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ISSN 2292-9754

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03.05.2016


मेरी बस्ती के सवाल

ये किसकी गंदगी है
जो बदबू फैलाये जा रही है
हमारी बस्ती में।

तुम ये कहते हो कि हम
गंदे हैं और हमारा स्वभाव ही ऐसा है
पर हमें लगता है
ये सब तुमने ही तो फैलाया है
वह चाहे बदबू हो
या लोगों में भ्रम।

गंदगी हमारे घरों की
गलियों की, नालों-पोखरों की
सबके कारणों में तुम्हीं हो
और तुम्हारी सनातनी सभ्यता भी
जिससे अभिशप्त हैं पीढ़ियाँ
बस्ती में रह जाने के लिए।

सभ्यता के इस झूठे विकास में
तुम्हारा समूह गाँव में परिणत हो गया
और हम रह गए आज भी
बस्ती में ही।

अब तुम्हें क्यूँ डर लगने लगा है
इस बस्ती से
क्यूँ तुम गढ़ने लगे हो
नए-नए आयाम
शोषण के

क्या तुम्हारा अपना
बनाया गया गाँव
इतना खोखला हो गया है
हमेशा से तुम्हे इसी का तो
दंभ था!

तुम डरते हो केवल इसलिए कि
हमने भी गढ़ लिए है नए प्रतीक
तुम्हारे प्रतीकों के बरख्त
भले ही वे प्रतीक गंदगी से युक्त हैं
पर वे हमारे हैं

हमने लगा लिया है नीम
तुम्हारे नीम के ही जैसा
और जान ली है उस पेड़ की सच्चाई
जो बिना धूप-अगरबत्ती के भी
हरा-भरा रहता है।

क्यूँ तुम डरते हो
केवल इसलिए कि
झुठला दी जाएगी
तुम्हारी सुंदरता हमारी गंदगी से
तुम्हारा गाँव हमारी बस्ती से।


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