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ISSN 2292-9754

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09.23.2014


मौसम और पहली

घड़ी में सात के घंटे बजने लगे, उसकी नींद उड़ गई। सुबह के सात बज गए थे, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे अभी भोर नहीं हुई है। बादल छाए हुए है। कल रात बरसात के साथ ओले गिरे थे इसलिए सर्दी बढ़ गई। बिखरे केशों को हाथ से ठीक करते हुए सरला बिस्तर से बाहर निकली और बच्चों को आवाज लगाई।

"अरे मुन्नी...पप्पूडा....उठो। ....झट तैयार जाओ स्कूल ने मोड़ौ हो जावैला...," हाथ मुँह धोते हुए उसने फिर आवाज़ लगाई।

"अरे आप भी उठो कनी....टाबरां ने तैयार कराओ....आज स्कूल छोड़कर आना पड़ेगा। आज तो बहुत देर हो गई है।"

"क्या है घड़ी भर सोने भी नहीं देती," वह उठ कर पलंग पर बैठ आँखें मसलते हुए बोला। आकाश में काले बादल इधर-उधर दौड़ रहे थे।

"अरे उठो कनी....बैठा ई रैवोला कांई?....मुन्नी....पप्पूडा....सुता ही रैवोला कांई?" रसोई में जाते हुए उसने फिर आवाज लगाई। मुन्नी भाई-बहन को लेकर रसोई में आ गई।

"म्हारो मुंड़ौ कांई देखो हो झट तैयार हो जाओ...जितने मैं पराठे सेकती हूँ," उसने आलू छौंकते हुए कहा। उसकी सामने छत पर दृष्टि गई। बाँस पर बँधा ऐंटिना हवा के साथ धीरे-धीरे हिल रहा था। इसे वापस बाँधना है। सोचती हुई आलू छौंकते हुए सोचा। धुँए से काली हुई दीवारें रसोई में अँधेरा बढ़ा रही थी।

सरला ने तेल के डिब्बे का ढ़कन्न खोलकर देखा, तेल तो पैंदे में है, वो अंगुलियों पर दिन गिनने लगी। अभी तो वेतन आने में चार दिन बाकी है। एक तारीक को वेतन मिलेगा। वह पूरे तीस दिन का अंगुलियों पर हिसाब रखती है।

वेतन तो पहली तारीख को आता है लेकिन बीच में खर्चा बहुत हो जाता है। बीस तारीख के बाद तो घर में एक सन्नाटा सा छा जाता हैं दोनों के पास कहने सुनने को कुछ नहीं होता। वे दोनों जानते हैं कि खाने-पीने का सामान समाप्त होने वाला है और दूसरे खर्चे भी खींचतान कर निकालने होते हैं एक तारीख को जैसे घर में उत्सव होता है। उस दिन वो धुली हुई साड़ी पहन दर्पण के सामने बैठकर चोटी बनाती है। घर का काम करते हुए दिन में कई बार फिल्मी गाने गुनगुनाती रहती है। शाम पति के घर आने पर वेतन हाथ में ले पति के साथ बाज़ार जा कर महीने भर का किराने का सामान लाती है। बच्चों को टाफियाँ दिलाती है।

चपरासी पूनाराम को तो छुट्टी के दिन से दूसरे दिन अधिक अच्छे लगते हैं। बाबुओं के बीच फायलें इधर-उधर करते हुए उनके हँसी-मज़ाक में शामिल होता। रघुआ के कैंटीन की गर्म-गर्म भाप निकलती चाय पीता। दफतर में दिन कब बीत जाता उसे पता ही नहीं होता। शाम पाँच बजते ही दफतर बंद कर ताला लगाकर पिता की वसीयत में मिली साइकिल पर सड़कों का चक्कर लगाता घर पहुँचता। रोज़ की तरह आज भी पूनाराम दफतर पहुँच चुका था लेकिन मनमोहक मौसम के बीच उसका मन बाहर ही अटका हुआ था।

"हैलो क्या....क्या दाल के पकौड़े बना रही हो.....नहीं सुमन मैं अभी घर नहीं आ सकता......तुम अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक पर जाओ, मेरी तो अभी ज़रूरी मिटिंग है," बात पूरी करते ही ही साहब ने फोन रख दिया। कमरे के बाहर स्टूल पर बैठे पूनाराम ने अधिकारी और उनकी पत्नी की बातें सुनी। दाल के पकौड़े। बड़े लोगों की बड़ी बातें। साहब तो नहीं जा सकते लेकिन मैं तो जा सकता हूँ। वह मन ही मन मुस्कराया। आज तो सरला के साथ पिकनिक जाऊँगा।

"साहब मेरी पत्नी के नानाजी का देहान्त हो गया है," हलाहल झूठ बोलकर छुट्टी ले ली।

मौसम वास्तव में बड़ा सुहावना था। काले बादलों की चादर आकाश को दूर तक ढके हुए थी।

हवा इतनी ठंडी थी कि बस....उसका दिल खुशी से झूम गया। कुदरत की ख़ूबसूरती और मनमोहक दृश्य....पेड़-पौधे बरसात के पानी में नहा कर ताज़ा हो गए थें शीतल हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया....वह भाव विभोर हो गया।

पत्नी के साथ सर्दी की रेशमी धूप में बगीचे में बैठ कर पकौड़े खाना कितना अच्छा लगेगा। उमंग से भरा पूनाराम तेज़ी से साइकिल के पैडल चलाता जा रहा था। उसकी आँखों के सामने पिछले दिन फिल्म की तरह घूम रहे थे। दुबली-पतली तीखे नाक नक्श वाली, साँवली रंगत की सरला कितनी अच्छी लगती थी। अब तो घर की परेशानियों में उलझकर कितने वर्ष हो गए,कभी दो घड़ी बैठकर प्यार के दो बोल भी दोनों नहीं बोल पाते हैं...ज़िंदगी की तनातनी में। वह घर का काम करने में लगी रहती है और पूनाराम साइकल से घर और दफतर के बीच छः किलोमीटर की दूरी तय कर थक कर घर आता। कई कारणों से दोनों के बीच एक सन्नाटा सा पसरा रहता। अब न तो प्यार करनेवाला वो पूनाराम रहा और ना ही वह चुलबुली सरला। बस एक घेरे में चलती ज़िंदगी है, जिसमें दोनों अपनी-अपनी भूमिका में बँधे हुए जी रहे हैं।

उसने हाथ पर बँधी घड़ी देखी। अभी एक नहीं बजा है घर के करीब पहुँचते हुए दिल ने चाहा सरला को ज़ोर से आवाज़ दूँ और वह दौड़ती हुई आकर मेरे सीने से लग जाये। उसका मन हुआ शीघ्रता से घर पहुँच कर सरला को बाँहों में लेकर प्यार से उसका तन-मन भिगो दूँ। वो साइकल पर जैसे उड़कर घर पहुँचा और घंटी के बटन पर अंगुली रख दी। घंटी की आवाज़ सुनकर सरला ने दरवाज़ा खोलते ही पति को दरवाज़े पर खड़ा देख घबराकर पूछा, "कांई हुयौ...वापस कैसे आ गए?"

"अरे कुछ नहीं यूँ ही आ गया। बस मन में तेरी याद आई और मैं आ गया," उसने मुस्कराते हुए कहा।

"मजाक मत करो....तबियत तो ठीक है न। उसे वास्तव में चिंता हो गई। बात मत बनाओ जी।" वह उतावली होकर पति के चेहरे पर हथेली रखकर तापमान देखने लगी। "बुखार तो नहीं है....फिर सिर दर्द है क्या?’’

मैं बिलकुल ठीक हूँ। यूँ ही छृट्टी ले ली बस," उसने हँसते हुए कहा।

"हटो मुझे नाहक डरा दिया। मैं अच्छी भली बर्तन माँज रही थी," अपने राख से भरे हाथ दिखाते और पति के चेहरे पर लगी राख देखकर मुस्कराती हुई बोली।

"अरे यह बर्तन-भांडे का किस्सा छोड़। इधर आ मेरे पास बैठ, कोई प्रोग्राम बनाते हैं," वह पलंग पर पसरते हुए बोला। सरला आश्चर्यचकित सी उसे देखने लगी। थोड़ी चाय तो बना ला और बाद में थोड़ी गर्मा-गर्म दाल री पकोड़ी भी," वह बड़ी मौज में बोला।

"ये अचानक क्या सूझा है आपको?" वह एक बार फिर पूछकर चाय बनाने चली गई।

"यार पूनिया लगता है यह सारा मूड चौपट कर देगी," उसने स्वयं से कहा।

"तूने तेरे लिए नहीं बनाई," चाय का एक प्याला देखकर पूछा।

"घड़ी-घड़ी चाय पीवूँगी तो शक्कर कितने दिन चलेगी।"

चाय का घूँट लेते हुए पूनाराम का मुँह कसैला हो गया।

"कितना जताती है कि एक कप चाय ज्यादा बन गई तो शक्कर का टोटा पड़ जायेगा। वह चुपचाप चाय पीता रहा।

"अच्छा थोड़ी देर बैठ तो सही, कहीं जाने का प्रेग्राम बनाते हैं।’’

"अभी नल बंद हो जायेगा.....कपड़े अभी नहीं धुले तो कल तक सूखेंगे भी नहीं ...बच्चे कल क्या पहनकर स्कूल जायेंगे," सरला के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी। वह बर्तन साफ करके कपड़े धोने बैठ गई।

"अच्छा काम जल्दी निपटा ले, फिर घूमने चलेंगे," उसको तो जैसे आज धुन चढ़ी हुई थी।
"अरे आप बैठा-ठाला ने की न कीं सूझे। अजीब-अजीब बातां सूझ रैयी है। दो बजे बच्चे घर आयेंगे...और आते ही रोटी माँगते है। आप जाओ कहीं घूम फिर आओ। मुझे तो मरने की भी फुरसत नहीं है।"

"और मैं तेरे खातिर आया जो?" वह चिढ़कर बोला।

"तो मैं क्या करूँ। आप बेटैम आए ही क्यों?’’ वह हँसते हुए बोली।

"तुझे पूछकर आना था गलती हो गई बस। अच्छा काम निपटाकर थोड़ी दाल की पकौड़ी तो बना लेना।"

"देखो जी अभी दाल की पकौड़ी बनाऊँगी तो पूरे चार समय का तेल खत्म हो जाएगा।" सरला की भौहों में बल पड़ गए। वह भुनभुन करती काम करती रही।

"अरी भागवान आज तो पकौड़े खिला देती, कल की कल देखते," वह ढीठ होकर बोला।

सर्दी की कुनकुनाती धूप आँगन में पसरने लगी। मोहल्ले के नंग-धड़ंग बच्चे भी सर्दी के कारण फटे-पुराने कपड़े पहनकर सामने पिचपिच करती गीली मिट्टी में खेल रहे थे।

मैं कितने चाव से घर आया था लेकिन इसे तो कोई परवाह ही नहीं है। अन्दर ही अन्दर उसकी खुशी दम तोड़ने लगी। वो पलंग पर लेट गया। लेटा-लेटा सोचने लगा - बगीचे की हरी कोमल दूब पर बैठ कर सरला के साथ पकौड़े खाना और प्यार भरी मीठ-मीठी बातें करना, मगर इन श्रीमती जी को तो किसी बात से मतलब ही नहीं।

बरसात का मौसम तो जैसे इसका शत्रु है। जूतों के साथ कीचड़ घर में आता है, तब इसे क्रोध आता है। कपड़े नहीं सूखते हैं तो....और वर्षा आती है तब आँगन गीला होने की परेशानी। गीला आँगन इसे नहीं सुहाता। सर्दी में ओढ़ने-पीनने की परेशानी, तो गर्मी में बिजली-पानी की कटौती का दुख। सभी मौसम जैसे इसकी जान के दुश्मन हैं। धूप के झीने परदे से पेड़ की छाया सामने की दीवार पर पड़ रही थी। उसने आस-पास के घरों की ओर दृष्टि डाली। हर घर का सन्नाटा कह रहा था कि बच्चे घर नहीं है तो खामोशी छाई है।

उसने "पहले भी कभी कोई फरमाइश की तब भी यह नहीं मानती। " सरला आज सिनेमा चलें।"

"आज नहीं मुझे तो बहुत करम है आप जाओ..." वह जानता है यह सब पैसा बचाने के लिए करती है। यह मशीन की तरह पूरे दिन काम करने में लगी रहती है। एक-एक पैसे को दाँत से पकड़ती है मानो सब चिंता इसको ही हैं मुझे तो जैसे कोई फिकर ही नहीं। जैसे पूरी दुनिया में यह बेचारी ही घर का काम करती है दूसरी कोई औरत काम नहीं करती। दिमाग आसमान पर चढ़ गया है इसका। वह मन ही मन ताव खाता पलंग पर बैठा बड़बड़ाता रहा। धीरे-धीरे उसकी चिढ़ बढ़ती गई। सरला के प्रति क्रोध बढ़ता गया। वह वापस पलंग पर लेट गया। उसका मन हुआ इसको रूई की तरह धुन दूँ।

पलंग पर सोते-सोते एक बार फिर उसने सरला की ओर देखा। अक्सर जब भी वह रंगीन सुहावने सपनों की बातें करना चाहता है, तब वह घर का रोना लेकर बैठ जाती। पति से पैसों को लेकर झगड़ा, बच्चों के स्कूल का काम कराने की परेशानी या महंगाई की बातें करती रहती। पूनाराम उसकी बातों से परेशान हो जाता। एक तो सरकारी नौकर और बाबू लोगों का साथ.... करेला और नीम चढ़ा। सब बात का नतीजा कि किसी न किसी बात से वह सरला पर रोब रखता। स्वयं को किसी बाबू से कम नहीं समझता।

ला दिन रात घर की ज़िम्मेदारियों के कारण दिन पर दिन घर से जुड़ती गई और स्वयं को हालात के हवाले कर दिया। उन लोगों की सोच में सदियों का फासला होता गया। वो कम बोलता और वह अधिकतर चुप ही रहती। उसने काम करते हुए अचानक पति की ओर मुस्करा कर देखा। उसकी तिरछी नज़र पूनाराम की नजर से टकराई। पति का बेवक्त घर आना ...प्यार भरी बातें.... सुख लूटने का न्यौता...वह सब समझती है। वह अन्दर ही अन्दर खुश हुई। उसके होठों पर दबी मुस्कान थी। पास जाकर बैठूँ या काम करूँ? पति क्या सोच रहा हैं ...ऐसी बात नहीं कि वह समझ नहीं पा रही। पति के भौंहों पर पड़े बल देखकर वह थोड़ी परेशान हुई। काम छोड़कर पास जा खड़ी हो गई।

उसके कोमल हाथ पर मज़बूती से अपना हाथ दबाते हुए उसने पूछा, "तेरा मन नहीं होता मेरे पास बैठने का?"

"तुम तो मेरे ही हो... कहीं भाग रहे हो क्या?" उसने हँसते हुए पूछा। उसकी इस प्रकार सरल हँसी के साथ पूछने पर पूनाराम को भी हँसी आ गई। वह हँसते हुए वापस जाकर काम करने लगी।

पूनाराम के विचारों ने पल्टा खाया। कितनी भोली है यह। पूरे घर का काम अकेली करती है। इतने थोड़े पैसों से कितना सोच समझ कर घर चलाती है। आज महंगाई के समय कितनी मुश्किल से घर की गाड़ी चलती है। बेचारी रात दिन घर की चक्की में पीसती है। इसका क्या कसूर?

मन में यह विचार आते ही सरला पर आया क्रोध हवा हो गया। उसके दिल में सरला के प्रति प्यार की गहरी लहर उठी। रुपयों पैसों की कमी से कितने झगड़े हो जाते हैं। परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं तो मन की उमंगें खुद ही समाप्त हो जाती हैं सच्चाई तो यह है। वह सरला को प्यार भरी नज़रों से देखता हुआ अचानक उठकर उसके पास जा खड़ा हुआ।

अब क्या हुआ? क्या फिर कोई नई फरमाइश सूझी है आपको ?" वह मुस्कराती हुइ्र बोली।

"हाँ अबै तो नवी टणाटण फरमाइश है.... अपने गरीबी का दोस्त आलू....बहुत सारी आलू की सब्जी बना ले और गर्म-गर्म रोटियाँ। ...आज तो मैं चूल्हे के पास बैठकर खूब मजे से खाऊँगा। ....पहली तारीख तो अभी बहुत दूर है," वह मुस्कराते हुए बोला।

"बरसात .... पहली तारीख देखकर नहीं आती है," पति-पत्नी जोर से हँसने लगे।


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