Sahitya Kunj – डॉ. विवेक कुमार – Dr. Vivek Kumar

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ISSN 2292-9754

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05.20.2017


इच्छाओं की गगरी

यह मेरा है
यह तेरा है
मोह माया का फेरा है।

जीवन तो
चंद दिनों का
डेरा है।

संबंधों
और रिश्तों का
यह तो बस एक
घेरा है।

लाख लिखे कोई
जीवन का काग़ज़
रहता कोरा है।

इच्छाओं की गगरी
भरे कैसे
यही तो बस
एक फेरा है।

इश्क़-जुनून और
रिश्तों की बगिया में मँडराता
स्वार्थ का भौंरा है।


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