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| 09.04.2007 |
| हमेशा है वस्ल-ए-जुदाई का धन्धा ज़फ़र गोरखपुरी |
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हमेशा है वस्ल-ए-जुदाई का धन्धा
बुतों की है उल्फ़त ख़ुदाई का धन्धा वस्ल=मिलन अगर बैठें रिन्दों की सोहबत में ज़ाहिद तो दें छोड़ सब पारसाई का धन्धा रिन्द=शराबी; ज़ाहिद=धर्म उपदेशक जो होना है आख़िर वो हो कर रहेगा करे कौन बख़्त-आज़माई का धन्धा बख़्त=भाग्य परेशां रही उम्र पर न छोड़ा तेरी ज़ुल्फ ने कज-अदाई का धन्धा कज-अदा=टेढ़ापन मुबारक रईसों को कार-ए-रियासत गदा को है काफ़ी गदाई का धन्धा गदा=निर्धनता, भिखारी नहीं ख़िज्र के पीछे गर और झगड़े तो है साथ इक रहनुमाई का धन्धा ‘ज़फ़र‘ इस से बहतर है ना-आशनाई कि मुश्किल है ये आशनाई का धन्धा आशनाई=प्रेम |
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