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| 09.04.2007 |
| देखना है वो मुझ पर मेहरबान कितना है ज़फ़र इक़बाल |
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देखना है वो मुझ पर मेहरबान कितना है
असलियत कहाँ तक है और गुमान कितना है असलियत=वास्तविकता; गुमान=सन्देह,भ्रम क्या पनाह देती है और ये ज़मीं मुझ को और अभी मेरे सर पर आसमान कितना है पनाह=शरण कुछ ख़बर नहीं आती किस रविश पे है तूफां और कटा फटा बाकी बादबान कितना है रविश=आचरण,चाल-ढाल तोड़ फोड करती हैं रोज़ ख्वाहिशें दिल में तंग इन मकानों से मकान कितना है क्या उठाए फिरता है बार-ए-आशिकी सर पर और देखने में वो धान-पान कितना है बार-ए-आशिकी=प्रेमी होने का बोझ हर्फ-ए-आरजू सुन कर जांचने लगा यानी इस में बात कितनी है और बयान कितना है हर्फ-ए-आरजू=इच्छा का शब्द फिर उदास कर देगी सरसरी झलक उस की भूल कर ये दिल उस को शादमान कितना है शादमान=प्रसन्न |
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