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05.03.2012
 

छलनी लेकर हाथों में : गीत
डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’


छलनी लेकर हाथों में हम, पानी भरने बैठे हैं!
कागज़ की है नाव मगर, भवसागर तरने बैठे हैं!!
भूल गए हैं गंध, हमारा
परिचय है वीरानों से!
अपनों से परहेज़, हमारा
नाता है बेगानों से!!
काँटों में जो हँसे फूल, हम उन्हें कतरने बैठे हैं!
कागज़ की है नाव मगर, भवसागर तरने बैठे हैं!!
भूले हर सौगंध, गंध
जीवन की हमसे दूर हुई!
बिखरी-सी ज़िन्दगी, आज तो
मरने को मजबूर हुई!!
जीवन खोकर, साथ मौत के, आज सँवरने बैठे हैं!
छलनी लेकर हाथों में, हम पानी भरने बैठे हैं!!
कहाँ खो गया न्याय, भला
फुर्सत किसको जो जाने!
आस्थाएँ मर गईं, सत्य
वनवासी हुआ अजाने!!
बँधने की आवाज़ लगा, हम आज बिखरने बैठे हैं!
कागज़ की है नाव मगर, भवसागर तरने बैठे हैं!


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