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02.23.2008
 
श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी
वीरेन्द्र जैन

इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी व्यंग्य के भीष्मपितामह हरिशंकर परसाई ही माने जाते हैं किंतु गत शताब्दी के सातवें दशक में अपने व्यंग्य उपन्यास रागदरबारी के प्रकाशन के बाद श्रीलाल शुक्लजी ने अपनी कुर्सी परसाई जी के बगल में ही डलवा ली थी। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे कि मतभेद निराकरण कार्यक्रम में दो उपप्रधानमंत्री या दो उपमुख्यमंत्री बना दिये जाते हैं।

रागदरबारी आजादी के बाद स्थापित हुई व्यवस्था में ग्राम्य जीवन की समीक्षा है। १९४७ के बाद उत्तर भारत के गाँवों में जन्मी विसंगतियों को एक उपन्यास में समेट कर रख देना व पूरे उपन्यास में व्यंग्य की धार को सतत बनाये रखना बहुत कौतुकपूर्ण लगता है। एक दृश्य देखिये- ऐसे भुखमरे वातावरण में अखाड़े क्या खा कर या खिला कर चलते? कुछ वर्ष पहले गव के लड़के कसरत और कुश्ती से चूर-चूर होकर लौटते तो कमसे कम उन्हें भिगोये हुये चने और मट्ठे का सहारा था। अब वह सहारा भी टूटने लगा था। यह और इस प्रकार के बई तथ्य मिलकर कुछ ऐसा वातावरण पैदा कर रहे थे कि गाँव में निकम्मा बन जाने के सिवाय और दूसरा कार्यक्रम ही नहीं मिलता था। वे फटे पुराने पर रंगीन पतलूनों पायजामों के सहारे अपनी दुबली पतली टाँगों को ढक कर और सीने पर गोश्त हो या न हो, सीने के अंदर सायराबानू के साथ सोने का अरमान भर कर, गली कूचों में पान की पीक फैलाते हुये निरुद्देश्य घूमा करते थे। उनमें से बहुत से कभी कभी खेतों, कारखानों और जेलों के चक्कर भी लगा आते थे। जो वहाँ जाते हुये हिचकते थे, वे स्थानीय कालिजों में बांगडूपन की शिक्षा ग्रहण करने के लिए चले आते थे। ये कालेज प्रायः किसी स्थानीय जननायक की प्रेरणा से शिक्षा प्रचार के लिए, और वास्तव में उसके लिए विधानसभा या लोकसभा के चुनावों की जमीन तैयार करने के उद्देश्य से, खोले जाते थे, और उनका मुख्य कार्य कुछ मास्टरों और सरकारी अनुदानों का शोषण करना था। ये कालिज सिर्फ जमाने के फैशन के हिसाब से बिना आगा पीछा सोचे हुये चलाये जा रहे थे और यह निश्चय था कि वहॉ पढ़ने वाले अपनी रियाया वाली हैसियत छोड़ कर कभी ऊपर जाने की कोशिश नहीं करेंगे और ऊँची नौकरियाँ और व्यवसाय जिनके हाथ में है, उनके एकाधिकार को इन कालिजों से कोई खतरा पैदा नहीं होगा।

रागदरबारी की लोकप्रियता और उसका गत चालीस साल से निरंतर बने रहना इस बात का प्रमाण है कि अच्छी पुस्तकों को किसी आलोचक या पुरस्कार दिलाने वाले दलाल की आवश्यकता नहीं होती। रागदरबारी के लेखक को जो पुरस्कार मिले हैं, वे दरअसल पुरस्कार देने वालों को उन्हें देने पड़े हैं वरना उनके पुरस्कारों और उनकी चयन समितियों की इज्जत मिट्ठी में मिल जाती जिससे मिट्ठी की इज्जत के खराब होने का खतरा पैदा हो जाता।

आम तौर पर अफसरों को लेखक की तरह प्रतिष्ठित होने में सामान्य लेखक से अधिक श्रम लगता है क्योंकि आजकल टुच्चे किस्म के लालची, चारणवृत्ति के चापलूस आलोचक अफसरों की रचनाओं का ऐसा महिमामंडन करने लगे हैं कि आम पाठकों को उबकाई आने लगती है इसलिए आम पाठक अफसरों की रचनाओं को प्रथम दृष्ट्या गम्भीरता से नहीं लेते। बहुत सारे अफसरों को तो अच्छी रचनाओं के बाबजूद अपनी पहचान बनाने में इसी कारणवश कठिनाई आती है। पर श्रीलाल जी की रागदरबारी को जिसने भी पढ़ा वह उसके कथ्य और प्रस्तुतीकरण को दूसरों के साथ बाँटने को उतावला हो गया। मैंने स्वयं न जाने कितनी बार रागदरबारीकी प्रतियाँ खरीद व  दूसरों को भेंट में देकर उससे अधिक का धन्यवाद बटोरा है जितना उसी मूल्य की दूसरी कोई वस्तु उपहार में देने पर नहीं मिलता। रागदरबारीकी मेरी कई प्रतियाँ चुरायी गयीं और पढ़ने के लिए दी गयी कई प्रतियाँ वापिस नहीं लौटायी गयीं। गाँव में रहने वाले मित्रों में से प्रत्येक ने अपने गाँव में कोई न कोई वैद्यजी रूप्पन रंगनाथ बेला और लंगड़ पहचान लिये, जो देश के लाखों शिवपालगंजों में अब भी लगातार विचरण कर रहे हैं।

राग दरबारी का लेखक पूरी तटस्थता के साथ बिना किसी राग के परिवेश का अवलोकन करता है। वह परंपरागत दोषों को भी अपना होने के नाम से सराहता नहीं है अपितु उनकी भी खिल्ली उड़ाता है। उदाहरणार्थ- औरतें चिचिया रहीं थीं जिसे अगर कोई आकाशवाणी वाला सुन लेता तो कहता कि लोकगीत गाया जा रहा है।

मेरा एक मित्र रागदरबारीको इस मायने में क्रांतिकारी उपन्यास मानता है क्योंकि वह पूरी व्यवस्था के प्रति गहरी घृणा बोता है। पूरे उपन्यास में कहीं भी आशा की कोई किरण  नजर नहीं आती। लेखक को गाँव, व्यवस्था, लोगों के चरित्रों आदि किसी में भी भरोसा नहीं रहा है। गाँवों में  पाखंड ढोंग विसंगति कामचोरी, काइयाँपन आलस्य हरामखोरी गंदगी के सिवा कुछ भी नहीं है। वह जिसकी भी पूंछ उठाता है वही मादा निकलता है। रागदरबारी पढ़ने के बाद गाँव और देश का गुण गाने वाले गीत तक हास्यास्पद लगने लगते हैं। अहा ग्राम्यजीवन भी क्या है जैसी कविताएँ बचकानी लगने लगती हैं। पाठक अपनी और समाज की विवशता पर हँसता सा लगता है पर यही निरीहता उसमें व्यवस्था बदलाव की एक बेचैनी पैदा करती है। रागदरबारी पढ़ने के बाद कोई ये कहता नहीं मिला कि इसमें गाँव का सही चित्रण नहीं है या जो भी कुछ हो रहा है ठीक हो रहा है।

गाँवों पर थेापी गयी नैतिकता की असलियत का जो पर्दा श्रीलालशुक्ल ने उठाया है उसके पीछे तो सभी ने झाँका हुआ था पर सच सच कहने का साहस केवल उन्होंने ही उठाया हुआ है। महिलाओं के बराबरी पर आने के प्रयास में पहला हमला उसके चरित्र पर ही किया जाता है और अपनी लोलुपता में सब नैतिकतावादी उस पर भरोसा करके मानस मैथुन करते रहते हैं।

“- हैऽ! दिल्लगी मत करो! गम्भीर बात को हँसी में मत उड़ाओं। हम रसिकों को रेत में न खिचेड़ो। चोला छोड़ेगी तो अपने पति के संग ही। उससे पहले नहीं मरेगी। औरत बड़ी सख्तजान होती है। सती भी कहाँ होना चाहती है, वो तो धरम करम का कोड़ा पड़ता है, नहीं तो.........। वैद्यजी रुआँसे हो कर बोले, अजी अब कहाँ धरम करम, सती धर्म की तो ऐसी तैसी हो गयी। पति मरते ही रोजगार को भागती है। कुसहर ने कहा, चुप रहो वैद्यजी। हाँ, खुद ही तो कहते हो कि रांडें रोती नहीं और तुम खुद पुरानी रांडों की तरह रो रहे हो। बुलाओ अपने शनीचर फटीचर को, बड़ा गंजहा बना फिरता था, साले की कमर पर लात मार कर बेला शिवपालगंज की प्रधान बन गयी। सपने में भी ऐसा सोचा था? यह बुरा समय देखने को ही तुम उम्र का सैकड़ा पार कर गये।

प्रभुमाया! वैद्यजी कराहे। लडकी कभी गली में नहीं निकली थी। कुसहर हँसा, वैद्यजी हाँ, रूप्पन और रंगनाथ छतो- छतों आ कर ही रस चूस लिए।

-वैद्यजी सच्ची बात बताऊँ? नंगा आदमी नंगई पर खुल्लम खुल्ला आ गया है, बेला को खूँटे से छुड़ा कर क्या ले गया, पूरा सत निचोड़ कर पी रहा है। आगे बढ़ कर बोला, बेला प्रधानी हथिया ले, सम्भल मैं लूँगा। जैसे तुझे सम्भाल लिया।

 

ग्राम्य जीवन पर जो भी उपन्यास और कहानियाँ लिखी गयी हैं उनमें रागदरबारी सर्वाधिक यथार्थवादी उपन्यास है और उसे उसी तरह का महत्व हासिल है जो कि गोदान और मैला आंचल को है पर इसमें व्यंग्य इसके गेटअप को ज्यादा चमक देता है और ज्यादा पठनीय बनाता है (भले ही उसके आकर्षण में उसके महत्वपूर्ण कथ्य के उपेक्षित रह जाने का खतरा भी रहता है।)

उनके व्यंग्य की तुलना केवल पाकिस्तान के उर्दू लेखक मुश्ताक अहमद यूसुफी से ही हो सकती है पर यूसुफी के पास भी कथानक की कमी होती है। शुक्लजी की विशेषता यह है कि रागदरबारी अपने आप में एक स्वतंत्र उपन्यास है जो व्यंग्य में ऐसे डूबा है जैसे कि चाशनी में जलेबी डूबी रहती है तथा अपनी मिठास के बाबजूद एक अलग शक्ल और रंगरूप से अपनी पहचान रखती है। यदि दोनों की तुलना की जाये तो हम कह सकते हैं कि श्रीलालजी जलेबी बनाते हैं जिसके लिए चाशनी की जरूरत पड़ती है जबकि यूसुफी जी के पास चाशनी का भंडार है जिसे खपाने के लिए वे उसी मात्रा में मिष्ठान्न बना रहे होते हैं।


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