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| 09.24.2007 |
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ख़ामोशी ख़ुद अपनी सदा हो ऐसा भी हो सकता है |
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ख़ामोशी ख़ुद अपनी सदा हो ऐसा भी हो सकता है
मेरा माज़ी मुझ से बिछड़ कर क्या जाने किस हाल में है
सहरा सहरा कब तक मैं ढूँढूँ उल्फ़त का एक आलम
अह्ल-ए-तूफां सोच रहे हैं साहिल डूबा जाता है
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