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| 02.13.2009 |
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नये वर्ष २००९ की एक शाम की बर्थ डे पार्टी का आमंत्रण |
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कहते है
कि प्रोफेसर समाज को आदर्श एवं मूल्यों की प्रेरणा की दावत सदैव देता रहता
है। इन्हीं आदर्श एवं मूल्यों की दावत देते-देते वह अपना जीवन समाज की सेवा
में गुज़ार देता है। सामाजिक दायरे में आने पर उसकी नकली दावत में हम जैसे
प्रोफेसर सदैव पीछे रह जाते हैं परन्तु यहाँ शातिर दिमाग के साथी प्रोफेसर
सदैव दिग्विजयी रहते हैं। अब देखिये कल की ही बात है ब्रजेश जी ने कहा कि
बीरू जी कुछ भी हो नकुल अंकल के यहाँ बर्थ-डे पार्टी पर आपको अवश्य चलना
है। ब्रजेश जी की यह महान विशेषता है कि वे ऐसे महान आदेश देकर दूसरे शिकार
की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे लिये तो ब्रजेश इस अजनबी शहर में माझी की तरह
हैं। फिलहाल मजबूरी का दूसरा नाम डी. वी. महाविद्यालय में नयी नियुक्ति।
फिलहाल अक्सर ऐसे संकट के दौर में मैं अपने संकट मोचक प्रोफेसर चमन जी का
सहारा लेना नहीं भूलता। अतः मैं इस दावत की सूचना संकट मोचक जी के यहाँ ले
गया। सूर्यास्त होने में अभी समय था कि मैं संकट मोचक के घर लपक पड़ा। इन
बरखुद्दार में यूँ तो बारहोमास भैरव का भूत (गुटका की लत) ही लगा रहता है।
लेकिन आज साहब जी का रूप एकदम बदला हुआ था।
चाय की
चुस्कियों के दौर में हमने पूछा,
“भाई
साहब सब कुछ मंगल तो है?
कहीं घर में या बाहर लपटा झपटी तो नहीं हुई?”
भाई
साहब ने मुँह की गुल्लक सचिन के बल्ले की तरह खोली और खन्न से गुटका थूकते
हुये नहीं का छक्का लगा दिया। तभी मैंने अचानक गुगली फेंकते हुए पूछा,
“क्यों
सिग्नल की तरह मुँह लटकाये इस तरह शाम को बैठे हुये हैं।”
इतना
सुनकर मित्र महोदय बाथरूम में चले गये और हाथ मुँह धोकर लगभग पाँच मिनट बाद
लौटे और कपिलदेव की स्टाइल में बोले,
“क्या
बताऊँ जो ससुराल से सफेद सूट मिला था शादी के ठीक तीन साल बाद कल पहली बार
मेरे शरीर पर उसका लोकर्पण हुआ और कल ही उसकी ये हालत हो गयी,
जैसे कि दस्तरखान (खाना परोसने) वाला।“
हमने कहा,
“भाई
जी न्यूज रील मत दिखाओ। पूरी बात स्पष्ट कीजिए कि आखिर माजरा क्या है?”
वह उवाचे-
“कल
वाइफ को लेकर मुझे राम बाबू भाई साहब के जाना था। जिद्द करके उसने वही सूट
पहनवा दिया। कुर्ते पैजामे वाले आदमी के जैसे सारे शरीर में प्लास्टर बाँध
दिया गया हो। चलते समय सारे रास्ते कुत्ते सोहर गाते रहे। जैसे-तैसे हम
मियाँ बीबी मौके वारदात पहुँच गये। भीड़ तो बहुत थी। पहुँचते ही श्रीमती जी
ने काफी की फ़रमाइश कर दी। काउण्टर पर तैंतीस प्रतिशत पुरुषों के अलावा
स्त्री और बच्चों का ही महासम्मेलन चल रहा था। सूट और इज्जत दोनों बेदाग भी
रहे और काफी भी मिल जाए,
इसी जुगाड़ में काफी समय निकल गया। काफी न मिलने पर गृह मंत्रालय से जबाव
तलब का भयंकर भय?
वहीं दूसरी ओर काफी मशीनें भी अब तरल के बजाय भाप ही उगल रही थीं।
जैसे-तैसे दो प्याले लेकर मैं वहाँ से बच निकला। एक प्याला जैसे ही श्रीमती
जी को सुपुर्द किया ही था कि वह जामें से बाहर हो गयीं। बोली
’अन्धे
हो क्या?
इतना भी नहीं दिखाई देता। खाली कप लेकर चले आये। शर्म नहीं आती! अपना सूट
देख रहे हो ऐसा लग रहा है जैसे होली का त्यौहार।”
मैंने
स्थिति की गम्भीरता को देखते हुये मन ही मन भूमिका बनाते हुये इस नाजुक
वक़्त को टालना चाहा और अपने मंतव्य को व्यक्त किया -
“भाईसाहब
यह सब छोड़िये,
रोना-धोना आज हम आपको ऐसी दावत में ले चल रहे हैं जहाँ भारतीय संस्कृति एवं
सभ्यता को ताक पर नहीं रखा जायेगा और आपकी अस्मिता को कोई खतरा भी नहीं
रहेगा। क्या हुआ बफ्फे सिस्टम ही तो है परन्तु अपने कालेज के सभी प्रोफेसर
लोग भी तो आयेंगे। डी. वी. कालेज के प्रोफेसर?”
भाईसाहब
ने भृकुटी तानते हुये मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं आईएसआई का एजेन्ट हूँ और
हमारे भोलेपन पर वे मोनालिसा जैसी मुस्कान बिखेर दिये। साथ ही कहा कि ठीक
है वीरू मामा माहिल की नगरी में तुम्हारा स्वागत है। चूँकि भाईजी को मनाने
में काफी समय हो गया था और इधर भूख के मारे पेट की हालत राशन कार्ड की तरह
चिथड़े-चिथड़े हो रही थी हम लोगों ने परिवार सहित महाप्रस्थान किया। शरीफों
की पार्टी थी,
सो
पहले खा भी नहीं सकता था,
तभी आर्केस्ट्रा मंच से लफ्फाजी हुई,
“सभी
मेहमानों से गुज़ारिश है कि वे बगल के पण्डाल में जाकर भोजन ग्रहण कर लें।“
इतना सुनते ही पण्डाल की तरफ भीड़ का काफ़िला बढ़ा। भूख का प्रश्न था वह क्या
न करवाये?
मैंने अपने बेगम का हाथ पकड़ा और कहा,
“चलो
भोज के लुटेरों में शामिल हो जायें।“
यह
वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि एक भारी भरकम नारी का कंठ फूटा,
“शर्म
नहीं आती,
इतनी जोर से हाथ पकड़ते हुये किसी अजनबी का।”
क्षमा माँगकर मैं अपनी वाइफ की खोज में निकल पड़ा।
यहाँ भी
बड़े बफ्फे सिस्टम का खेल चल रहा था जैसे भारतीय राजनीति चलता रहता है,
अब
मेरा पूरा ध्यान सूट को कलंकित होने से बचाने में लगा हुआ था क्योंकि यहाँ
हमारे सूट की अस्मिता का खतरा वैसे ही मँडरा रहा था जैसे बेमेल गठबन्धन
सरकार के भविष्य पर। उधर भोज के लुटेरों में आर-पार का संग्राम चल रहा था।
प्लेटों की ढाल और चम्मचों की तलवारों के घमासान में कई योद्धा विजयी हो
चुके थे। उनके कपड़ों पर सब्जी,
चटनी,
रायता आदि इस बात की गवाही थी कि वे खानदानी पार्टियों के प्रतियोगी हैं।
मैंने इस
बीच अपनी बगल में झाँक-ताक की तो पत्नी एवं प्रोफेसर मित्र गायब/नदारद थे
कहीं अर्थात नज़दीक फटक नहीं रहे थे। हालाँकि मैं अपनी पत्नी के बारे में
पूरी तरह से संतुष्ट था क्योंकि खाने-पीने के मामले में उसकी उदारता से मैं
भलीभाँति परिचित था। तभी सामने मैंने देखा कि चाऊमीन वाले मोर्चे पर हमारी
पत्नी
’खूब
लड़ी मर्दानी झांसी की रानी‘
की
तरह चौकड़ी भर रही थी,
उनके इस अदम्य और ऐतिहासिक साहस को देखकर मेरा पुरुषार्थ हिलोरें मारने
लगा। कॉलेज में पढ़ते समय अक्सर में क्लास को बंक करता था और गोरिल्ला
तकनीक अपनाता था यहाँ भी मैंने पुरानी तकनीक का सहारा लिया और मैंने
गोरिल्ला युद्ध अपनाया। आधुनिक सुष्मिताओं,
ऐश्वराओं एवं कैटरीनाओं की आड़ लेता हुआ मैं प्लेट और चम्मचों के बिल्कुल
नज़दीक आ गया। प्लेट और चम्मचों की संख्या भीड़ के अनुपात में भारत की विदेशी
मुद्रा भण्डार की भाँति नगण्य थी। इसी समय पाण्डाल के पीछे से नयी रसद
भी आतंकियों की तरह आ गयी। प्लेटों की सफेदी पर सब्जी,
रायता,
चटनी आदि ज़ख्मों के निशान स्पष्ट नज़र आ रहे थे। हमारे पूरे होशोहवास में
सूट अभी तक कुँआरा था। चम्मच और प्लेट पर हाथ लगते ही मेरे आत्मविश्वास का
पेट्रोमेक्स रोशन हो उठा। अभी आगे की रणनीति बना ही रहा था कि भोज के
लुटेरों की रिफाइण्ड खेप आ गयी। एक ही धक्के में मैं सलाद के मोर्चे पर
तैनात हो गया। टमाटर और मूली के चंद टुकड़े ताज होटल की तरह घायलावस्था में
इधर-उधर पड़े थे। डूबते को तिनके का सहारा। मैंने उन्हें नोबेल पुरस्कार की
तरह बटोर लिया। मैं रेंगते-रेंगते जब सब्जी वाले मोर्चे पर पहुँचा तो वहाँ
युद्ध विराम घोषित हो चुका था। सभी कटोरे सोने की चिड़िया वाले राष्ट्र का
वर्तमान बन चुके थे। कुछ चावल एक कटोरे की ढाल से चिपके मिले। कृष्ण
द्रौपदी प्रकरण को याद करते हुये इस अक्षय पत्र की ओर आहिस्ता-आहिस्ता
मैंने उसे उधेड़ा। मूली और चावल की अजीबो गरीब काम्बिनेशन को आधुनिकता का
पैमाना मानकर मैंने उदरस्थ कर लिया और फिर एक बार पत्नी एवं प्रोफेसर मित्र
की तलाश में निकल पड़ा। पार्टी के इस महासंग्राम में हमारी प्यास देवी जाग्रत हो गयीं। पानीपत का यह महासंग्राम ठीक सामने वसूली काउण्डटर के बगल में छिड़ा हुआ था। मैं जिस गिलास को उठाता वह धक्के खाकर अपने मूल रूप में आ जाता तभी मैं देखता क्या हूँ कि एक वीरांगना हाथों में दो गिलास लिये प्रकट हुयी। उसने उदारता का परिचय दिया। एक गिलास मुझे हैंडओवर किया। हमने गौर फरमाया तो पता चला कि यह तो मेरी ही पत्नी है। मैंने पूछा, “ये क्या हालत बना रखी बेगम साहिबा।“ वह बोली, “बफ्फे सिस्टम है भारतीय संसद की तरह है, जो जीता वही सिकन्दर।” यह फरमाकर वह अगले शिकार के लिये निकल पड़ी। मैंने कुशल पत्नी धर्म का निर्वहन करते हुये उनका पीछा किया। किन्तु वह गायब हो चुकी थीं और यह मोर्चा मेरे सूट के लिये काफी संवेदनशील था। बच्चे, बूढ़े, औरतें सभी के सभी आइसक्रीम-आइसक्रीम चिल्ला रहे थे। हमारी पत्नी साहिबा ने यहाँ भी सफलता प्राप्त की। जैसे उन्होंने हमें आइसक्रीम की कागज़ वाली प्लेट वह पकड़ाई उछल पड़ी। बोली – “सत्यानाश कर दिये! ये सूट है या सब्जी का बाजार।“ पास में खड़े हमारे मित्र प्रोफेसर इस नज़ारे को देखकर कुटिल मुस्कान बिखेर रहे थे, उनसे रहा नहीं गया और बोले, “यार ऐसी आधुनिकता किस काम की जो आदमी को वहशी बना दे?” मैंने भी उन्हीं की कपिल देव वाली स्टाइल में मुस्करा कर कहा – “मित्र देवता, बफ्फे सिस्टम आधुनिकता ही नहीं है बल्कि यह समूचे भारतीय लोकतंत्र की हक़ीक़त है, रोटी के लिये लड़ते हुये इंसान की जीती जागती यह तस्वीर है!!” |
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