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ISSN 2292-9754

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02.02.2017


भारतेंदु-पूर्व हिंदी गद्य का विकास

खड़ी बोली हिंदी गद्य का प्रथम ग्रंथ "चन्द छन्द बरनन की महिमा" है, जो अकबर के दरबारी कवि गंग द्वारा लिखा गया था। इस ग्रंथ में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ ब्रजभाषा के भी शब्दों का व्यवहार बहुतायत से हुआ है। परन्तु हिंदी गद्य के साहित्यिक उत्थान के दृष्टि से पटियाला निवासी रामप्रसाद निरंजनी द्वारा लिखी गयी गद्य रचना "भाषा योगवासिष्ठ" का महत्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रंथ की भाषा अधिक निखरी हुई खड़ी बोली हिंदी है। रामप्रसाद निरंजनी को "प्रथम प्रौढ़ गद्य-लेखक" मानते हुए आचार्य शुक्ल अपने इतिहास के आधुनिक काल में लिखते हैं- "ये पटियाला दरबार में थे और महारानी को कथा बाँचकर सुनाया करते थे। इनके ग्रंथ देखकर यह स्पष्ट हो जाता हैं कि मुंशी सदासुख और लल्लूलाल से 62 वर्ष पहले खड़ी बोली का गद्य अच्छे परिमार्जित रूप में पुस्तकें आदि लिखने में व्यवहृत होता था। अब तक पाई गयी पुस्तकों में यह "भाषा योगवासिष्ठ" ही सबसे पुराना है जिसमें गद्य अपने परिष्कृत रूप में दिखाई पड़ता है।"1

निरंजनी के बाद पं. दौलतराम ने सात सौ पृष्ठों में हरिषेणाचार्य कृत "जैन पद्मपुराण" का गद्यानुवाद प्रस्तुत किया। परन्तु इस ग्रंथ का गद्य निरंजनी के गद्य जैसा परिमार्जित रूप नहीं है।

फोर्ट विलियम कॉलेज तथा लेखक चतुष्टय-भारतेंदु-पूर्व हिंदी गद्य के क्रमिक विकास में चार लेखकों- लल्लू लाल, सदल मिश्र, इंशाअल्ला खाँ तथा मुंशी सदासुख लाल का विशेष महत्व है। इनमें से प्रारम्भिक दो लेखक लल्लूलाल और सदल मिश्र फोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदी के अध्यापक थे। 1800 ई. में जॉन गिलक्राइस्ट ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। इस सन्दर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं- "फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना 1800 ई. में हुई, पर इसका प्रभाव-क्षेत्र सीमित था। यहाँ उस समय की राजधानी में इग्लैंड से नवागत अँग्रेज़ अफ़सरों के प्रशिक्षण की व्यवस्था थी। इस प्रशिक्षण में आधुनिक भारतीय भाषाओं की जानकारी भी शामिल थी। इसके लिए कॉलेज के प्रिंसपल गिलक्राइस्ट ने अपनी समझ के हिसाब से हिंदी/हिन्दुस्तानी गद्य में पुस्तकें लिखवाईं।"2

इसका उद्देश्य भारतीय शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए अँग्रेज़ अफ़सर तैयार करना था। इन्हीं अफ़सरों को हिंदी शिक्षा देने और इस योग्य पाठ्य पुस्तकों की तैयारी के लिए लल्लूलाल और सदल मिश्र को अध्यापक के रूप में नियुक्त किय गया।

लल्लू लाल (1763-1825) ने 1803 ई. में गिलक्राइस्ट की प्रेरणा से "प्रेमसागर" की रचना की। इसे श्रीमद्भागवत के दशम-स्कन्ध का भाषानुवाद कहा जा सकता है। इसकी भाषा अनेक विदेशी शब्दों और ब्रजभाषा के शब्द-प्रयोग से बोझिल है। लल्लूलाल साधारण पढ़े-लिखे आदमी थे। इनके गद्य में पण्डिताऊपन के साथ-साथ व्याकरण की अशुद्धियाँ भी बहुतायत से मिलती हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार- "लल्लूलाल ने उर्दू, खड़ी बोली हिंदी और ब्रजभाषा तीनों में गद्य की पुस्तकें लिखी। ये संस्कृत नहीं जानते थे। ब्रजभाषा में लिखी हुई कथाओं और कहानियों को उर्दू और हिंदी गद्य में लिखने के लिए इनसे कहा गया था जिसके अनुसार इन्होंने सिंहासनबत्तीसी, बैतालपचीसी, शकुंतला नाटक, माधोनल और प्रेमसागर लिखे। प्रेमसागर के पहले ही चारों पुस्तकें बिल्कुल उर्दू में हैं। इनके अतरिक्त इन्होंने "राजनीति" के नाम से हितोपदेश की कहानियाँ ब्रजभाषा गद्य में लिखी। "माधवविलास" और "सभाविलास" नाम से ब्रजभाषा पद्य के संग्रह ग्रंथ इन्होंने प्रकाशित किये थे। इनकी "लालचन्द्रिका" नाम की बिहारी सतसई की टीका भी प्रसिद्ध हैं।"3

इनका गद्य कथा वाचन के उपयोग का अधिक, साहित्य के उपयोग का कम था। इतने पर प्रारम्भिक खड़ी बोली गद्य की दृष्टि से इसका अपना महत्व है।

सदल मिश्र ने "नासिकेतोपख्यान" की रचना संस्कृत के चन्द्रावती नामक कथाग्रंथ के अनुवाद रूप में की। इनका गद्य पर्याप्त निखरा हुआ और प्रवाह से युक्त है। ये बिहार के रहने वाले थे। अतः यत्र-तत्र कुछ पूर्वी बोली के शब्द-प्रयोगों को छोड़ इनका गद्य प्रारम्भिक हिंदी गद्य का अच्छा निदर्शन है। इनकी भाषा कोई एक निश्चित नियम मानकर नहीं चलती, क्योंकि उनके सामने भाषा का कोई आदर्श नहीं था। इतना होते हुए भी भाषा की प्रौढ़ता की दृष्टि से वे अपने समकालीन लेखकों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। इनकी भाषा गठीली है। यह लल्लूलाल की भाषा की भाँति लचरपन, शब्दों को तोड़-मरोड़, लम्बे-लम्बे समास तथा तुकों एवं अनुप्रासों के बाहुल्य से रहित है।

मुंशी सदासुख लाल "नियाज" (1746-1824) दिल्ली के निवासी थे। मिर्जापुर के चुनार नामक स्थान पर अफ़सर थे। हिंदी गद्य की सेवा इन्होंने अपनी अन्तः प्रेरणा से की। नौकरी छोड़ ये प्रयाग आ गये। यही पर विष्णु पुराण से एक उपदेशात्मक प्रसंग लेकर हिंदी में श्रीमद्भागवत का सुखसागर नाम से अनुवाद किया। इनकी भाषा उस समय प्रचलित हिन्दुओं की शिष्टभाषा है। यत्र-तत्र मिलने वाले पण्डिताऊपन के अतरिक्त इनकी भाषा संस्कृत के तत्सम शब्द-प्रयोगों से युक्त है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में- "इसी संस्कृतमिश्रित हिंदी को उर्दूवाले "भाषा" कहते थे जिसका चलन उर्दू के कारण कम होते देख मुंशी सदासुख ने इस प्रकार खेद प्रकट किया था- रस्मौ-रिवाज भाखा का दुनिया से उठ गया। सारांश यह हैं कि मुंशी जी ने हिंदुओं की शिष्ट बोलचाल की भाषा ग्रहण की, उर्दू से अपनी भाषा नहीं ली।"4

इंशाअल्ला खाँ (1792-1875) सदासुख लाल की भाँति स्वान्तः सुखाय उदयभान चरित्र या रानी केतकी की कहानी की रचना की। यह कृति भाषा-प्रयोग के दृष्टि से लिखी गयी। इंशाअल्ला के समक्ष हिंदी गद्य की उर्दू मिश्रित और संस्कृत मिश्रित दोनो ही शैलियाँ थी। इन्होंने मध्यम मार्ग का अनुसरण किया। "हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले" - यह इनकी भाषा का आदर्श रहा- अर्थात अरबी-फ़ारसी के विरल तथा गँवारूपन से बिल्कुल मुक्त भाषा इनके प्रयोग का उद्देश्य रही इंशा के गद्य की भाषा अत्यन्त फड़कती हुई और मुहावरेदार है। परन्तु गद्य में भी तुक मिलाने की प्रवृत्ति और फ़ारसी ढंग का वाक्य-विन्यास इनके गद्य को कुछ हास्यास्पद बना देता है। इन दोषों के अतरिक्त इनका गद्य अत्यन्त स्वच्छ, चलता हुआ शुद्ध खड़ी बोली गद्य के रूप में देखा जा सकता है।

इन चारो लेखकों के बाद ईसाई मिशनरियों ने हिंदी गद्य के प्रचार और प्रसार में बहुत बड़ा योग दिया। बाइबिल का हिंदी अनुवाद कराकर ईसाई धर्म के प्रचारार्थ इन मिशनरियों ने देश के कोने-कोने में प्रसारित किया। इसके अतरिक्त इन्होंने कई स्कूल भी खोले। इसी समय भारत में छापेखाने की भी स्थापना हुई। इसके आते ही ईसाइयों का धर्म प्रचार और भी तीव्रता से बढ़ा। स्कूलों में पढ़ाये जाने वाले विविध विषयों की पुस्तकें भी छपने लगी। इस प्रकार ईसाई मिशनरियों का उद्देश्य चाहे जो रहा हो पर इनके हाथों हिंदी गद्य का प्रचार और प्रसार बहुत तीव्र गति से हुआ। ईसाई मिशनरियों का गद्य विभिन्न प्रान्तीय प्रभावों से मुक्त है। इसका न तो व्याकरणिक विधान है न कोई दिशा। जनता जिस भाषा को सरलता से समझ पाती उसी का व्यवहार इन्होंने ने किया। परन्तु गद्य के प्रचार व प्रसार की दृष्टि से इनका योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। इस विषय के सारतत्व के रूप में डॉ. नगेन्द्र अपनी पुस्तक "हिंदी- साहित्य का इतिहास" में लिखते है- "आधुनिक युग का साहित्य मुद्रण-कला के कारण अपने रूप-रंग, अभिव्यंजना, प्रभावान्विति आदि में मध्यकालीन साहित्य से पृथक और स्वतंत्र रूप से अस्तित्ववान हो गया है। आधुनिक काल के साहित्य में जो वैविध्य, वैयक्तिक कल्पना-छवियाँ, और प्रयोगात्मकता आयी है उसका आंशिक दायित्व छापेखाने पर भी है। छापेखाने के अभाव में परिवर्तमान अभिरुचियों और संवेदनाओं का आकलन सम्भव नहीं था। साहित्य और कला सम्बन्धी वादो, आन्दोलनों आदि को रूपायित करने में इसका महत्वपूर्ण योग है।“5

ऊपर हिंदी गद्य के विकास से संबन्धित जितने लेखकों व रचनाओं की चर्चा की गई इनका उद्देश्य मात्र प्रचार व प्रसार ही रहा। गद्य की भाषानीति को लेकर किसी भी लेखक ने विवाद नहीं छेड़ा क्योंकि ऐसी आवश्यकता ही नहीं पड़ी। 1835 के आस-पास अँग्रेज़ शासकों ने भारत की शिक्षा-नीति निर्धारित करनी चाही। प्रारम्भ में उन्होंने हिंदी को स्कूली शिक्षा और अदालत की भाषा बनाना चाहा। परन्तु मुसलमानों के विरोधस्वरूप यह स्थान उर्दू को मिला, और यहीं से "उर्दू"-"हिंदी" का विवाद छिड़ा। अदालत की भाषा तथा नौकरियों के लिए अनिवार्य भाषा होने के कारण उर्दू और फ़ारसी का महत्व बढ़ने लगा। हिंदी-मात्र बोलचाल और यत्र-तत्र टूटे-फूटे देवनागरी अक्षरों में लिखी जाने वाली भाषा बन कर रह गयी। हिंदी-उर्दू के इस संघर्ष को मिटाने और दोनों भाषाओं को समान्वित करने का स्तुत्य प्रयास राजा शिव प्रसाद "सितारेहिन्द" ने किया। इनके विरोध में हिंदी को संस्कृत सम्मत बनाने की चेष्टा राजा लक्ष्मण सिंह ने की। ये ही लेखकद्वय हिंदी गद्य के नीति-निर्धारक बने।

राजा शिवप्रसाद "सितारेहिन्द" हिंदी-उर्दू दोनो भाषाओं के समन्वय कारी लेखक के रूप में सामने आये। ये शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर थे। इन्होंने काशी से "बनारस" नाम का अख़बार निकाला। शिवप्रसाद ने "आमफहम" भाषा पर विशेष बल दिया। यह "आमफलम" भाषा "हिन्दुस्तानी" थी। अरबी-फ़ारसी के शब्दों से युक्त इस भाषा का प्रचार जनता में बहुतायत से था। सितारेहिन्द ने इस भाषा को देवनागरी लिपि में लिखे जाने की सिफ़ारिश की। संक्षेप में, अरबी-फ़ारसी की चलते शब्द प्रयोगों से युक्त साधारण बोलचाल की हिंदी के पक्षपाती रहे। उन्होंने स्वयं और अपने सहयोगियों में पं. वंशीधर, श्रीलाल और बद्रीलाल के साथ मिलकर स्कूलों में प्रयोग योग्य पाठ्य पुस्तकें तैयार करायीं। इन्होंने अनेक रचनाएँ कर अपने भाषा आदर्श को प्रस्तुत कराना चाहा आलसियों का कीड़ा, राजा भोज का सपना, भूगोल हस्तामलक, इतिहास तिमिरनाशक गुटका, हिन्दुस्तान के पुराने राजाओं का हाल, मानव धर्मसार, सिवाव का उदय और अस्त, योगवशिष्ठ और चुने हुए श्लोक, उपनिषद्सार इनकी रचनाएँ हैं।

राजा लक्ष्मण सिंह "सितारेहिन्द" की मान्यता के विपरीत गद्य में अरबी-फ़ारसी के शब्दों की जगह संस्कृत के तत्सम शब्द प्रयोग के पक्षपाती थे। इन्होंने आगरा से "प्रजाहितैषी" नामक पत्र निकालकर संस्कृत-सम्मत हिंदी गद्य के प्रचार व प्रसार में योग दिया। इन्होंने कालिदास की "रघुवंश", "अभिज्ञान शाकुन्तलम्", "मेघदूत" आदि रचनाओं का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया। राजा लक्ष्मण सिंह का गद्य यद्यपि सामान्य बोल-चाल की भाषा से पर्याप्त दूर हो गया लेकिन इसने हिंदी गद्य को एक स्वस्थ रूप प्रदान किया। हिंदी साहित्य का इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते है- "राजा लक्ष्मण सिंह के समय में ही हिंदी गद्य की भाषा अपने भावी रूप का अभास दे चुकी थी। अब आवश्यकता ऐसे शक्तिसंपन्न लेखकों की थी जो अपनी प्रतिभा और उद्भावना के बल से उसे सुव्यवस्थित और परिमार्जित करते और उसमें ऐसे साहित्य का विधान करते जो शिक्षित जनता की रुचि के अनुकूल होता। ठीक इसी परिस्थिति में भारतेंदु का उदय हुआ।"6

इन दोनों लेखकों के, गद्य की भाषा को लेकर होने वाले विवाद के परे, भारतेंदु युगीन गद्य, बिना किसी भाषा-नीति का पक्षपात किये प्रसार पाता रहा। इन दोनों लेखकों की धारणा का स्पष्ट रूप द्विवेदी युग के लेखकों में मिलता हैं। प्रेमचन्द्र का गद्य सितारेहिन्द की नीतियों पर आधारित रहा। वास्तविक रूप से "हिन्दुस्तानी" भाषा सम्बन्धी मान्यता सितारेहिन्द की ही धारणा पर आधारित है। परन्तु आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृत-सम्मत गद्य की मान्यता का कुछ ऐसे योजनाबद्ध रूप से प्रचार व प्रसार किया कि संस्कृत-सम्मत भाषा ही गद्य तथा पद्य दोनों की भाषा बनी। छायावादी कवियों व लेखकों के हाथों यह भाषा पूर्ण प्रतिष्ठित होकर आज काव्य तथा गद्य की विविध विधाओं की भाषा बन गयी है।

अस्तु! भारतेंदु के पूर्व का हिंदी गद्य अपनी प्रारम्भिक अवस्था में बिना किसी भाषा-नीति को अपनाये आगे बढ़ता रहा। भारतेंदु के समकालीन सितारेहिन्द और लक्ष्मण सिंह ने गद्य के नीति निर्धारण का सूत्रपात किया। परन्तु भारतेंदु युगीन गद्य अनिश्चयात्मक स्थिति को ही अपनाये चलता रहा। भारतेंदु युग के बाद गद्य की निश्चित नीति का निर्धारण द्विवेदी युग में सम्पन्न हुआ। आज की उर्दू से हिंदी में लिखने वाले लेखक "सितारेहिन्द" की नीति पर चल रहे है, पर उनकी संख्या अत्यल्प है।

डॉ. योगेश राव
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सन्दर्भः-

1. हिंदी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ-299
2. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास-रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृष्ठ-81
3. हिंदी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ-305
4. हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ-302
5. हिंदी-साहित्य का इतिहास-डॉ. नगेन्द्र, पृष्ठ-437
6. हिंदी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ-322


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