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| 09.04.2007 |
| मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते ज़फ़र गोरखपुरी |
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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते दीवाना तुम्हारा कोई ग़ैर नहीं मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते तुम जाग रहे हो मुझको अच्छा नहीं लगता चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते |
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