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09.04.2007
 
नहीं कि मिलने मिलाने का सिल-सिला रखना
ज़फ़र इक़बाल


नहीं कि मिलने मिलाने का सिल-सिला रखना
किसी भी सतह पे कोई तो राब्ता रखना
राब्ता=संबंध
मदद की तुम से तवक़्क़ो तो ख़ैर क्या होगी
ग़रीब-ए-शहर-ए-सितम हूँ मेरा पता रखना
तवक़्क़ो=आशा
मरेंगे और भी हमारे सिवा भी तुम पे बहुत
ये जुर्म है तो फिर इस जुर्म की सज़ा रखना

नए सफ़र पे रवाना हुआ है अज़-सर-ए-नौ
जब आऊँगा तो मेरा नाम भी नया रखना
अज़-सर-ए-नौ=नया आरम्भ

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