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05.04.2012

महादेवी वर्मा की शृंखला की कड़ियों में स्त्री विमर्श की अवधारणा एवम चिंतन परम्परा

साहित्य रचना के लिये आवश्यक सृजन और निर्माण शक्ति की विभूति ले नारी-पुरुष की तुलना में काव्य के अधिक समीप आती है क्योंकि भावनाओं की कोमलता और अभिव्यक्ति की कलात्मकता, दोनों ही नारी स्वभाव के प्रबल पक्ष हैं। एक ओर जहाँ शक्ति और शासन प्रिय पुरुष ने अधिकार, संघर्ष और भौतिक सफलताओं में ही जीवन का मूल्यांकन किया, वहाँ स्त्री ने समर्पण, सेवा और त्याग में अपने जीवन की सार्थकता मानी। सूक्ष्म भावना के प्रति जितनी पकड़ स्त्री लेखन में मिलती है उतनी पुरुष लेखन में नहीं, इतिहास इस तथ्य का साक्षी रहा है कि स्त्रियों के द्वारा रचित ऋग्वेद की ऋचाएँ, पुरुषों द्वारा बनाई हुई कविताओं से किसी भी प्रकार कम नहीं है यह दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि अनुभूति और भावनाओं की प्रतिमूर्ति होते हुये भी, सृजन की प्रतीक होते हुये भी भारतीय नारी साहित्य सृजन में प्रधान तो क्या यथेष्ठ भाग भी न ले सकी।

अपनी व्यथा कथा को भारतीय महिलाओं को केन्द्र में स्थापित कर महादेवी वर्मा ने अपने अनुभवों का सहारा लेकर उसको जागृत करने का प्रयास किया है। महादेवी भारतीय नारी की सदियों से चली आ रही पुरातन परम्पराओं को तोड़कर आगे आने को प्रेरित करती थीं। आपका मानना था कि "नारियाँ पुरुषों से प्रतिद्वंद्वि के रूप में नहीं अपितु सहयोगी के रूप में प्रतिस्पर्धा करके आगे आयें।" महादेवी वर्मा नारी देह के प्रदर्शन की वस्तु समझे जाने को निकृष्ट मानती थीं। वरिष्ठ और विख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने अपनी नवीन पुस्तक अनभै सांचा में नारी चेतना की भारतीय परम्परा पर विचार करते हुये महादेवी वर्मा के संदर्भ में लिखा है - "इस सदी के पूर्वार्द्ध में, जब भारत में तो क्या पश्चिम में भी साहित्य की स्वतंत्र स्त्री दृष्टि पर कोई ख़ास बहस नहीं हो रही थी तब महादेवी वर्मा ने कहा था पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है परन्तु अधिक सत्य नहीं, विकृति के अधिक निकट पहुँच सकता है परन्तु यथार्थ के अधिक समीप नहीं।"

वास्तव में देखा जाए तो बीसवीं सदी के अन्तिम दशक के केन्द्र में रहे ‘स्त्री विमर्श’ में विवाद का विषय रहा है कि स्त्री विमर्श का सुरक्षित क्षेत्र है या लेखक होने के नाते पुरुष की भागीदारी की संभावना भी वहाँ है। "स्त्री के अनुभव की प्रामाणिकता की बात जहाँ महादेवी वर्मा शृंखला की कड़ियाँ में करती हैं।" वहीं जान स्टुअर्ट मिल पुरुष के स्त्री विषयक ज्ञान को स्त्री अनुभवों के अभाव में अधूरा मानते हैं।" जहाँ एक ओर पंकज विष्ट लेखन के सम्बन्ध में स्त्री-पुरुष भेद को ख़त्म करने वाली बात को पुरुष मानसिकता व वर्चस्व को बनाए रखने की साज़िश से जोड़ते हैं।" वहीं स्टीफन हीथ पुरुष के स्त्रीत्व वाद को अन्ततः एक मर्दाना काम ही मानते हैं।" दूसरी ओर स्त्री का स्त्री के लिए लेखन आत्म कथाओं की आत्म प्रवंचनाओं से जुड़ता है।" स्त्री का स्त्री विषय तक सीमित हो जाना तथा स्त्री लेखन को दोयम दर्जे का लेखन समझे जाने के ख़तरे भी कम नहीं हैं।" राजशेखर भी काव्य मीमांसा में स्त्री और पुरुष के रचना संसार को अलग-अलग खांचों में बाँटने से इंकार करते हैं -

पुरुषवत योषितोऽपि कवी भवेयुः
न स्त्रैणा पौरूष वा विभागमय पेक्ष में।।"

इण्डिया टुडे की साहित्य वार्षिकी 1997 में स्त्री लेखन के अधिकार क्षेत्र के बारे में लम्बी बहस सुरक्षित है। जहाँ अधिकांश स्त्री रचनाकारों ने सिद्धातः स्वीकार किया था कि स्त्री विषय स्थिति पर फोकस्ड रचना को स्वीकारा जायेगा क्योंकि वह स्त्री के सोचने का नहीं स्त्री पर सोचने का विषय भी है।" वहीं कालरिज का मानना है कि ज्ञान पुरुषवाची है और संवेदना स्त्रीवाची। इन दोनों तत्वों के मिश्रण से ही सर्जना के क्षण उत्पन्न होते हैं।" स्त्री की स्थिति पर फोकस्ड समस्त लेखन में स्त्री-दृष्टि महत्वपूर्ण है जो दोनों स्त्री या पुरुष की भी हो सकती है क्योंकि स्त्री दृष्टि सहजात दशा न होकर अर्जित स्थिति है। स्त्रियाँ मानव पुरुष दृष्टि से अपने संसार को देख सकती हैं और पुरुष स्त्री की स्थिति का भोक्ता न भी बन सके उसका अधिवक्ता तो बन ही सकता है।" स्त्री की तरह पढ़ना, स्त्री की तरह अनुभव करना लेखक अपनी बारीक संवेदना शक्ति से संभव बना सकता है जिसे कई बार भोक्ता पकड़ नहीं पाता। चित्रकार अर्पिता सिंह रचना के मूल्यांकन के समय पुरुष और स्त्री रचनाकार की रचना के लिये भिन्न-भिन्न सौन्दर्यबोध की आवश्यकता से इंकार करती हैं।" वास्तव में देखा जाये तो स्त्री साहित्य शक्ति के वरण की स्वतंत्रता और स्वायत्ता का साहित्य है। जहाँ प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना की गयी है। समता, स्वतंत्रता, सौहार्द, वर्गहीन मानवतावाद के सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। "स्त्री साहित्य के मूल में ऐसे जीवन मूल्य हैं जो पूरी मानव जाति के हित में हैं। आज के इस अपसंस्कृति के समय में जब जीवन विरोधी अमानवीय स्पर्धा और हिंसा पंख पसार रही है। स्त्री साहित्य एक उदार भाव से संवेदनशीलता और संतुलन बुद्धि से युक्त होकर सम्बन्धों की उष्मा, साहचर्य, प्रेम और सद्भाव का साहित्य रच रही है। आज के चरित्रहीन समाज, भ्रष्ट राजनीति, लालच का अर्थनीतियों, हिंसा की विकृतियों के विरुद्ध पूरी मानव जाति के पक्ष में खड़ी स्त्री विहंगम दृष्टि से अपने समय और समाज को देख परख रही है। अपने मूल में नारी-विमर्श एक विचार धारा मात्र नहीं रह जाता व एक जीवन दृष्टि और पद्धति का संयोजन बन जाता है। विघटन की प्रक्रिया में मानवीय संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है। मानव मन के जटिल ताने-बाने में सब कुछ सफेद या स्याह नहीं होता। स्त्री साहित्य आज उन्हीं जटिल मानवीय रिश्तों और स्थितियों की अपेक्षा जीवन को समग्रता में देखता-परखता है; इसलिए स्त्री साहित्य में आज के विखण्डित, मनुष्य की सही पहचान होती है। अपने गुणों से, धर्मपालन, सात्विक भावों, सदाशयता और आचरण की शुद्धता में स्त्री पुरुष से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। वह अधिक सहृदय धैर्यवान, धर्मपरायण, त्यागमयी, ममतापूर्ण और नैतिक है जबकि पुरुष स्वार्थी, आत्मलिप्त भोग और लोभ में आसक्त, अधिक ऐन्द्रिय और स्थूल वृत्तियों वाला जड़ प्राणी है जो अपनी सत्ता के आधिपत्य के लिये नित नए षड़यंत्र रचता है। जड़ मूल्यों के कारण पुरुष वर्चस्व स्त्री को आहत करता रहा और अपनी श्रेष्ठता का दंभ भरता रहा।"

महादेवी वर्मा का नारी चिंतन लेखन नारी की वेदना और आत्म पीड़ा की अभिव्यक्ति के साथ नारी स्वातंत्र्य पर भी जोर देता है। महादेवी जब स्त्री स्वतंत्रता की बात करती हैं तब सवाल यह उठता है कि वे कैसी स्वतंत्रता चाहती हैं स्त्री की? स्त्री की स्वतंत्रता की चाह परिवार को तोड़ने की चाह नहीं हो सकती, उसे जोड़ने की होनी चाहिये। जोड़ने के इस कार्य में पुरुष की भागीदारी उतनी ही है जितनी स्त्री की है। संवैधानिक रूप में स्त्री बिल्कुल पुरुष के बराबर है। लेकिन वास्तविक जीवन में? प्रश्न चिन्ह् लगा हुआ है। स्त्री-मुक्ति पर बात करने का, स्त्री की मुक्ति-कामना करने का मतलब परिवार से अलग होना या पति से अलग होना नहीं है। विवाह-संस्था को बनाये रखने में स्त्री-पुरुष दोनों का समान दायित्व है। माता-पिता के रूप में, पति-पत्नी के रूप में। जीवन की सार्थकता तभी सम्भव है, जहाँ स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ मिलकर सहयोग दें, परस्पर आत्म सम्मान के साथ जिएँ। वर्तमान परिवेश में ऐसा सहयोग कहीं-कहीं धूमिल सा हो गया है।" इस तथ्य को एक उदाहरण द्वारा महादेवी वर्मा लिखती हैं कि बचपन से ही भिक्षुणी बनने की कामना की थी, परन्तु जब सिलोन से आए प्रख्यात महास्थिवर ने काष्ठ पट आँखों के सामने रखकर उनसे बात की तो उनकी प्रतिक्रिया थी "यह सब मुझे विचित्र तो लगा ही, क्रोध भी आया। जो गुरू अपने शिष्य को सीधे देख सकने की भी शक्ति नहीं रखता उसका शिष्यत्व स्वीकार करना हास्यास्पद ही नहीं, अपमानजनक भी है। मेरा मन विद्रोह कर उठा और मैं तुरन्त उठकर चली आयी।"

महादेवी वर्मा के स्त्री चिंतन में वे सब आशंकायें बताई गई हैं जो भूमण्डलीकरण के इस दौर में घट रही है। स्त्री-श्रम को विश्व-स्तर पर लगातार मामूली सिद्ध किया जा रहा है। हायर एण्ड फायर वाला सिद्धान्त स्त्री-श्रमिकों पर सबसे पहले लागू किया जा रहा है। इस तरह के अस्थायी अर्थोपार्जन से उसकी जीवन-स्थितियाँ भी बद से बदतर हुई हैं। महादेवी वर्मा जी स्त्री मुक्ति को अर्थ से जोड़ते हुये कहती हैं कि "यदि उन्हें अर्थ-सम्बन्धी वे सुविधाएँ प्राप्त हो सकें जो पुरुषों को मिलती आ रही हैं तो न उनका जीवन उनके निष्ठुर कुटुम्बियों के लिये भार बन सकेगा और न वे गलित अंग के समान समाज से निकालकर फेंकी जा सकेंगी, प्रत्युत वे अपने शून्य क्षणों को देश के सामाजिक तथा राजनीतिक उत्कर्ष के प्रयत्नों से भरकर सुखी रह सकेंगी।" स्त्री के अर्थ-स्वातन्त्र्य का प्रश्न नामक निबन्ध में महादेवी का कहना है कि "आधुनिक परिस्थितियों में स्त्री की जीवन धारा ने जिस दिशा को अपना लक्ष्य बनाया है उनमें पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता ही सबसे गहरे रंगों में चित्रित है। स्त्री ने इतने युगों के अनुभवों से जान लिया है कि उसे सामाजिक प्रामाणिक प्राणी बने रहने के लिये केवल दान की ही आवश्यकता नहीं है, आदान की भी है, जिसके बिना उसका जीवन, जीवन नहीं कहा जा सकता। वह आत्म-निवेदित वीतराग तपस्विनी ही नहीं, अनुरागमयी पत्नी और त्यागमयी माता के रूप में मानवी भी है और रहेगी। ऐसी स्थिति में उसे वे सभी सुविधाएँ, वे सभी मधुर-कटु भावनाएँ चाहिए जो जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकती हैं।"

नारी के सामाजिक अधिकारों की ओर पैरवी करते हुए महादेवी का मानना है कि जो बंधन पुरुषों की स्वेच्छा चारिता के लिए इतने शिथिल होते हैं कि उन्हें बंधन का अनुभव ही नहीं होता वे ही बंधन स्त्रियों को परावलम्बिनी दासता में इस प्रकार कस देते हैं कि उनकी सारी जीवनी-शक्ति शुष्क और जीवन नीरस हो जाता है। समस्त सामाजिक नियम मनुष्य की नैतिक उन्नति तथा उसके सर्वतोन्मुखी विकास के लिए आविष्कृत किये गये हैं। जब वे ही मनुष्य के विकास में बाधा डालने लगते हैं तब उनकी उपयोगिता ही नहीं रह जाती। ...... हमारी अनेक रूढ़ियाँ सामाजिक और वैयक्तिक विकास में सहायक न बनकर उनके मार्ग में नित्य नवीन बाधाएँ खड़ी करती रहती हैं। अनेक व्यवस्थाएँ जिन्हें हमने आपत्ति-धर्म मात्र समझकर स्वीकार कर लिया था, अब भी हमारे जीवन को छाया में अंकुरित और धूप से दूर रखे जाने वाले पौधे के समान शीर्ण बनाकर विकसित ही नहीं होने देती। अतः उसी शीत और विकास-शून्य छाया में पलकर हमारी सन्तान भी निस्तेज तथा उत्साहहीन बनती जा रही हैं। इस दशा में हमारा मिथ्या परम्परा की दुहाई देते रहना केवल व्यक्तियों के लिये नहीं वरन् समाज और राष्ट्र के लिये भी घातक सिद्ध होगा।" नारी अधिकारों पर अपनी बात को स्पष्ट करते हुए महादेवी वर्मा का कहना है कि "हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय; न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नही बन सकेंगी। हमारी जागृत और साधन सम्पन्न बहनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी इसमें सन्देह नहीं।"

नारी के आन्तरिक एवं बाह्य शक्ति पर बल देते हुए महादेवी इस तथ्य को स्वीकार करती हैं कि अब नारी ने सभी क्षेत्रों में अपना सम्मानजनक स्थान बना लिया है परन्तु अपनी कुछ स्वभावगत कमज़ोरियों के कारण वे पुरुषों से पीछे रह जाती हैं ....... "नारी में परिस्थितियों के अनुसार अपने बाह्य जीवन को ढाल लेने की जितनी सहज प्रवृत्ति है, अपने स्वभावगत गुण न छोड़ने की आन्तरिक प्रेरणा उससे कम नहीं - इसी से भारतीय नारी, भारतीय पुरुष से अधिक सतर्कता के साथ अपनी विशेषताओं की रक्षा कर सकी है, पुरुष के समान अपनी व्यथा भूलने के लिए वह कादम्बिनी नहीं माँगती, उल्लास के स्पन्दन के लिए लालसा का ताण्डव नहीं चाहती क्योंकि दुःख को वह जीवन की शक्ति-परीक्षा के रूप में ग्रहण कर सकती है और सुख को कर्तव्य में प्राप्त कर लेने की क्षमता रखती है। कोई ऐसा त्याग, कोई ऐसा बलिदान और कोई ऐसी साधना नहीं जिसे वह अपने साध्य तक पहुँचने के लिए सहज भाव से नहीं स्वीकार करती रही। हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बन्दिनी स्वच्छन्द वातावरण में बल-प्राप्त पुरुष से शक्ति में कम नहीं।"

नारी को घर से बाहर आकर जगत के मर्म को समझने के प्रति महादेवी वर्मा का स्पष्ट मत है कि "जब तक हम अपने यहाँ गृहणियों को बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता न देंगे तब तक हमारी शिक्षा में व्याप्त विष बढ़ता ही जायेगा। केवल गार्हस्थ-शास्त्र या सन्तान-पालन विषयक पुस्तकें पढ़कर कोई किशोरी गृह से प्रेम करना नहीं सीख जाती, इस संस्कार को दृढ़ करने के लिए ऐसी स्त्रियों के सजीव उदाहरण की आवश्यकता है, जो आकाश के मुक्त वातावरण में स्वच्छन्द भाव से अधिक ऊँचाई तक उड़ने की शक्ति रखकर भी बसेरे को प्यार करने वाले पक्षी के समान कार्य क्षेत्र में स्वतन्त्र परन्तु घर के आकर्षण से बँधी हो।"

पुरुष प्रधान समाज की जड़ मानसिकता पर प्रहार करते हुए महादेवी का मानना है कि "प्रायः पुरुष यह कहते सुने जाते हैं कि बहुत पढ़ी-लिखी या कानून जानने वाली स्त्री से विवाह करते उन्हें भय लगता है। जब एक निरक्षर स्त्री बड़े से बड़े विद्वान से, कानून का एक शब्द न जानने वाली वकील या बैरिस्टर से और किसी रोग का नाम भी न बता सकने वाली बड़े से बड़े डाक्टर से विवाह करते भयभीत नहीं होती तो पुरुष ही अपने समान बुद्धिमान तथा विद्वान स्त्री से विवाह करने में क्यों भयभीत होता है। इस प्रश्न का उत्तर पुरुष के उस स्वार्थ में मिलेगा जो स्त्री से अन्ध भक्ति तथा मूक अनुसरण चाहता है। विद्या-बुद्धि में जो उसके समान होगी, वह अपने अधिकार के विषय में किसी दिन भी प्रश्न कर ही सकती है, सन्तोषजनक उत्तर न पाने पर विद्रोह भी कर सकती है। अतः पुरुष क्यों ऐसी स्त्री को संगिनी बनाकर अपने साम्राज्य की शांति भंग करे। जब कभी किसी कारण से वह ऐसी जीवन-संगिनी चुन भी लेता है तो सब प्रकार के कोमल कठोर साधनों से उसे अपनी छाया मात्र बनाकर रखना चाहता है, जो प्रायः सम्भव नहीं होता।"

स्त्री स्वतंत्रता की वकालत करते हुए महादेवी वर्मा का स्पष्ट मानना है कि "स्त्री को किसी भी क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता देने के लिये पुरुष के विशेष त्याग की आवश्यकता होगी। पुरुष अब तक जिस वातावरण में साँस लेता रहा है वह स्त्री को ही दो रूपों में बढ़ने दे सकता है, माता और पत्नी। पत्नी जब घर से बाहर भी अपना कार्य-क्षेत्र रक्खेगी तो पुरुष को उसे और प्रकार की स्वतंत्रता देनी होगी, जिसकी घर में आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे आने-जाने की, अन्य व्यक्तियों से मिलने-जुलने की तथा उसी क्षेत्र में कार्य करने वालों से सहयोग लेने-देने की आवश्यकताएँ प्रायः पड़ती रहेंगी। ऐसी दशा में पुरुष यदि उदार न हुआ और प्रत्येक कार्य को उसने संकीर्ण और संदिग्ध दृष्टि से देखा तो जीवन असहाय हो उठेगा। वास्तव में स्त्री की स्थिति के विषय में कुछ भी निश्चित होने के पहले पुरुष को अपनी स्थिति निश्चित कर लेनी होगी। समय अपनी परिवर्तनशील गति में उसके देवत्व और स्त्री के दासत्व को बहा ही ले गया है, अब या तो दोनों को विकासशील मनुष्य बनना होगा या केवल यंत्र।"

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि महादेवी जी की रचनाओं में स्त्री जीवन पर नारी लेखिका की सहानुभूति मात्र ही नहीं है वरन एक गम्भीर समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी है। आपने लक्ष्य किया है कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना नारी स्वतंत्र नहीं हो सकती। अपनी वर्तमान स्थिति के विरुद्ध जब तक वह स्वयं विद्रोही तेवर के साथ खड़ी नहीं होती तब तक उसका उद्धार सम्भव नहीं है इसके पीछे महादेवी जी का मानना हैं कि भारत में ही नहीं सम्पूर्ण दुनिया में नारी आदिम काल से शोषित और उत्पीड़ित रही है। आपने सीता की अग्नि-परीक्षा के लिए राम को क्षमा नहीं किया। महादेवी जी ने नारी की वेदना उसकी आकुल छटपटाहट, उसकी पराधीनता को शब्दबद्ध करते हुये उसकी गरिमा को रेखांकित किया है। महादेवी जी ने न केवल नारी विद्रोह का समर्थन किया बल्कि स्वयं भी बाल-विवाह के बंधन को उस ज़माने में तोड़ा था जब किसी भी लड़की का ऐसा निर्णय लेना एक अद्भुत साहस की बात थी। महादेवी जी को मात्र ‘नीर-भरी दुःख की बदली’ की लेखिका नहीं मानना चाहिए। शृंखला की कड़ियाँ हिन्दी स्त्री वादी लेखन का अप्रतिम उदाहरण है क्योंकि शृंखला की प्रत्येक कड़ियाँ स्त्री गुलामी की कड़ियाँ हैं। प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने शृंखला की कड़ियाँ का महत्व बताते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि नारीवादी और अन्य लेखिकाएँ भी शृंखला की कड़ियाँ के महत्व से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। वे सिमोन द बुआ की किताब पढ़ती हैं लेकिन महादेवी वर्मा की शृंखला की कड़ियाँ नहीं क्योंकि वह हिन्दी में लिखी गई हैं। फ्रेन्च या अंग्रेज़ी में नहीं।"


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