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| 08.05.2007 |
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फिर से मौसम बहारों का आने को है |
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फिर से मौसम बहारों का आने को है
आप कर दें जो मुझपे निगाह-ए-करम
फीकी फीकी सी क्यूं शाम-ए-मैख़ाना है
मेरे मिटने का उनको ज़रा ग़म नहीं
आप ने दिल जो
”ज़ाहिद”
का तोड़ा तो क्या |
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