगी तो बच्चों की ज़िंदगी भी सुधर जायेगी और बूढ़े भी... ।"
"मैं यूँ ही ठीक हूँ। मैं मेहनत मजदूरी से नहीं घबराती। मै कुछ नहीं चाहती।"
"सुन यह ज़िंदगी की सच्चाई है तू बच तो नहीं सकती। बरबाद तो तुझे ये पागल कुत्ते कर ही देंगे... जिसके भी पीछे पड़े उसे कोई बचा नहीं पाया।"
"मैं सबका सामना करूँगी।"
"बहना मैंने भी बहुत सामना किया। मैं भी ऐसा ही सोचती थी पर हार गई... इसलिए मैंने भी एक का हाथ पकड़ लिया। अकेली औरत का इस दुनिया में रहना बड़ा मुश्किल है। तू सोच ले... अभी तो वह निकाह भी कर लेगा... ।"
"अगर वह निकाह करता है तो मैं हवेली में आ सकती हूँ," उसने कुछ सोचकर कहा।

जागीरदार ने उसका दिल रखने के लिए निकाह कर लिया। वह हवेली में आ गयी। दो रात बाद ही जागीरदार ने उसे उसकी हैसियत बता दी। उखड़ी-पुखड़ी दीवारों वाला और खपरैल की छतवाला हवेली के पीछे कमरा रहने के लिए दे दिया गया।
"अब बेगम की हाज़री में रह या हवेली से निकल जा...।"
"मैंने निकाह किया है। मैं हवेली से नहीं जाऊँगी" वह ज़िद पर अड़ गई।
"मैं तलाक दे दूँगा"

भैंसों के बाड़े के पास कमरे में पड़ी चंदा रोती रही। रोते-रोते उसे साहस आ गया। मैं सामना करूँगी। अपनी बरबादी का बदला लूँगी। उसने अन्नो को बुला भेजा। अन्नो आई तो उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। गुस्से की चिनगारियों ने आँसू सुखा दिए।

जब स्त्री अपने अन्दर से अनावश्यक भय व झिझक नकाल देती है तो साहस आ जाता है। अन्नो के आते ही वह भड़क उठी। शेरनी की तरह उस पर टूट पड़ी। चीख-चीख कर सबको बताने लगी।

"जागीरदार ने मेरा धर्म बिगाड़ा...उसने निकाह किया...अब ख़ुदा रसूल का वास्ता देकर तलाक दे रहा है। इतना मैं समझ गई हूँ कि जागीरदार ने निकाह क्यों पढ़ा ताकि आसानी से तलाक दे सके।"

अन्नो उसे शेरनी की तरह दहाड़ती देख खड़ी रह गई।
"कुरान शरीफ में लिखा है बिना कारण तलाक नहीं हो सकता। मैं ऐसे तलाक को क्यों मानूँ? जो धोखे से दी जा रही है।"

चंदा के ललकारने में जैसे कोई जादू था। इस तरह ललकारने से अन्नो में हिम्मत पैदा हो गई।
"मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकी? क्या पाया मैंने दब्बू बनकर?" उसने स्वयं से कहा। वह खिसयानी बिल्ली की तरह खड़ी चंदा का दहाड़ना सुनती रही थी।

चंदा का सबके सामने दहाड़ना सुनकर जागीरदार की मर्दानगी जैसे रूई की तरह धुनकर रह गयी।
"इस नकचड़ी को समझा अन्नो... इसे मोटी रकम देकर रवाना कर रहा हूँ पर नहीं मानती....," रईस ने हुसैन कहा।

इस पर चंदा और भड़क गयी। अन्नो को गालियाँ देते हुए कहा, "तुझ में हिम्मत होती तो तेरी आज यह हालत नहीं होती। किस लालच से ख़ुद को जागीरदार के पास रहन रख दिया? तूने कितनी औरतों को बिगाड़ा होगा? तेरे कहने पर मैंने निकाह किया...।"

चंदा का ऐसा रूप देखा तो अन्नो दाई की आँखें खुल गईं।
"सच मैं क्यों डरूँ इन मर्दो से?" उसका ग्लानि से सिर नीचा हो गया। मैंने ही इसकी ज़िंदगी बिगाड़ी है।
"थू है अन्नो तुझ पर...," चंदा ने उस पर थूक दिया।
"एक बात समझ कर मैंने निकाह किया था कि अब मर कर ही निकलूँगी। अल्लाह ने मर्दों को तलाक का हक दिया है पर साथ ही बिना वज़ह तलाक नहीं दे सकते, यह हिदायत भी दी है, पर पुरुष तो सोचता है मैं सब कुछ हूँ, जो करुँगा मेरी मरजी ही से चलेगा।"

वह रईस हुसैन के सामने जाकर खड़ी हो गई।
"तलाक देने का हक तो ख़ुदा ने औरत को भी दिया है पर औरत ने कभी बिना कारण पति को तलाक नहीं दिया। सब कुछ सह कर भी छली जाती रही। पर अब कब तक छली जायेंगी औरतें...?"

उसकी चेतना का तेज देखकर अन्नो की वर्षों से सोई चेतना जाग उठी। उसने रईस की ओर देखा उसे लगा चन्दन और रईस हुसैन में कोई फर्क नहीं।

क्रोध से उसकी कनपटियों में रक्त तेज़ी से प्रवाह होने लगा। उसके मुँह से हिन्दी और अंग्रेज़ी में जागीरदार के लिए अपशब्द निकलने लगे। उसके मुँह से हिन्दी और अंग्रेज़ी का उच्चारण सुनकर सभी उसे आश्चर्य से देखने लगे।
"तूने इससे शादी की है। यह औरत कोई आवारा, बदचलन नहीं है समझे। जागीरदार यह औरत तेरी पत्नी है।"
अन्नो के भीतर का उद्वेग बाहर की सच्चाइयों से दो चार होने लगा।
"चंदा तू सही है। क्यों ज़्यादती सहेगी तू... क्यों डरूँ मैं भी ...।"

चंदा का खूँखारपन को देखकर उसमें भी सोती मृदुला जाग गई। एक टूटी-फूटी औरत जाग गई। वह हवेली से बाहर आयी।

जो मोहब्बत में डूब सकती है वह दिलेर होती है और औरत की दिलेरी ख़तरनाक होती है। क्योंकि वह बहुत सच्चाई से मोहब्बत करती है और उतनी ही सच्चाई से मर्दों से नफ़रत भी कर सकती है।

वह सोचती आगे बढ़ रही थी। बाहर से कुछ नहीं बदला। लेकिन मन के भीतर सब कुछ बदल गया। जैसे वह नयी ज़िंदगी की तरफ कदम बढ़ा रही है।

अब वह बशीरा के बारे में सोच रही थी। उसका निकम्मापन व बेग़ैरती....क्यों सहूँ मैं? बरसों से मुझ पर हुक्म चला रहा है।

अन्नो ने फैसले के अन्दाज़ में उसे कहा, "बीबी की कमाई पर ऐश करता है और उसे ही हरामख़ोर कहता है। हुक्म चलाता है। जा बुला ला तेरे मौलवी को। आज मैं तुझे तलाक दूँगी...तलाक!"

जैसे नई ज़िंदगी मिल गई। ...जैसे नंगी डालियों वाले पेड़ अचानक फूलों से लद गये हो। सारी प्रकृति बदल गई।

"अन्ना बाई...अन्नो बाई"

वह पुकार सुनकर दरवाज़ा खोलकर खड़ी हो गई।
"इसे बचा लो....इसकी मुहब्बत ने इसे ज़िंदा लाश बना दिया... अन्नो बाई इसे बचा लो। इसका बाप इसे मार डालेगा...इसे..."
"क्या यह..."

औरत ने बिना कुछ कहे सकारात्मक रूप में सिर हिला दिया और साथ ही प्रश्नसूचक निगाहों से उसे देखा। वह नादान लड़की खाली-खाली निगाहों से उसे देखकर सिर झुकाये उसके पैर पकड़ने लगी।

अन्नो ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा तो उस लड़की ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए और सिसकने लगी। इससे पहले उसके भीतर का दर्द ... स्नेह आँसू का सहारा लेकर बाहर आता। एक नादान लड़की की ज़िन्दगी.... खुशियों को बचाने चल दी।

नई जिन्दगी की शुरूआत में ...नई सोच के साथ...अन्नो आगे कदम बढ़ाने लगी। घर से निकली मोहब्बत में धोखा खाई लड़कियों का सहारा अन्नो बाई .... कुछ अनाथ बच्चों की किलकारियों से उसकी तन्हाई दूर हो गई।

ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर घास के छो्टे-छोटे पौधे उग आये। हरी-हरी पत्तियों के बीच छोटे-छोटे...कहीं पीले, कहीं लाल फूल खिलने लगे। पेड़ों में बया के घोंसले लटक रहे थे। उनमें नयी ज़िन्दगियाँ पल रही थीं।

पत्तों पर कभी कोई कीड़ा फुदकता तो अन्नो को लगता मेरी आत्मा भी ऐसे ही...!


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