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| 09.24.2007 |
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आँखें मेरी तलवों से मल जाए तो अच्छा ’ज़ौक़’ मोहम्मद इब्राहिम |
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आँखें मेरी तलवों से मल जाए तो अच्छा
पा-बोस=पाँव का चुम्बन
जो चश्म के बे-नम हों,
वो हो कोर तो बहतर
कोर=अन्धा
फ़ुर्कत में तेरी तार-ए-नफ़स सीने में मेरे
फ़ुर्कत=जुदाई; तार-ए-नफ़स=यहाँ अर्थ है – सूई की चुभन
वो सुबह को आए तो करूँ बातें मैं दो-पहर
ढल जाए जो दिन भी तो इसी तरह करूँ शाम
जब कल हो तो फिर वही करूँ कल की तरह से
अल-क़िस्सा नहीं चाहता मैं,
जाए वो याँ से
अल-क़िस्सा=संक्षेप में |
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