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05.04.2012

ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में बुन्देलखण्ड के योगदान का मूल्यांकन
भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की विश्व के सबसे बड़े आन्दोलनों में शुमार होती है क्योंकि इस आन्दोलन में अलग-अलग विचारधाराओं और विभिन्न वर्गों के लाखों-लाख लोगों को इस आन्दोलन ने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से सक्रिय होने पर विवश किया, जो विश्व के सबसे शक्तिशाली औपनिवेशिक साम्राज्य की हार के रूप में सबके समक्ष आया। इस स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह थी कि इसे बिना किसी क्रांति के नैतिक, राजनीतिक साथ ही विचारधारात्मक तीनों ही स्तरों पर लम्बे जनसंघर्ष चलाकर इसमें सफलता हासिल की गयी। यही नहीं इसमें सफलता प्राप्त करने के लिये कई वर्षों तक धीरे-धीरे जवाबी की राजनीतिक नेतृत्व की शक्ति संचित की गई तथा जहाँ संघर्ष और शांति के दौर बारी-बारी से आते-जाते रहे।
      संघर्ष और शांति के इस दौर में प्रथम कड़ी के रूप में १९वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास की सबसे प्रमुख घटना सन् १८५७ ई. का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विद्रोह, विप्लव, गदर या क्रांति है। हॉलाकि इतिहासकारों के बीच यह बहस का मुद्दा रहा कि यह विद्रोह एक सिपाही बगावत था या राष्ट्रीय आन्दोलन था या सामंती प्रतिक्रिया का प्रस्फुटन मात्र? क्या भारतीय असंतोष को कम करके आंकने के लिये यह अंग्रेज़ इतिहासकारों की एक साज़िश थी? फिलहाल जो भी हो परन्तु इतना तो कहा जा सकता है कि सन् १८५७ ई. का विद्रोह उन विभिन्न असंतोषों के पुंजीभूत हो जाने का परिणाम था जिनसे भारतीय, अंग्रेज़ों की स्वार्थपूर्ण नीतियों के कारण वर्षों से घुटन अनुभव कर रहे थे। पिछले (सन् १७५७ ई. - सन् १८५७ ई.) सौ वर्षों से अंग्रेज़ कम्पनी भारत के विभिन्न क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाती जा रही थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारत में दो प्रमुख कार्यों में पहला साम्राज्य बढ़ाना और व्यापारिक शोषण। कम्पनी की धन लोलुपता की कोई सीमा नहीं थी और प्रत्येक प्रकार से भारतीयों का शोषण कर रही थी जिनमें आर्थिक शोषण मुख्य था। कम्पनी की भारत में इन गतिविधियों से उसके राज्य का तेजी से विस्तार हुआ। फलतः शासन प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन हुये। इन समस्त नीतियों के संचित प्रभाव से भारत में सभी वर्गों, रियासतों के राजाओं, सैनिकों, ज़मींदारों, कृषकों, व्यापारियों, ब्राह्मणों तथा मौलवियों (केवल शहरी पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त वर्ग जो अपनी जीविका के लिये कम्पनी पर निर्भर थे) सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इन नीतियों एवं अंग्रेज़ों के आचरण के पीछे भारतीयों के प्रभावित होने के प्रमुख कारण यह कि भारतीय लोग लम्बे अरसे से एक समान रहने के खास तरीकों के अभ्यस्त थे, और अंग्रेज़ों ने उनके इन तरीकों में हेर-फेर से भारतीय जीवन की शांत धाराओं को आंदोलित होने को विवश कर दिया, जिससे देश के विभिन्न भागों में हलचलें पैदा होने लगीं। भारतीय एवं कुलीन और जन-साधारण दोनों ही वर्गों में बढ़ती असंतोष और आशंकायें ही छोटे-छोटे विद्रोह के रूप में (सन् १८५७ ई. के विद्रोह से पहले) वैल्लोर में सन् १८०६ ई. में, सन् १८१६ ई. में बरेली, सन् १८२४ ई. में बैरकपुर, सन् १८३१-३२ ई. में कोल विप्लव तथा छोटा नागपुर और पलामू में अन्य छोटे विद्रोह, मुस्लिम आन्दोलन जैसे फेराजी उपद्रव - सन् १८३१ ई. में बरासत (बंगाल) में सैयद अहमद और उनके शिष्य मीर नासिर अली या टीटो मीर के नेतृत्व में, सन् १८४२ ई. में ३४वीं रेजिमेंट का विद्रोह, सन् १८४९ ई. में फरीदपुर (बंगाल) में दीदू मीर के पथ प्रदर्शन में (सन् १८४९ ई, सन् १८५१ ई., सन् १८५२ ई. और सन् १८५५ ई. में मोपला विप्लव तथा सन् १८५५-१८५७ ई. का संथाल विद्रोह)। सन् १८४९ ई. में सातवीं बंगाल कैवेलरी और ६४वीं रेजीमेंट और २२वीं एन.आई. का विद्रोह, सन् १८५० ई. में ६६वीं एन.आई. का विद्रोह और सन् १८५२ ई. में ३८वीं एन.आई. का विद्रोह इत्यादि। इन विद्रोहों के पीछे अनेक राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक, सैनिक कारण हो सकते हैं। परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि ये सभी अंग्रेज़ी शासन की नीतियों के विरुद्ध जनता के दिलों में संचित असन्तोष एवं विदेशी सत्ता क प्रति घृणा का परिणाम था। इन विद्रोह की तह में जाने से यह सुनिश्चित होता है कि भारत में बिट्रिश साम्राज्य में सामान्य विक्षोभ था। इस सामान्य विक्षोभ की धीरे-धीरे सुलगती आग सन् १८५७ ई. में धधक उठी जिसने अंग्रेज़ी साम्राज्य की मजबूत बुनियाद की जड़ों को झकझोर (हिला) दिया। सन् १८५७ ई. के इस विद्रोह को अंग्रेज़ी साम्राज्यवादी विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों ने सामंती असंतोष की अभिव्यक्ति मात्र कहा है परन्तु वास्तव में प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अंग्रेज़ों की नीतियों ने जो अस्तव्यस्तता एवं असंतोष की भावना ला दी उसकी ही अभिव्यक्ति सामंत सेना और जनता के माध्यम से सन् १८५७ ई. की क्रांति, विप्लव या महान विद्रोह या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुई।
       प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की इस चिंगारी ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रगति को बढ़ावा दिया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की कहानी भारतीयों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के संग्राम का इतिहास है। यह बिट्रिश सत्ता की गुलामी से मुक्ति पाने के लिये भारतीयों द्वारा संचालित आन्दोलन था। वैसे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की शुरूआत वस्तुतः सन् १८८५ ई. में कांग्रेस की स्थापना के साथ हुई लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि कई वर्षों से ही भारत में अंग्रेज़ी सत्ता की स्थापना हो चुकी थी। सन् १८५७ ई. में बिट्रिश सत्ता के विरुद्ध भारतीयों द्वारा पहली बार कुछ संगठित एवं हथियार बंद लड़ाई ने राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में संघर्ष, समझ एवं एकता के बीज बोये। यद्यपि यह विप्लव असफल रहा, परन्तु इसने प्राचीन और सामंतवादी परम्पराओं को तोड़ने में पर्याप्त सहायता पहुँचायी तथा इसके बाद ही भारत आधुनिक स्वतंत्रता संघर्ष आन्दोलन के नये युग में प्रवेश कर सका।
          देशव्यापी इस क्रांति का प्रभाव बुन्देलखण्ड की माटी में भी पड़ा। बुन्देलों की इस वीर वसुन्धरा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका अदा की है क्योंकि वर्तमान में बुन्देलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र का इतिहास अत्यन्त प्राचीन एवं गौरवशाली रहा है। यह भारत के हृदय प्रदेश के रूप में सुविख्यात अपनी स्वतंत्र चेतना के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। बुन्देलखण्ड को निम्न प्राचीन नामों से भी संबोधित किया जाता है। चेदि, मध्यप्रदेश, जैजाक, भुक्ति, आटविक, दशार्ण इत्यादि। ’बुन्देलखण्ड का प्राचीन नाम दशार्ण, अर्थात दस नदियों का देश, वे दस नदियां क्रमशः क्रेन, धसान, पहूज, बेतवा, सिन्ध, जमुना, नर्मदा, टोंस, जामनेर तथा चम्बल हैं।‘ भारत में उ.प्र. राज्य में बुन्देलखण्ड का भूखण्ड यमुना नदी और विंध्याचल पर्वत के बीच में स्थित है। इतिहासकार जय चंद विद्यालंकार ने विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी में विस्तृत क्षेत्र को बुन्देलखण्ड के नाम से सम्बोधित किया है। वहीं दूसरी ओर बुन्देलखण्ड की भौतिक शोधों के आधार पर निम्न सीमा निर्धारित की गई है - ’वह क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण में विन्ध्य, प्लैटों की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चम्बल और दक्षिण-पूर्व में पन्ना व अजयगढ़ श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुन्देलखण्ड के नाम से जाना जाता है। इसमें उत्तर प्रदेश के जिले हैं - जालौन, झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा और बांदा तथा मध्यप्रदेश के चार जिले - दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना के अलावा उत्तर में भिण्ड जिले की लहर और ग्वालियर जिले की भाण्डेर तहसीलें भी सम्मिलित हैं।
        बुन्देलखण्ड का यह भूखण्ड अपनी अदम्य प्रेरणाओं और स्वतंत्र प्रवृत्तियों के लिये प्राचीन इतिहास युग से ही विशिष्ट है। मध्यकाल में महाराज छत्रसाल बुन्देला के महान शौर्य ने इस क्षेत्र के सुयश को आगे बढ़ाया। जिससे इसे बुन्देलखण्ड नाम दिया। चंदेलों और बुंदेलों की संतानों का शौर्य सन् १८५७ ई. के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में पराक्रम एवं स्वतंत्रता की कामना ज्वलंत रूप से सामने आयी जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, नानासाहब और ताँत्या टोपे के सुयोग्य नेतृत्व में अंग्रेज़ों से युद्ध करते हुये भारतीय इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ा था।
         भारत में राष्ट्रीय चेतना पूर्णरूप से सन् १८५७ ई. तथा सन् १९२१ ई. की अवधि के दौरान पुष्पित हुई और परवर्ती कालीन स्वतंत्रता आन्दोलन जिसे हम राष्ट्रीय आन्दोलन की संज्ञा देते हैं सन् १८८५ ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म के साथ ही सुगठित रूप में सामने आया। जिसके नेतृत्व में भारतवासियों ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता के लिये लम्बा और ऐतिहासिक संघर्ष किया। इस कालावधि के संघर्ष में बुन्देलखण्ड सक्रिय रूप से भाग ले रहा था। सन् १९०५ ई. में बंग भंग के विरुद्ध आन्दोलन में बुन्देलखण्ड ने अपनी जुझारू प्रवृत्ति का परिचय दिया। सन् १९०५ ई. से १९११-१२ तक और सन् १९२१ ई. से सन् १९३० ई. - सन् ३१ ई. तक के आन्दोलन में क्रान्तिकारी आन्दोलन के स्वर ही अधिक मुखर हुये। जिनमें से पहले में तो कम परन्तु द्वितीय चरण में चन्द्रशेखर आज़ाद और भगवानदास माहौर जैसे क्रांन्तिकारियों के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बुन्देलखण्ड की इस प्रकृति और प्रवृत्ति की धारा में सन् १९२१ ई. के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर अनेक वीर युवक सामने आये। सन् १९२८ ई. में साइमन कमीशन के विरोध में और सन् १९३० ई. के सत्याग्रह आन्दोलन में भारी संख्या में बुन्देलखण्ड के शिक्षित युवकों ने महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी। सन् १९३१ ई. से सन् १९४० ई. के मध्य महात्मा गाँधी और पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड ने आज़ादी की राजनीतिक लड़ाई में बड़े उत्साह से भाग लिया, जेल यात्रायें की और पुलिस का दमन सहा। सन् १९४२ ई. में भारत छोड़ो आन्दोलन में बुन्देलखण्ड की साधारण जनता ने भी गाँधी जी के आह्वान पर शासन से अहसयोग किया। स्वतंत्रता की भाषा से ओत-प्रोत होकर बुन्देलखण्ड की रियासतों ने भी रियासती आन्दोलन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
          राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के महान नेताओं को उनके त्याग एवं बलिदान के लिये आज भी हम याद करते हैं किन्तु वे स्थानीय और आँचलिक नेता जो अपने स्वतंत्रता आन्दोलन की भागीदारी में राष्ट्रीय नेताओं के सहयोगी रहे एवं उनसे किसी भी स्तर (अर्थ) के पीछे नहीं रहे राष्ट्रीय आन्दोलन में उनके योगदान का आज तक कोई उचित मूल्यांकन करने का प्रयास नहीं किया गया है। जब हम बुन्देलखण्ड के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि अपने अनूठे शौर्य और स्वातन्त्रय प्रेम के कारण विदेशियों के विरुद्ध या राष्ट्रीय आन्दोलन में बुन्देलखण्ड सदैव से ही अग्रणी रहा है। परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन में बुन्देलखण्ड के योगदान का अद्यतन न तो उचित मूल्यांकन किया गया है और न ही देश की प्रगति में इस क्षेत्र को बराबरी का भागीदारी बनाने की दिशा में कोई प्रयास किया गया इसके अतिरिक्त बहुत से महत्वपूर्ण तथ्य जिनके मौखिक और अभिलेखीय साक्ष्य अभी उपलब्ध हैं किन्तु जो लेखबद्ध नहीं किये गये हैं ? बुन्देलखण्ड के कई महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी अभी तक जीवित हैं जिनसे इतिहास के कई रहस्य किन्तु अहम सत्य उद्घाटित हो सकते हैं? अतएव काल की दृष्टि से भी इस विषय पर शोध में अब और विलम्ब उचित नहीं है। बुन्देलखण्ड के आन्दोलन एवं स्वतन्त्रता के इतिहास की उसकी प्रकृति, प्रवृत्ति और उसकी गौरवमयी परम्परा का आंकलन करते हुये इस क्षेत्र को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन तथा क्रांतिकारी संगठनों का सम्यक लेखा-जोखा अभी शोध के क्षेत्र में नहीं हुआ है। स्वतंत्रता आन्दोलन के उन अगणित शूरवीरों को समय के अन्धकार के गर्त से निकालकर प्रकाश में लाना आज समय की महती आवश्यकता है।

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