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09.04.2007
 
मिले किसी से नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
ज़फ़र गोरखपुरी


मिले किसी से नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
रहे अपनी ख़बर तो समझो ग़ज़ल हुई

मिला के नज़रों को वो हया से फिर
झुका ले कोई नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई

इधर मचल कर उन्हें पुकारे जुनूं मेरा
भड़क उठे दिल उधर तो समझो ग़ज़ल हुई

उदास बिस्तर की सिलवटें जब तुम्हें चुभें
न सो सको रात भर तो समझो ग़ज़ल हुई

वो बदगुमां हो तो शेर सूझे न शायरी
वो महर-बां हो ‘ज़फ़र‘ तो समझो ग़ज़ल हुई

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