अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.02.2014


पूर्णता का बोध

यदु जोशी ‘गढ़देशी’
पृथ्वी गोल है
सूरज चाँद भी दीखते हैं गोल
बच्चों के हाथ में गेंद गोल है
चूल्हे में गर्म हो रहा
तवा गोल है,
बन रही रोटियाँ भी गोल
घर में भूगोल है और बाहर भी
जीवन से मृत्यु और पुनरागमन में
जल में उभरती हुई
जल तरंगों में
चक्की के पाटों में
मंदिरों की परिक्रमा में
घंटियों की गूँज में
पूर्णता का बोध है
सच है कि शून्य गोल है
और इसी में है प्रारब्ध
गणनाओं का खेल भी!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें