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| 01.29.2012 |
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वेलेन्टाइन-डे की सार्थकता
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प्रेम प्रिय शब्द का भाववाचक रूप है, प्रिय का अर्थ होता है
तृप्ति। अर्थात् प्रेम शब्द से हृदय के उस तृप्ति रूप - आनन्द का
संकेत मिलता हैं जो हमें किसी विषय के दर्शन आदि से मिलता हैं
विश्व के समस्त स्थावर जंगम पदार्थो में प्रेम का प्रसार स्पष्ट
दिखता है। समस्त सूक्ष्म तत्वों को प्रेम कर्मशील बनाता है। वास्तव
में देखा जाये तो सम्पूर्ण जगत के कार्य, व्यापार तथा समस्त
प्राणिजगत के मूल में प्रेम ही का वास होता हैं, प्रेम को जीवन से
अलग नहीं किया जा सकता है। प्रेम जीवन की स्फूर्ति हैं। प्रेम
कर्मण्यता, आशा तथा सतत् विकास एवं उन्नति का विद्यायक है।
प्रेम का एक रूप वह है जो व्यक्ति में समर्पण का भाव लाता है,
अर्थात् प्रेम किसी से भी (मानव, प्रकृति एवं पशु-पक्षियों)
किया जा सकता है ये प्रेम तभी सार्थक होता है जब हम उस जड़ या
चेतन वस्तु के प्रति सम्मान, समर्पण एवं भरोसा कर सकें। यह
भरोसा व्यक्तिगत् स्तर से लेकर सार्वभौमिक स्तर तक जा सकता है।
प्रेम एक ऐसी उद्दाम शक्तिशालिनी मनोवृत्ति है जो हृदय में
जागृति होने पर अहर्निश अपने आलम्बन् की प्राप्ति तथा उससे
एकमेव के लिये सदैव आतुर रहती है। इसके पथ में आने वाली विघ्न
बाधायें कोई महत्व नहीं रखती है।
भारतीय साहित्य में प्रेम का स्वरूप हम श्रीमद्भागवत में देखते
है जहाँ कि कृष्ण के अगाध प्रेम में आसक्त गोपियाँ अहर्निश
श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न, उन्हीं का सान्निध्य प्राप्त
करना चाहती है। इसमें गोपियों की प्रेम भावना का प्राबल्य है।
प्रेम का यही प्राबल्य व्यक्ति को आकर्षण से जोड़ देता है।
शिकागो(अमेरिका) में अपने आध्यात्मिक भाषण के दौरान स्वामी
विवेकानन्द जी से एक अंग्रेज ने पूछा था कि आपके यहाँ
कृष्ण भगवान सोलह हजार गोपियों के साथ रहते थे यह कैसे
सम्भव रहा होगा, विवेकानन्द जी का जवाब था कि आप हमारे
भाषण को लगातार इतने घण्टे क्यों सुनते रहते हो तो उस
अंग्रेज का जवाब था कि आप हमें आकर्षित करने एवं
प्रोत्साहित करने वाली बाते बता रहे है। तब विवेकानन्द जी
का जवाब था कि ऐसी ही बातें हमारे इष्ट देवता या महान
पुरुष ईश्वर, कृष्ण बताते थे। जिनमें स्वार्थ की भावना
नहीं थी अर्थात् व्यक्ति का आकर्षण ही उसे दूसरे व्यक्ति
से प्रेम के बन्धन में बाँधता है जिसमें ज़रूरी नहीं कि वह
प्रेम दैहिक हो। अर्थात् प्रेम का यह रूप मानवीय मूल्यों
से ओत-प्रोत था इसलिये इतिहास में आज भी अमर है।
अनन्यता प्रेम का मूल तत्व है चातक भारतीय साहित्य में
अनन्य प्रेम का प्रतीक माना गया है चातकवत् प्रेम ही
सध्वा प्रेम माना जाता है। परन्तु वर्तमान के
भूमण्डलीकरण के दौर में प्रेम का स्वरूप भी बदल चुका
है - चातकवत् प्रेम आज अतीत में विलीन हो गया है।
वासना एवं संकीर्णता के क्षुद्र आवेग ने प्रेम को
विषमय बना दिया है व्यक्ति के स्वार्थ की वृत्ति इतनी
बढ़ चुकी है कि प्रेम के स्त्रोत की मूल धारण विलुप्त
होती जा रही है। प्रेम को साधने के लिये व्यक्ति आज
छल, कपट, प्रंपंच, षडयंत्र,आदि का सहारा ले रहा है।
अतीत में रहा होगा कोई युग जब प्रेम, ’हांट‘ में न
बिकता रहा होगा, किन्तु आज प्रेम का बाकायदे सौदा होता
है, प्रेम बिकता है, प्रेम खरीदा जाता है अर्थात्
इसकी सरेआम नीलामी हो रही है जो जितनी अधिक बोली लगा
रहा है वही उसे प्राप्त करने में सफल हो रहा है। नारी
के प्रति व्यक्ति की उदात्त भावनायें एवं नारी की
व्यक्ति के प्रति समर्पण सम्मान एवं भरोसा न रहकर अब
उसकी समृद्धि का सूचक हो गया है प्रेम। प्रेम के बारे
में कवि एवं शायरों की शायरी इस भौतिक युग में अब केवल
यूटोपिया ही साबित हो रही है-
जीवन को वरदान बना देता है।
बंजर को उद्यान बना देता है। सद्भाव सरस प्रेम सुमन का सौरभ। इन्सां को इन्सान बना देता है।
पश्चिम से आये वेलेन्टाइन-डे मनाने या न मनाने पर भारत में इधर
विरोध की परम्परा पिछले वर्षों में देखने को मिली हैं। वास्तविक
दृष्टि से देखा जाये तो वेलेन्टाइन-डे पाश्चात्य देशों मे मनाये
जाने से पहले हमारे देश में बसन्तोत्सव के रूप में प्रेम का यह
पर्व हम सदयों से मनाते आ रहे हैं। आपसी विश्वास और स्नेह का यही
एक विशेष दिन नहीं है वरन् प्रेम का वास्तविक स्वरूप कभी भी, कहीं
भी ओर किसी के प्रति हो सकता है। इसमें किसी विशेष दिन का महत्व
नहीं रहता है इसे एक दूसरे रूप में कहें तो जब हम अपना उद्देश्य तय
कर लेते हैं तो हमारा समर्पण उसी के प्रति हो जाता है यही प्रेम का
वास्तविक रूप है वह किसी के प्रति हो सकता है। स्पष्ट है कि भारतीय
संस्कृति हमेशा से प्रेम प्रधान रही है। आज समय की माँग है कि
पाश्चात्य रंग में न रँग कर हम किसी की भावनाओं को आहत न करें,
समाज में फूहड़ता न फैलायें तभी हम संत वेलेन्टाइन की प्रेम रूपी
सार्थकता की उचित शिक्षा को समाज में फैला सकेगें।
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