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ISSN 2292-9754

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09.02.2014


चिड़िया एक माँ

समीया जल्दी -जल्दी रोटियाँ सेंकने लगी।

फूँ....फूँ.....फूँ.....।

फूँकनी से चूल्हा फूँकते ही लकड़ियाँ जल उठीं। घर में रोटियाँ सिकने की सुगन्ध फैल रही है। बच्चे चूल्हे के पास बैठे ख़ुश नजर आ रहे हैं रोटियाँ सिक गईं। समीया ने सब्जी छौंकी.....।

जलते मिर्च मसालों की दम घोंटने वाली हवा। आँख, नाक व गले में हलचल मचा गई।

आक छी... अचानक छींक आने से समीया का सपना टूट गया। शरीर में तेल सा कलकलाता खून.....भीतर की धुएँ सी घुटन। गर्म-गर्म रोटियों सा जलता बदन और पेट में भूख की आग उसका गला सूख रहा था। पसीने से तर-ब-तर बदन, पल्लू से पसीना पोंछ कर वह उठ खड़ी हुई। पर खाली हाथ घर जाने की हिम्मत नहीं हुई। वापस वहीं नीम के नीचे फुटपाथ पर बैठ गई। कपड़े की बनी थैली पास ही पटक दी। अन्दर ही अन्दर आँसू उमड़ रहे थे। कई बार ऐसा हुआ घर में जो कुछ होता सास व बच्चों को खिला ख़ुद भूखी रह जाती। आज तो कुछ भी घर में खाने को नहीं था। मन में विचार आया जन्म लेते ही बच्चों का गला दबा दिया होता तो?

बच्चों की बातें कानों में गूँज रहीं थी। "माँ खाना और खिलौने लेने जा रही है। शालू तू रो मत।" वीमू छोटी बहन को गोद में ले बहला रहा था। छोटी उम्र में ही उसे समय ने बहुत कुछ समझा दिया वह अपनी ज़िम्मेदारी खूब समझता है। अपने बच्चों के प्रति अगाध स्नेह से आँखें भर आईं। वीमू की बात हृदय में शूल सी चुभ गई। मन एक तीखी वेदना से तिलमिला उठा। खुलकर रोना चाहा। अन्दर ही अन्दर कुछ घुटता रहा। सूर्यास्त हो चुका था। शाम धीरे-धीरे गहरा रही थी। "क्या करूँ..?"

पेट खाली ऊपर से मानसिक संघर्ष। उमड़ते आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी। समीया के ये दो साल..... वह कितनी परेशानियों से घिर आई थी। परेशानियों के गहरे समुन्दर के बीच फँसी बड़ी हिम्मत व धैर्य से अपनी नैया पार लगाने की कोशिश में लगी है।

गुमसुम बैठी समीया को बीते दिन याद आने लगे। चौदह बरस की उम्र में शादी हो गई। पति बीमार व अधेड़। अपने ग़म में संतुष्ट थी। दो बच्चों की माँ बन गई। माँ, पत्नी व दो बच्चे। परिवार बढ़ने लगा गरीबी से तंग आकर समीया का पति बड़ी आशा से शहर कमाने गया। कुछ दिन बाद ट्रक एक्सिडेण्ट में उसकी मृत्यु हो गई। समीया का सुहाग उजड़ गया। पति की अकाल मृत्यु हृदय पर सबसे कठोर दैवी आघात लगा गई। बेटे की अकाल मृत्यु का माँ को बुढ़ापे में धक्का लगा। उसने चारपाई पकड़ ली। दिन बड़ी कठिनाई से बीतने लगे। पति का देहान्त हो गया तो महाजन ने कच्चे मकान पर कब्ज़ा कर लिया। समीया ने घर को ही नहीं कस्बे को ही छोड़ दिया। बीमार सास व दो बच्चों के साथ शहर आ गई। सोचा भूखे मरने से तो शहर जा कर मजदूरी कर लूँगी। जो कुछ पास था उससे खोली का इन्तज़ाम बड़ी मुश्किल से हो पाया। खोली क्या थी...नाम से ईंटों की नंगी दीवारें। एक छोटी रसोई और एक छोटा कमरा। चाली की सभी खोलियों की यह दशा थी। झुग्गियों के भीतर गरीबी और बेबसी झाँक रही थी। घर में थोड़ा सा सामान था वह भी फटा-पुराना व धुएँ से काला हो गया।

पड़ोस की खोलीवाला ....तानू। मिल में कपड़ा बुनता है पर ख़ुद के तन पर कपड़ा नहीं, न रहने का ढंग, न पहनने को कपड़ा। फिर भी शराब पीकर मस्ती से टूटी खाट पर पड़ा पहाड़ी गीत गाता घरवालों की याद में खोया रहता है। बड़ा भला इन्सान है। कभी-कभी समीया की मदद कर देता है। पर रोज़-रोज़ वह भी उधार नहीं दे सकता।

पड़ोस की औरतों से मिलना हुआ। उनमें से एक ड्राइवर की पत्नी कुन्ती...दूसरी शान्ता बाई दोनों के पति पीपल के नीचे बैठ ताश खेलते रहते हैं। दोनों सजधज कर घूमती रहती हैं, नाम की कचरा चुगती हैं और अक्सर मुर्गे और शराब से भूख मिटाती हैं। समीया रात दिन काम की खोज में फिरती। कई जगह काम मिला पर एक दो महीने या कुछ दिन के लिए ही। संघर्ष में दिन कटने लगे। जो मिलता उतने से ही संतोष कर बच्चों को पालने लगी। इन दो वर्षों में शहर आने के बाद कितना कुछ घटा....कई घटनाएँ उसकी आँखों के आगे घूम गईं। काम की खोज में एक जगह गई। सेठ उसे देखकर बड़ा ख़ुश हुआ। ज़बरदस्ती उसके हाथ में दो-चार नोट थमा दिए। बिना काम के पैसे। कुछ समझ में नहीं आया। वह सेठ का मुँह ताकने लगी।

"तुझे दूकान पर काम दूँगा," उदारता दिखाते हुए सेठ ने समझाया।

"सेठ जी मुझे घर में काम पर लगा दो ना मेरे छोटे-छोटे बच्चे है। मैं झाडू-पौछा कर दूँगी। कपड़े धो दूँगी। खाना पका दूँगी," समीया ने मिन्नत की।

"तेरे हाथ का बना खाना हम कैसे खा सकते हैं?" उसने नाराज़गी जताई। "भला तेरी जात....."

"मेहनत मजदूरी करने वाली हम नीच जात की अपवित्र औरतें को आप जैसे धनी लोग....पचित्र ऊँचे धर्म के लोग खा जाते हैं। अपनी भूख मिटाते हैं और लोगों के सामने ....तो वाह रे वाह पवित्र ....धनी जात के लोग।" वह मन ही मन सेठ को भला बुरा कहने लगी। उसने चारों तरफ देखा। आँगन में कितनी खुली औरतें हँसी मज़ाक करते हुए काम कर रही थीं। सब उसे ही देख कर हँस रही थीं। उनके चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान थी।

सेठ की भूखी नज़र ....।

वह रुपये वहीं फेंक तेज़ी से कदम बढ़ाती बाहर निकल गई। उन औरतों के भद्दे मज़ाक समीया के कानों में गूँज रहे थे। यूँ महसूस हुआ जैसे हज़ारों तीखी नज़रें उसकी पीठ पर घूम रही हैं। उसे लगा जैसे बीच बाज़ार में निर्वस्त्र कर दी गई है। कई जगह काम करने गई थी। हर जगह कोई न कोई परेशानी का सामना करना पड़ा। वह सोचती यह लोग हमारी बहन-बेटियों को ताकते रहते हैं, हमारी गरीबी का फायदा उठाते हैं, गरीब औरतें मजबूरी में फटे कपड़े पहन कर काम पर आती हैं।

सेठों के घर की औरतें....बेटियाँ...बहुएँ तन पर कपड़ा होते हुए भी तन ढका नहीं। इस बात की कोई चिन्ता नहीं। कोई बदनामी नहीं। उनको अध-खुले वस्त्रों में देखकर गर्व महसूस करते हैं। 

वह दिन......उस दिन की याद आते ही काँप गई। घोर काले बादलों में आसमान ढका था। मूसलाधार बारिश में शाम के अँधेरे को गहरा बना दिया था। बड़े थके भाव से समीया रसोई के अन्दर जूठे बर्तन के ढेर में बैठी जल्दी-जल्दी बर्तन माँज रही थी। बीमार बच्चे की चिन्ता सता रही थी।

टप-टप कई आँसू आँखों से घिरे। वह सोच रही थी। गरीबी और बीमारी की गहरी दोस्ती है। हर घर में बीमारी बनी रहती है। अभी कोई बीमरी तो कभी कोई बीमार।

"समीया....अरी समीया," मालिक की आवाज सुन चौंक पड़ी।

"आई मालिक," पल्लू से हाथ पोंछते जवाब दिया।

"पानी लाना," अन्दर से आवाज आई। बिखरे बालों को हाथ से सँवारा, पल्लू सिर पर ढकते उठ खड़ी हुई उसे मालूम था मालकिन पड़ोसन से मिलने गई है। अचानक मालिक घर आ गए। समीया उनकी नज़र में तभी चढ़ गई थी जब से उसे घर में काम करने रखा गया। परन्तु शिकार बनाने का आज मौका मिला।

"पानी" उसने पानी देते हुए मालिक को देखा। मालिक की भूखी नज़र....वह अन्दर ही अन्दर काँप गई। मालिक ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। वह स्तब्ध रह गई।

"आपको शर्म आनी चाहिए," वह उसकी कंटीली मुस्कान देखकर बिफर गई। 

"शर्म तो तुम्हारे भगवान को आनी चाहिए जिसने तुम्हें गरीब विधवा बनाया," सेठ ने बेशर्मी से कहा।

"मैं जान दे सकती हूँ मगर इज्जत नहीं। यह व्यवहार आपकी बेटी के साथ कोई करे तो?"

"चुप रह!" बेटी का नाम सुनते ही वह क्रोध से भर उठा। अपनी शक्ति लगाकर ख़ुद को बचाने की चेष्टा में वह तेज़ी से दरवाज़े की ओर बढ़ी। कमरे के बाहर निकलते दरवाज़े से टकरा कर गिर पड़ी। समीया के मुँह से चीख निकल गई।

"क्या हुआ?" मालकिन ने अन्दर आते हुए उसे सिर पकड़े देखकर बैठा देख कर पूछा।

"मालकिन मैं दीवार से टकरा गई थी," वह दर्द से कहरा उठी।

"ओह!"

"यह मेरा पर्स चुरा कर भाग रही थी तुम तो घूमती फिरती हो," मालिक ने चिल्लाते हुए अपनी पत्नी से कहा।

"यह झूठ है मालकिन....ओह...!" समीया दर्द से बेचैन हो दोनों हाथ से सिर पकड़ लिया। वह अनजाने भय से काँप रही थी। नौकरी छूटने का डर फिर झूठा आरोप। परेशान, बदहवास सी समीया घर पहुँची। चेहरे पर नील का निशान व सूजन देख सास घबरा गईं पर समीया गुमसुम बैठी रही। दिन बीतते रहे...

मजबूरी उसे बीड़ी बनाने की फैक्ट्री में ले गईं फैक्ट्री के मुनीम की आँखों में समीया ने उस ‘भूख’ की झलक पाई। हर स्थान पर उसे भूखी नज़रों का सामना करना पड़ता। वह सोचती बच्चों की भूख के लिए यह सब सहना ही पड़ेगा।

श्याम रंग के सफेद बालों वाले। आँखों में सुरमा डाले महीन कुर्ता पहन, मुँह में पान चबाता, मुनीम बेतकल्लुफ़ हर किसी के पास आ बैठता। काम के समय पास आकर सटकर बैठने की कोशिश काम देखने के बहाने बार-बार छूना। स्त्रियाँ कभी शर्मवश उन कही बातों को व्यक्त नहीं कर पातीं। वह बदनामी से डरती। काम छूटने का डर....वह सहम जाती। बच्चा बीमार है, दवाई के लिए पैसे चाहिएँ।

"कुछ पैसे चाहिएँ," बड़ी हिम्मत कर मुनीम से कहा। वह एकदम गुस्सा हो गया। आँखों की त्यौरियाँ चढ़ गईं।

"जब कहता हूँ रात की पारी में आ जाया कर रुपये अधिक मिलेंगे। पर मानती ही नहीं।" अपनी विवशता का उसे अनुभव था।

"कसाई छुरी से हलाल करता है। ये लोग जिन्दा गरीबों का खून चूसते हैं।" मन ही मन मुनीम को गाली दी।

समीया अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान थी व पति के प्रति श्रद्धावान थी। पति के देहान्त के बाद भी पति के प्रति श्रद्धा ने उसे अपने कर्त्तव्य के प्रति निर्णय पर दृढ़ रखा। वह जानती है कि उसकी कलुषित दृष्टि उस पर है। इससे वह मन ही मन भयभीत रहती। स्त्री के जीवन में कई ज्वार-भाटे आते हैं। अपने भाग्य को कोसने लगी। एक असहाय अबला का समाज में इज़्ज़त से रहना कितना मुश्किल है।

कल से गली मोहल्ले में पानी छनाछन भरा हुआ था। बारिश थम गईं मकानों के परनालों से पानी की बूँदें किसी दुखयारी के आँखों से गिरते आँसुओं के रूप में मोती बन टपक रही थी। पानी की बूँदें टपाटप लगातार टिन पर गिरने से संगीत की धुनें जन्म ले रही थीं। बरसात के कारण तीन-चार दिन से काम नहीं जाने से घर में कुछ खाने को नहीं था। बच्चे भूख से बेहाल थे। बरसात के रुकते ही वह एक होटल के सामने जा खड़ी हुई। सामने भट्टी जल रही थी। रोटियाँ सिक रहीं थी। लोग होटल में बैठ कर खा पी रहे थे। सामने काँच की अलमारी में मिठाईयाँ, बिस्कुट व नमकीन के थाल सजे थे। वह दूर खड़ी खाने-पीने की वस्तुओं को ललचाई नज़रों से देख रही थी। पेट में भूख से आग जल रही थी। आखिर उससे न रहा गया। भूखे बच्चों का ख्याल आते ही हाथ बढ़ गया।

"बच्चे भूखे हैं सेठ जी कुछ दे दो," वह बड़ी दीनता से सेठ के आगे गिड़गिड़ाने लगी।

"चल हट ...हट्टी-कट्टी है। मेहनत मजदूरी करके कमा कर खा, शर्म नहीं आती भीख माँगते," होटल के मालिक ने चिढ़कर कहा। अचानक पीछे से एक हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसने घबरा कर पीछे देखा। वह हाथ उसे कुछ दूरी पर खींच कर ले गया।

"तू भूखी है न...मैं तुझे...काम दिलाऊँगा। वैसे भीख माँगना भी अच्छी बात है....पर तू अभी अनाड़ी है। मैं तुझे सब....," वह उसकी नज़र देख सिहर गई।

"तू मेरे पवित्र धर्म पर कीचड़ लगाने की सोच रहा है। मैं सब समझती हूँ," वह मन ही मन कोसती हाथ छुड़ा भाग खड़ी हुई। उसका दिल उसके पहलू में धड़-धड़ कर रहा था। उसके सामने यथार्थ नग्न रूप में नाचने लगा।

"बच्चे नहीं होते तो मैं....इनके कारण मैं न तो कुएँ में कूद सकती हूँ न रेल के नीचे लेट सकती हूँ।"

उसका सिर चकरा रहा था पेट में भूख की आग जल रही थी। वह सिर थाम कर सड़क के किनारे आ बैठी थी तबसे यहीं बैठी है।

भूख...भूख....भूख। क्या मेरे चारों तरफ भूख ही भूख है? इस दुनिया में सब भूखे हैं? सबकी अपनी - अपनी भूख है। वह बार-बार अपने होंठ काट रही थी। उसकी सूखी जुबान उनके मुरझाये और सूखे होंठों को तर करने की असफल कोशिश कर रही थी। घर के आँगन में कब पहुँची उसे होश न रहा।

"कहाँ चली गई थी? सुबह की गई अब इतनी रात गए आई है। थोड़ी सी परवाह है तुझे कि मुझे कितनी चिंता हो रही थी। बच्चे रोकर भूखे सो गए। मैं बुखार में जल रही हूँ, तुझे कहाँ ढूँढने जाती?"

सास क्रोधवश उसे डाँट रही थी। समीया सास के सम्मुख आ खड़ी हुई। हाथ की थैली धीरे से ज़मीन पर रख दी। सास की वज्रध्वनि में क्रोध का एहसास था। स्नेह, ममता का आभास था। आत्मानुभूति इतनी गहरी थी कि उसने सास के समीप पहुँच कर सास का हाथ अपने हाथ में ले अत्यन्त शान्त भाव से निष्पाप वाणी में पूछा, "अम्मा क्या तबियत ज्यादा खराब हो गई?"

समीया का स्पर्श पाकर वह कुछ द्रवित हो उठी। उसका उदास चेहरा देख ममता उमड़ आई। समीया की भोली आँखों में पवित्र भावों की आभा देख पूछा, "कुछ मिला?"

मजबूरी जो रक्त में उबल रही थी उसी में प्रवाहित होकर उसने सास की ओर अत्यन्त बेचैनी भरी दृष्टि डालते हुए बोली।

"अम्मा! अम्मा!" कातर वाणी के मुँह से निकले शब्द समीया ने सास की ओर देख सिर नीचा कर लिया। हल्के अन्तरनाद के बाद लाल आँखों से सास को देखा वे आँखें भी लाल हो रही थीं। क्या हुआ जो इन्होंने जन्म नहीं दिया। क्या माँ सिर्फ जन्म देने वाली ही होती है?

"बच्चे भूख से रोते सो गए," सास का गला रुँध गया। कमरे में अँधेरा था। बाहर हल्की चाँदनी फैली थी। सास के लहजे में नरमी पा वह उसकी गोद में सिर रख कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।"क्या करूँ अम्मा?" थोड़ी देर चुप रह सास अपनी कथरी पर जाकर चुपचाप लेट गई। हिलते वजूद से यह अन्दाज़ा लगाना मुश्किल न था कि वह रो रही है। समीया के सारे हौंसले, हिम्म्त टूटने लगी।

समीया एक माँ....वह रात माँ के सदियों के अजाब की कैफियत में जागकर गुजरी। उसका सम्पूर्ण हृदय विदीर्ण होकर टुकड़े-टुकड़े होने लगा। लेकिन मूर्ति के समान शान्त बैठी रही। चेहरे पर व्यथा और क्षोभ की कालिमा छाई थी। रात गहरी हो चली मगर उसकी आँखों में नींद गायब थी। सोच-सोच कर उसका दिमाग थक चुका था। वह उकता कर उठ बैठती। बेचैनी से दीवारों को घूरती। थकान का अहसास होते ही वह फिर लेट जाती। नींद आँखों से गायब थी। भरी जवानी में पति साथ छोड़ गया। कोई सहारा नहीं। उसके चेहरे पर क्रोध और करुणा छा गई। अपने भीतर उमड़ती बेबसी को सँभालने में असमर्थ उसके मुँह से एक दीर्घ निःश्वास निकल गया। उसने होंठों पर जीभ फेरी। जैसे भीतर की आग उमड़कर होंठों को जला रही है।

"सब मर क्यों नहीं जाते। एक दर्द से छटपटाते उसने सोचा इन सबको ज़हर खिलाकर मार ही दूँ।

माँ बन जाने के बाद नारी मात्र नहीं रह जाती। वह माँ है माँ। जो परिवार के लिए अपने को रुलाती है। बच्चों के पति के लिए जान देती है। क्या वह केवल औरत ही है? वह माँ है....माँ।

भूख... भूख.. चारों ओर बढ़ते तूफान को अग्निपुंज नेत्रों से देखा। चारों ओर एक शोर सुनाई दे रहा है। कानों में एक गूँज भूख....बच्चे भूखे हैं।

मातृत्व को नारी का चरम सौन्दर्य माना है। इसे एक ओर दृष्टि से देखा जाए तो माँ का पद सर्वोच्च है। इसलिए इसे ज़हर भी सबसे अधिक पीना पड़ता हैं।

"माँ खाना व खिलौने लायेगी?" कानों में बच्चों की बात गूँज रही थी। समीया को अपने पेट में एक आग सी जलती महसूस होने लगी। वह यह भी जानती है कि यही आग घर के चारों प्रणियों के भीतर जल रही है।

इस आग पर पानी डालते-डालते थक गई थी। पेट की आग अपना स्थान छोड़कर दिल में आ लगी। यह आग समीया को जला गई। उसके अन्दर कुछ झन्न से टूट गया। अब उसमें भूख से लड़ने की हिम्मत न रही। वह जानती थी कि इस तरह मेरी ज़िंदगी बरबाद हो जायेगी। लेकिन इसके बावजूद उसने ख़ुद को वक़्त की सीढ़ी पर कदम रखने को तैयार....बच्चों की भूख का...उस भूख से...।

उसे लगा हवा के तेज़ झोंकों ने उसे ऊँची इमारत से नीचे फेंक दिया है उसका शरीर चीथड़ा-चीथडा हो रहा है शरीर के साथ मन भी शिथल हो गया।

भूख...।

एक सिहरन उसके रेशे-रेशे में उतरती चली गई। दो बूँद आँसू गालों पर लुढ़क आए। विवशता से दाँत किटकिटा कर उसने क्रोध के मारे अपनी हथेलियाँ मसल डालीं। उसकी आँखों को देख कर ऐसा लग रहा था मानो समस्त विश्व की सम्पूर्ण भूख का सागर मिटाने का निश्चय कर लिया। उसके होंठों पर एक व्यंग्य भरी मुस्कान थिरक उठी। उस मुस्कान में विचित्र पीड़ा थी। उस मुस्कान में ख़ुद के प्रति व्यंग्य था। मुस्कान में क्या-क्या छुपा था। उसका चेहरा एकदम लाल हो उठा लेकिन दूसरे ही पल सफेद हो गया। रक्तहीन चेहरा सफेद पड़ते चेहरे व काँपते होंठ.........कुछ बुदबुदाईं बच्चों की भूख....उन सब की भूख से.....।

समीया ने सोते हुए बच्चों के हाथ पर अपना हाथ धीरे से रखा। पर उसकी गिरिफ़्त मज़बूत थी। जैसे बच्चों को एक तरह का रक्षा का अहसास दिया। एक इत्मीनान भरा निश्चय....सुबह बच्चे भूखे न रहेंगे। वह अचानक उठ खड़ी हुई। सास ने उसे घर से बाहर निकलते देखा। इतनी रात को? वह उठ बैठी। उसका वजूद हैरतज़दा होकर रह गया। माँ के ज़मीर की यह ख़्वाहिश हुई कि ज़मीन अपना सीना चौड़ा कर ले और मुझे समा ले। यह दिन न देखना पड़ता। मैं बीमार इसकी मदद भी तो नहीं कर सकती। मैं एक बोझ हूँ इस पर।

दुःख और काँटों के समन्दर को पार करने की उसमें एक अद्भुत ताकत उत्पन्न हो गई। वह अँधेरे में बढ़ने लगी। ज़मीन पर कुछ ढूँढती सी सोच रही थी शायद ज़मीन पर गिरा कोई नोट ही मिल जाए। कुछ दूर जाकर वह एक पेड़ से पीठ टेक कर खड़ी हो गई। सोचने लगी कहाँ जाऊँ? किधर जाऊँ? तालाब में डूब जाऊँ?....रेल के सामने कूद जाऊँ। फिर इनकी भूख का क्या होगा? उस अँधेरे में अपने मन के अँधेरे को समय, समाज और हालात में जकड़ी खड़ी ....जीवन के अँधेरे में जकड़ी खड़ी....जीवन के अँधेरे में भटकती सहारे के लिए ढूँढता हाथ। जीवन से तो उसे बरसों से ही मोह न रहा फिर यह कैसा मोह?

खड़ी-खड़ी भयभीत चारों ओर देखने लगी। उसका चेहरा अतयन्त गम्भीर था। सामने से कोई आदमी को आता देखते ही उसे डर लगने लगा। सोचने लगी....शायद यह मेरे पास आयेगा। कहीं बुरा आदमी हुआ तो? वह चौंक उठी। मैंने तो ख़ुद ही यह फैसला किया है। भूख.....सबकी भूख मिटाने का।

दिल की धड़कन तेज़ हो गई। वह काँपने लगी। जब पथिक सीधे रास्ते चला गया उसे तसल्ली हुई। सोचा बच गई। फिर कोई आता दिखाई दिया। उसका हाल वैसा ही होने लगा। वह डर के मारे अधमरी हो रही थी। क्या करूँ? जो करना चाहा कर नहीं पाऊँगी। थोड़ी देर बाद कोई उसे अपनी ओर आता दिखाई दिया। उसने देखा वह आदमी रास्ता छोड़कर उसकी तरफ बढ़ रहा है। उसके होश उड़ गए। उसने डर कर आँखें बन्द कर लीं। चुपचाप जड़वत खड़ी सोच रही थी यह मेरे पास क्यों आ रहा है?

"समीया"

अचानक वह अपना नाम सुन सिहर गई। उसने आनेवाले के चेहरे की तरफ नहीं देखा। वह बेचारी डर और आशंका के मारे विह्वल हो खड़ी थी। कैसे लाज बचाऊँ?....पर मैं तो बाहर आई ही इसलिए थी.....आनेवाला उसे घोर आश्चर्य से देखने लगा।

"समीया"

"अरे यह तो पड़ोसी तानू है," वह ऐसी डरी कि शायद साँप देखकर भी नहीं डरती।

"जानती हो तुम क्या कर रही हो? अचानक यह फैसला क्यों?" उसने पूछा।

"मैं जानना नहीं चाहती। मैं जीना चाहती हूँ," वह पूरी शक्ति लगा कर बोली।

"भगवान के लिए समीया तुम जैसी हो वैसी ही बनी रहो। भूख से लड़ो.....बहादूर बनो....ख़ुद में ताकत पैदा करो।"

वह तानू के सामने शर्मिन्दा हो गई।

"विधाता ने शायद तुझे, मुझे कुछ लोगों को चिरजीवन दुःखी रहने के लिए ही बना संसार में भेजा है। मेरी कोई आशा पूरी नहीं हुई फिर भी मैं जीता हूँ या नहीं? क्यों?....गाँव में रहते बच्चों के लिए। भाई बहनों के लिए, भूखा प्यासा रहकर दूसरों के लिए जीना सीखो। समीया मेरी तरह...."

वह आत्मग्लानी से मरी जा रही थी।

"धर्म की रक्षा करो। जितना डरोगी......डराई जाओगी। क्या दुनिया में हमारी तरह और लोग नहीं जीते हैं?"

"तानू बच्चे दो दिन से भूखे हैं.....," शब्द गले में अटक गए।

"कल वे भी तुम्हें गलत कहेंगे। नफरत से देखेंगे।"

समीया का चेहरा सफेद हो गया....तानू बहुत कहता रहा एक अभिप्राय से समीया का चेहरा देखने लगा। शायद परेशानियों का सामना करने की हिम्मत आ जाए।

"अम्मा को कुछ दे आया हूँ। बच्चों को खिला चुकी होगी। तुम भी जाओ कुछ खा पी कर सो जाओ। पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आया है। सुबह तुम्हें काम पर जाना है।"

"पर..."

"समीया, जाओ किसी प्रकार से हार को गले न लगाओ।" वह अपनी धुन में गीत गाता आगे बढ़ गया।

"ओह.... ठोकर खाने से पहले ही सम्भल गई।" एक गम्भीर मुस्कान उसके होंठों पर फैल गई। धीरे-धीरे वह घर की तरफ बढ़ी। सुबह की रोशनी फैलने लगी। वह अपने स्थान पर गुमसुम बैठी रात के बारे में सोच रही थी।

सामने पेड़ पर बने घोंसले पर नज़र गई। एक चिड़िया हाथ पैर न होने के बावजूद अपनी चोंच में दाना भर कर ला नन्हें बच्चों की चोंच में डाल रही थी। परहीन छोटे-छोटे बच्चों की चोंच में दाना डालकर फिर वापस दाने की तलाश में उड़ जाती।

बहुत देर तक बैठी समीया देखती रही। चिड़िया बार-बार दाना लाती है, बच्चों की चोंच में डालती है। ...वापस उड़ जाती है दाने की तलाश में।

दाना लाना....चोंच में डालना.....फिर दाने की तलाश में उड़ जाना....चिड़िया की लगन....।

वह भी तो चिड़िया की तरह एक माँ है। समीया की आँखों में बच्चों के प्रति स्नेह आँसू बनकर झर-झर बह निकला। उसे लगा बारिश के बाद चमकीली धूप निकल आई। वह उठ कर चल दी दाने की तलाश में..............।


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