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05.04.2012

कबीर के राम बनाम निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा

Kabirसंत कबीर का आविर्भाव मध्ययुगीन सामाजिक वैचित्रयों में एक क्रांतिकारी घटना है। इस तत्कालीन मध्य युगीन रूढ़िवादी समाज में यौगिक सिद्धियाँ तांत्रिक घटनाओं व मायावी चमत्कारों के कारण लोगों में दहशत व्याप्त थी परन्तु इस संक्रमण काल के दौर में कबीरदास ने जनसमुदाय को एक आशा की किरण एवं भय से मुक्ति देकर भाव-भक्ति की आत्मीय शांति में जीवन को गतिशीलता प्रदान कर सुरक्षा का शक्तिशाली कवच पहनाया। बाह्य जगत के अनेक झंझावातों के विपरीत आन्तरिक जगत की यात्रा में मानवीय मूल्यों की शाश्वतता को स्थापित करने के प्रयास में ही कबीर ने भक्ति की शक्ति को समर्थन दिया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह भाव भक्ति अमरता कबीर को गुरू कृपा से प्राप्त हुई थी। अमरता के इसी वरदान को पाकर कबीर, कबीर हुए थे।

अनन्त व्योम की नीलिमा, भगवान भुवन भास्कर की लालिमा एवं शस्य श्यामला धरा की हरीतिमा के पीछे आख़िर किसकी सत्ता है? स्वर्णिम दिन और मोती सी रात, सुनहली साँझ और गुलाबी सबेरे को कौन चित्रकार बार-बार बनाता है और मिटाता रहता है? निर्गुण ब्रह्म की यह अवधारणा कबीर की मूलभूल प्रवृत्ति है, अर्थात राम से तात्पर्य कबीर का निर्गुण ब्रह्म से है - आपने लिखा भी है - ‘निरगुण राम निरगुण राम जपहु रे भाई’ स्पष्ट है कि कबीरदास की राम-भावना भारतीय ब्रह्म-भावना से पूरा मेल खाती है। राम से कबीर का स्पष्ट अभिप्राय है -

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है आना।।

अर्थात् कबीर ने अपने राम को निर्गुण और सगुण दोनों ही माना है -

अला एकै नूर उपनाया ताकी कैसी निन्दा।
ता नूर थै जगकीया कौन भला कौन मंदा।

कबीर के राम विषयक अवधारणा के पीछे हमें तत्कालीन मध्य युगीन समाज के बारे में कुछ विशिष्ट तथ्यों की ओर अपना ध्यान आकर्षित करना होगा और इसके साथ ही यह भी अवगत करना होगा कि आख़िर कबीर के समक्ष ऐसी कौन ही चुनौतियाँ थीं जो उन्हें राम विषयक विवेचना में प्रखर नहीं होने दिया। दरअसल कबीर एक युग दृष्टा कवि ही नहीं थे बल्कि आपके व्यक्तित्व में एक धर्मनिष्ठ साधक और कर्मनिष्ठ समाज सुधारक भी वर्तमान था। इसलिए कबीर ने तत्कालीन सामाजिक गतियों की निस्सारता को समझा और निर्गुणोपासना की स्थापना में आत्मदान दिया।

कबीर के समकालीन समाज में मूर्ति पूजक हिन्दुओं और मूर्ति भंजक मुस्लिमों के बीच परस्पर वैमनस्यता की ऊँची दीवारें खड़ी थीं और यही वह उचित समय था जब निर्गुणोपासना के द्वारा कबीर अवतारवादी, धारणाओं, मूर्ति पूजा, आस्थाओं, बहुदेववादी दृष्टियों पर भी व्यंग्य कर सकते थे। कबीर की इस निर्गुणोपासना के द्वारा ही अद्वैतवादी दर्शन, एकेश्वरवादी मत और मुस्लिम ख़ुदावादी आस्था में समानता लाई जा सकती थी। यही कारण है कि कबीर भक्ति में रूपाकार को कोई महत्व नहीं है। तुलसी और सूर जैसे सगुण भक्तों के विपरीत कबीर ने निर्गुणराम नाम के स्मरण को ही निर्गुण भक्ति का आधार माना है -

‘‘निरगुण राम निरगुण राम जपहु रे भाई।
अवगति की गति लखी न जाई।।
चारि वेद जाके सुमृत पुरांना,
नौ व्याकरणां मरण ना जाना।।’’

यह कहकर कबीरदास जी ने एक ओर मूर्ति-पूजा, तीर्थाटन, पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड और अवतार दृष्टियों की आवश्यकताओं पर जन-समुदाय का ध्यान आकर्षित किया तो दूसरी ओर मुस्लिम ख़ुदावाद के एकेश्वरवादी मान्यताओं में साम्यता दिखाकर सर्व-धर्म-समन्वय की स्थापना का प्रयास भी किया है। कबीर की मान्यता है कि निर्गुण ब्रह्म की गुणवत्ता की स्थापना शब्दों के माध्यम से नहीं की जा सकती है। अर्थात संत कबीर उसे शब्दों के दायरे की अपेक्षा संकेत और निर्देश मात्र से ही बतलाना चाहते हैं अर्थात् कबीर के राम का रूप सर्वव्यापी है और उसकी झलक कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को ही उपलब्ध हो पाती है, जो प्रेमांजन युक्त, अन्तर्दृष्टि वाले हैं। एक बात कबीर अपने भक्त जनों के प्रति स्पष्ट कर देते हैं वह यह कि निर्गुण ईश्वर सभी जीवों में व्याप्त उस परमात्मा के स्वरूप जैसा है और इसका आकार स्पष्ट होते हुये भी दिखता नहीं है उदाहरण के रूप में मिट्टी के बर्तन को लिया जा सकता है - ‘सृष्टि के जीव में मिट्टी के बने बर्तन की तरह बाह्य आकार में भिन्न तो है किन्तु उसका निर्माण एक ही मिट्टी के तत्व से हुआ है। बाह्य भेद के भीतर यह अन्तरंगता सबमें मौजूद है।’

कबीर के निर्गुण राम के स्वरूप की विशद् व्याख्या करने से पहले हमें कबीर की सीमाओं पर भी विचार करना आवश्यक हो जाता है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि प्रत्येक काल की परिस्थितियाँ उस समय के समाज के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं और एक निश्चित सीमा के बाद दूसरी स्थितियों एवं परिस्थितियों का सामना तत्कालीन समाज शुरू कर देता है। जहाँ तक कबीर की सीमाओं के बारे में हम कहें तो आपकी ‘‘सबसे बड़ी सीमा यह है कि जिस भाषा के माध्यम से वे अनुभूत सत्य को व्यक्त करना चाहते थे वह उन्हें परम्परा से, समाज से, तत्कालीन धर्म चेतना के वाहक योगियों, वैष्णवों, सूफ़ियों, पंडि़तों, सिद्धों तथा मुल्ला-मौलवियों से प्राप्त हुई थी। वे उसे नया स्वर, नया तेवर, नयी भंगिमा, नयी प्रखरता, नया विश्वास दे सकते थे, किन्तु उसमें निहित अर्थ-संस्कार को सहसा बदलना उनके बस की बात नहीं थी। उन्होंने परम तत्व के लिये ‘राम’, ‘हरि’, ‘गोविन्द’, निरंजन, केशव, नारायण्, जगजीवन, माधव, मुकुन्द, महादेव, गोपाल, शालिगग्राम, रघुनाथ, सहज, शून्य, विश्वंभर, नरहरि बीठुला, मुरारि, करीम, रहीम, अल्लाह आदि जितने शब्दों का प्रयोग किया है, उन शब्दों के पीछे सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे धार्मिक-दार्शनिक चिंतन के संस्कार थे। आज भी हम इन शब्दों का अर्थ ग्रहण करते समय संस्कार मुक्त नहीं हो पाते। ....... कबीर की दूसरी सीमा थी लोक में सत्य के स्वरूप को लेकर फैला हुआ भ्रमजाल। इस भ्रमजाल को काटने के प्रयत्न में उनके कथन सापेक्ष हो गये हैं। इसलिये उनके विचारों में अन्तर्विरोध प्रतीत होता है। समाज में विश्वासों, विचारों, मान्यताओं, संस्कारों के अनेक स्तर हैं। अनेक दायरे और सीमाएँ हैं। अनेक रूढ़ियाँ हैं। इनसे मुक्त होने के लिये किया गया संघर्ष भी स्वयं एक दायरा बनकर रह जाता है। इसलिए कबीर जब किसी सीमा को तोड़ते हैं, किसी अंध-विश्वास को खण्डित करते हैं, किसी रूढ़ि का विरोध करते हैं तो उन्हें यह आशंका बनी रहती है कि उनके विचारों की भी एक सीमा न बन जाये। उनके कथनों की भी रूढ़ि न बन जाये। इसलिये संदर्भ-विशेष में कही हुई अपनी ही बात को वे दूसरे संदर्भ में काट देते हैं या संदर्भ के अनुकूल उसकी दूसरी व्याख्या देते हैं। कबीर की तीसरी सीमा यह है कि वे जब जिस धर्म, नेता को सम्बोधित करते हैं, तब बहुत दूर तक उसकी परिचित शब्दावली का प्रयोग करते हुए उसे उसी की भाषा में समझाने की चेष्टा करते हैं। इसलिए कबीर की निजी मान्यताओं को समझने के लिए यह सतर्कता आवश्यक है कि उन्होंने कितना दूसरों को समझाने के लिए, यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारे मर्म से परिचित हूँ, कहा है और कितना अपनी मान्यताओं को स्पष्ट करने के लिए।’’

स्पष्ट है कि राम विषयक अवधारणा के पीछे कबीर की अपनी ये विशिष्ट सीमायें थीं और उनको स्मरण कर आपने इन सीमाओं का अतिक्रमण नहीं किया। डॉ. श्याम सुन्दर के अनुसार - कबीर की राम भावना भारतीय ब्रह्म भावना से सर्वथा मिलती है जैसा कि कुछ लोग भ्रमवश समझते हैं, वह बाह्मार्थवाद मूलक मुसलमानी एकेश्वरवाद या ख़ुदावाद के समर्थक नहीं थे ...... वह राम को सगुण और निर्गुण दोनों मानते हैं। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक होने के कारण ही कबीर ने ‘राम’ को आलम्बन बनाया था। इसलिए कबीर के राम दशरथ सुत राम से अलग हैं। यह रहस्य का विषय है। यही नहीं कबीर के ‘राम’ बौद्धों के शून्य ब्रह्म के प्रतिरूप हैं। आपने ‘राम’ के रूप में बौद्धों के शून्य ब्रह्म को एक व्यक्तित्व प्रदान किया है।

परमतत्व को बार-बार ‘निर्गुण’, निरंजन, निराकार कहते हुए कबीर उसमें उन गुणों की स्थिति मानते हैं जो सामान्यतः सभी भक्त अपने अराध्य में स्वीकार करते हैं। कबीर के निर्गुण राम ‘कृपालु’ हैं। उन्हीं की कृपा से कबीर जरामरण से मुक्त हो सके हैं।’’ अपनी राम विषयक विवेचना को आगे बढ़ाते हुए कबीर लिखते हैं कि - ‘‘जब न पवन था न पानी, जब न धरणी थी न आकाश, जब न पिण्ड था न प्राणियों का आवास, जब न गर्भ था न मूल, जब न कली थी न, फूल, जब न शब्द था न उसका आस्वाद, न विद्या थी न वाद, जब न गुरू था न शिष्य, जब सृष्टि ही नहीं थी, उस समय भी गम्य और अगम्य दोनों ही स्थितियों से परे जो अविगत तत्व विद्यमान था, उसकी व्याख्या कैसे हो सकती है।’’ कबीरदास के अनुसार इस अविगत निराधार तत्व का बार-पार नहीं जाना जा सकता। वह लोक और वेद दोनों से परे है। वह सारे संसार से अलग है। न उसका कोई गाँव है, न ठाँव, न उसका कोई रूप है न रेख न गुण न वेश। न वह बालक है न युवा न वृद्धि। ऐसा साहब कुल रहित है। वह अपने आप ही अपने को मुक्त कर लेता है।’’ कबीर निर्गुण, निराकार ब्रह्म के बारे में आगे कहते हैं कि उसका रूप स्वरूप कुछ कहते नहीं बनता। उसका हल्कापन या भारीपन भी नहीं तौला जा सकता। वह भूख-तृष्णा, धूप-छाँह, सुख-दुःख सभी से रहित है। वह अविगत अपरंपार ब्रह्म ज्ञान रूप और सर्वत्र विद्यमान है उसके समान दूसरा कोई नहीं है।’’ अर्थात कबीर का यह निर्गुण राम (परमतत्व) सर्व-निरपेक्ष होते हुए भी ‘एक’ है। वे बार-बार कहते हैं कि ‘मैंने तो उस एक तत्व को ‘एक ही’ करके समझा है। जो दो कहते हैं उन्होंने उसे ठीक से पहचाना नहीं है ऐसे ही लोगों को दोज़ख में जाना पड़ता है।’’ अपनी बात कहते समय जब लोगों पर कबीर असर नहीं डाल पाते तो वे भेद-दृष्टि वालों की जड़ता (मूर्खता) पर झल्ला उठते हैं और कहते हैं कि अरे भाई, क्यों व्यर्थ में बीच में भेद पैदा करते हो? तत्व ‘दो’ कैसे हो सकता है।’’ हिन्दू-मुस्लिमों की संकीर्णता एवं मतभेदों पर अपना विचार व्यक्त करते हुए कबीर कहते हैं कि - ‘‘हिन्दुओं और तुर्कों का कर्ता एक ही है। ‘राम’ और ‘रहीम’, ‘केशव’ और ‘करीम’, बिसमिल और विश्वंभर में भेद नहीं करना चाहिए।’’ इसी क्रम में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कबीर कहते हैं कि ‘‘परमतत्व एक है, किन्तु यह सब में व्याप्त है। कौन राजा है कौन रंक? कौन वैद्य है, कौन रोगी? किसे पंडित कहा जाय और किसे योगी? इन सबमें वही एक विद्यमान है। संसार के सारे पदार्थों में उस एक ने ही अपने को स्थापित किया है।’’जो रूप रंग रहित है, वही घट-घट में (प्रत्येक शरीर में) समाया हुआ है।’’वह सबमें और सब उसमें विद्यमान हैं इसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।’’ मुसलमान एक ख़ुदा की बात करते हैं; किन्तु मेरा स्वामी तो घट-घट में समाया हुआ है।’’ ईश्वर के सर्वव्यापी होने पर एक उदाहरण के द्वारा कबीर स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि ‘‘जैसे सूर्य (एक) का प्रतिबिम्ब प्रत्येक प्रकार के जल (नदी, समुद्र, कुआँ, घड़ा आदि) में पड़ता है, उसी प्रकार एक ही राम सभी पदार्थों में प्रतिबिम्बित है।’’ इसलिए मन की चंचलता पर व्यंग्य करते हुए कबीर कहते हैं कि ‘‘रे मन ! कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। वह अविनाशी तो हृदय-सरोवर में ही विद्यमान है।’’उसे ‘‘दुनिया में ढूँढ़ना तो भ्रम में पड़ना है। हरि तो हृदय में ही है।’’ इसलिए वह आत्माराम है। कबीर कहते हैं कि भोले मनुष्यों ! तुम किस विचार से पूजा करते हो? ‘आत्माराम’ के अतिरिक्त और कोई नहीं है।’’कबीर के अनुसार ‘‘नंगा रहने या चर्म लपेटने से कुछ नहीं होगा। आत्माराम को पहचानने से ही कुछ हो सकता है।’’

कबीर का यह आत्माराम शंकराचार्य के ब्रह्म की तरह बिल्कुल निष्क्रिय कदापि नहीं है वरन वह सर्वव्यापी अखिल सृष्टि का कर्ता भी है क्योंकि ‘‘आकार-रहित और अव्यक्त होते हुए भी अर्थात हाथ, पैर, मुख, नेत्र, कान, जिह्वा आदि के न होने पर भी वह परमात्मा संसार की सारी संवेदनाएँ ग्रहण करने में समर्थ है। वह बिना मुख के खाता है, बिना पैरों के चलता है, बिना जिह्वा के गुण-गान करता है और अपने स्थान पर स्थिर रहते हुए भी दशों दिशाओं में गतिशील रहता है।’’ कबीर के राम (निर्गुण ब्रह्म) विषयक इस व्याख्या के पीछे जो निष्कर्ष निकलकर आये वह निम्न हैं -

1. कबीर के राम सर्वव्यापी, परम तत्व एवं आत्माराम हैं।
2. कबीर के राम पल भर में सृष्टि की रचना करने वाले भुवन पति हैं।
3. कबीर के राम करुणा, दया, कृपा, उदारता जैसे महान गुणों के स्वामी हैं।
4. आकार रहित होने के बावजूद कबीर के राम संसार की सभी शक्तियों से परिपूर्ण एवं उनको अपने वश में करने वाले हैं।
5. कबीर के राम सर्वव्यापी, अखिल विश्व के स्वामी एवं सभी के हृदय में सदैव विद्यमान रहने वाले हैं।
6. कबीर के राम का कोई आकार नहीं है इसलिए उसकी शक्ति-सामर्थ्य एवं अगोचर दिव्य सत्ता को हम केवल महसूस कर सकते हैं उसे व्यक्त करना सबके बस की बात नहीं है।

यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि कबीर के राम विषयक उपर्युक्त विवेचना जहाँ एक ओर उनके व्यक्तिगत चिंतन का आधार हो सकती है तो वहीं दूसरी ओर तत्कालीन समय में व्याप्त आध्यात्मिक चेतना की प्रेरणास्रोत भी, क्योंकि कबीर के राम के परमतत्व सम्बन्धी व्याख्या की गहराई में यदि हम जायें तो निर्गुण-सगुण या द्वैत-अद्वैत से परे ‘समतत्व’ के रूप में लक्षित करने वाली बात नाथयोगियों के दर्शन में स्पष्टतया दिखती है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं कि कबीर ने तत्कालीन समय में यह द्वैत-अद्वैत (निर्गुण-सगुण) सम्बन्धी विवाद यही से ग्रहण किया हो। रामचंद्र तिवारी जी के शब्दों में कहें तो ‘‘परमतत्व को द्वैत-अद्वैत से परे निर्दिष्ट करने का अर्थ था सारे विवादों से ऊपर उठ जाना। यही कबीर का अभीष्ट था।’’ स्पष्ट है कि कबीर के राम जैसे हैं ठीक उन्हें वैसे ही रूप में वे नहीं जाने जा सकते हैं क्योंकि राम विषयक अपनी अवधारणा में तत्वदर्शियों और पण्डितों के विवाद से ऊपर उठने के लिए कबीर ने परम तत्व को द्वैत-अद्वैत से परे बताकर हिन्दुओं और मुसलमानों के धार्मिक-साम्प्रदायिक विवादों को मिटाने के लिए ही एक जगदीश का नारा दिया। इसलिए देखा जाए तो कबीर के द्वारा दिए गए ये तर्क एक आस्तिक भक्त के तर्क लगते हैं क्योंकि उनके तर्कों के पीछे सारे द्वन्द्वों, विवादों, रूढ़ियों और संकीर्णताओं से ऊपर उठने की प्रवृत्ति जो काम कर रही थी।


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