| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 09.24.2007 |
|
जीते रहने की सज़ा से ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी ज़का सिद्दीक़ी |
|
जीते रहने की सज़ा से ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी
मैं तो अब उक्ता
गया हूँ क्या यही है क़ायनात
ढूँढने निकला था तुझको और ख़ुद को खो दिया
या मुझे एहसास की इस क़ैद से कर दे रिहा |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|