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ISSN 2292-9754

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09.23.2014


कहाँ गया बचपन...

लाडलों का कहाँ गया बचपन
वो रूठना और मचलना, बात-बात अनबन
छत पर सोना छूटा, छूटा आसमान का ज्ञान,
सप्त ॠषि व ध्रुव तारे की, कठिन हुई पहचान,
मिट्टी के घरौंदे छूटे, छूट गया आँगन॥
लाडलों का कहाँ........

जोड़-बाकी का ज्ञान कंचों, सहज सीख जाता था,
और निशाना संतोलिया से, उसको आ जाता था,
आज सुविधा बेहतर उसको, फिर उदास क्यूँ मन॥
लाडलों का कहाँ........

नाव बना कागज की, और पानी में तैराना,
कहाँ मिला इनको बारिश में, छपक-छपक के नहाना,
मात-पिता की इच्छाओँ ने, छीना तन और मन॥
लाडलों का कहाँ........
नानी-दादी के किस्से ना, जिन्हें मिली हो गोद,
क्या चिकने कागज की पुस्तक, दे पायेगी मोद,
तीन साल का बालक भेजा, विद्यालय बनठन॥
लाडलों का कहाँ........

गुड्डे-गुड़ियों का खेल सिखाता, उसे सामाजिक ज्ञान,
कागज के हवाई जहाज से,मिले सहज विज्ञान,
मत छीनो बालक से खुशियाँ, ऐसे करो जतन॥
लाडलों का कहाँ गया बचपन॥


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