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09.04.2007
 
धूप क्या है और साया क्या है अब मालूम हुआ
ज़फ़र गोरखपुरी

धूप क्या है और साया क्या है अब मालूम हुआ
ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ

हँसते फूल का चेहरा देखूँ और भर आई आँख
अपने साथ ये क़िस्सा क्या है अब मालूम हुआ

हम बरसों के बाद भी उनको अब तक भूल न पाए
दिल से उनका रिश्ता क्या है अब मालूम हुआ

सहरा सहरा प्यासे भटके सारी उम्र जले
बादल का इक टुकड़ा क्या है अब मालूम हुआ

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