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09.24.2007
 
शाम हो जाम हो सुबू भी हो
ज़मीर काज़मी

शाम हो जाम हो सुबू भी हो
तुझ को पाने की जुस्तजू भी हो

 

दिल से दिल की कहानियाँ भी सुने

आँखों आँखों में गुफ़्तगू भी हो

 

झील सी गहरी सब्ज़ आँखों में

डूब जाने की आरज़ू भी हो

 

सिर्फ़ तेरे बदन की शमा जले
और अंधेरा-सा चार सू भी हो



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