| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 09.24.2007 |
|
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे ’ज़ौक़’ मोहम्मद इब्राहिम |
|
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की
हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
आग दोज़ख़ की भी हो जाएगी पानी पानी
दोज़ख़=नर्क; आसी=पापी; अर्क़=पसीना
शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ
लाए जो मस्त हैं तुरबत पे गुलाबी आँखें
नहीं पाएगा निशां कोई हमारा हरगिज़
रविश-ए-तीर-ए-नज़र=आँख का तीर या उड़ती नज़र
पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक हम क्यूँ कर
‘ज़ौक़‘ जो मदरसे के बिगड़े हुए
हैं मुल्लाह |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|