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| 09.04.2007 |
| मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है ज़फ़र गोरखपुरी |
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मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
थोड़ा सा समझौता जानम करना पड़ता है कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी दिल कहता है रोएँ लेकिन हँसना पड़ता है कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती है तस्वीरें पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं ज़ंजीरें पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है रूठ के जाने वाले बादल टूटने वाला तारा किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है |
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