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08.05.2007
 

मुन्सिफ़ों सलीबों पर फ़ैसले नहीं होते
ज़ाकिया ग़ज़ल


मुन्सिफ़ों सलीबों पर फ़ैसले नहीं होते
बेसबब बग़ावत के सानहे नहीं होते

मुन्सिफ़= न्यायाधीश; बेसबब= बिना कारण के
बग़ावत= विद्रोह; सानेहा(सानिहा)= घटना

झूठ और सदाक़त की जंग तो अज़ल से है
फिर भी सच पे जीने के हौसले नहीं होते

सदाकत= सत्य; अज़ल= अनन्तकाल

सोच के जुदा होना फिर कि मिल न पायेंगे
क्योकि इस ज़माने में मोजेज़े नहीं होते

मोजेज़ा= चमत्कार

जो भी थे गिले शिकवे दूर कर के जाना था
कम से कम बिछड़ने पर दिल बुरे नहीं होते

चांद से कहा हम ने तुम ही रात भर जागो
हम से उस की यादों में रत-जगे नहीं होते



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