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| 03.07.2009 |
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शहर सिखाने पर उतारू है वीरेन्द्र जैन |
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मैं गाँव
छोड़कर शहर में आ गया। इस पलायन ने मेरे व्यक्तित्व में बहुआयामी परिवर्तन
किये। अपने गाँव कस्बे में जहाँ मैं भैया या भाई साहब था वहीं शहर
आकर
“अंकल”
हो
गया। बस का मुझसे भी बड़ी उम्र का कन्डक्टर मुझे
“अंकल”
कहकर बस में ठूँस रहा था।
“अंकल
आगे बढ़ो,
देखो कितनी जगह पड़ी है”
मुझे लगा कि मैं अंधा हो गया हूँ। जहाँ साँस लेने
को भी जगह नहीं थी वहाँ उसे जगह दिखायी दे रही थी और मुझे नहीं
दिखाई दे रही थी। घर .......
नहीं फ्लैट में लौटकर मैंने आइना देखा और अपनी नज़र में कहीं भी अपने को न
बूढ़ा पाया और न अंधा,
तो
कन्डक्टर की अकल पर तरस आया।
अखबार
उठाकर देखा तो पूरे अखबार में दुपहिया वाहनों
के विज्ञापन भरे हुए थे। जीरो प्रतिशत फाइनेंस पर कुल पाँच सौ रूपया
देकर भी आप तीस चालीस हज़ार का वाहन उठा सकते थे। मैने वाहन खरीदने या कहिये
किश्त पर लेने का फैसला कर लिया। एक बार शोरूम में गया तो मेरी आवभगत
हुयी,
ठंडा पानी पिलाया गया,
नाम पता और फोन नम्बर पूछा गया। फिर हर रोज़ मेरे फोन की घंटियाँ बजती रहीं,
जब
तक कि मैं एक अदद स्कूटर का कर्जदार नहीं बन गया। अब पैट्रोल भरवाता हूँ तो
किश्त की चिंता सताती है और
किश्त चुकाता हूँ तो सोचता ह कि पैट्रोल कैसे भरवाऊँगा।
स्कूटर
खरीदने से एक लाभ तो यह हुआ है कि अब मैं नगर भर में लगे बोर्ड,
होर्डिंग्स और दीवालों पर लिखे विज्ञापनों का पाठक हो गया हूँ। मेरे ज्ञान
में वृद्धि होती जा रही है।
पता नहीं शहर वालों को कैसे पता चल गया है कि मैं घोर अज्ञानी हूँ और सारे
शहर वाले मुझे कुछ न कुछ
सिखाने पर उतारू नज़र आते हैं।
मेरे बगल
के फ्लैट में जो सज्जन रहते है उन्होंने गत एक वर्ष में एक बार भी मुझसे
बात नहीं की पर उनके दरवाजे पर एक बोर्ड लगा है जिसमें लिखा है कि वे
“हाउ
टू विन फ्रैन्डस या दोस्त कैसे बनायें”
विषय पर क्लासेज लेते है तथा दोस्त बनाने की तरकीब सिखाते हैं। बिल्डिग में
उनका कोई दोस्त नहीं पर दूसरों को दोस्त
बनाने की शिक्षा ज़रूर देते है।
शहर का हर
घर किसी न किसी तरह की दुकान में बदल गया है जहाँ हर कोई किसी न किसी को
कुछ न कुछ सिखाने को उतावला
बैठा है। फ्लैट से निकलता हूँ तो दूसरी मंज़िल पर एक सज्जन कत्थक सिखाते है।
उस मंज़िल से गुजरते ही मेरे
पैरों की लय बदल जाती है। और मैं बड़ी मुश्किल से अपने हाथों को नचाने से
रोकता हूँ। इसी बिल्डिंग की किसी मंज़िल पर ब्यूटिशियन का कोर्स
कराया जा रहा है तो कहीं कुकिंग के क्लासेज लगते हैं। कहीं बैकिंग
सिखायी जाती है तो कहीं पेन्टिंग सिखाई जा रही है। कोई आइसक्रीम बनाना सिखा
रहा है तो कहीं निटिंग के फन्दे डालना सिखाये जा रहें है।
बाहर
निकलता हूँ तो
“स्पोकिन
इंगलिश”
सिखाने का टाइम और स्थान लिखा हुआ है। मुझे अपने अंग्रेजी के अज्ञान पर तरस
आता है और सोचता ह कि ये क्लास ज्वाईन कर लूँ तो जल्दी ही गिटर-पिटर करके
अपना काम बना लिया करूँगा। दफ्तरों में अंग्रेजी बोलने से जल्दी काम हो
जाता है। कहीं रशियन सीखने का बोर्ड लगा है तो कहीं जर्मन
सीखने का। कोई तामिल सिखाना चाह रहा है तो कोई उर्दू सिखाने को
उतावला है।
योगी योग
सिखाने के लिए तैयार बैठे हैं तो कुछ लोग ध्यान के लिए परचे बाँट रहे है।
कई संतो की दुकानें तो आर्ट ऑफ़ लिविंग सिखा कर चल रही हैं। कहीं जादू
सिखाया जा रहा है तो कही भाषण देना सिखाया जा रहा है। कहीं
ड्रायविंग सिखायी जा
रही है तो कहीं तैरना सिखाया जा रहा है। कम्प्यूटर सिखाने वाले तो लोगों को
पटरियों से खींच ले जाते हैं
कि कम्प्यूटर सीख लो।
मैंने एक
मित्र से पूछा कि इस नगर में वेश्याएं कहाँ रहती हैं। उसने मुझे कुछ ऐसी
नज़र से देखा जैसे दुनिया के सबसे बड़े लफंगे को सबसे बड़ी घृणा के साथ देख
रहा हो। मेरी बात का उत्तर देने की जगह
उसने मुझसे कहा कि मैं तुम्हें ऐसा नहीं समझता था।
“कैसा?”
मैने
प्रति प्रश्न किया।
“यही
कि तुम सरेआम वेश्याओं का पता पूछोगें।”
“पर
इसमें बुराई क्या हैं?”
“तुम्हैं
वेश्याओं का पता पूछने में बुराई नजर नहीं आती?”
“पता
इसलिए भी तो पूछा जा सकता है कि मैं उस गली
से न गुज़रूँ।”
“तो
सुन लो अब इस शहर में वेश्याओं का कोई मुहल्ला नहीं है,
राजाओं नबाबों के ज़माने में हुआ करता था।”
“तभी
तो मैं कह ................................
“क्या?”
“यही
कि इस नगर में लोगों को तमीज़ सिखाने की कोई
जगह शेष नहीं रह गयी है। अंग्रेजी,
जर्मन,
कुकिंग,
बेकिंग,
जूडो,
कराटे,
और
स्लिम होना तो सिखाया जा रहा है पर
यह सिखाने वाला कोई नहीं है कि पान और गुटके की पीक को कहाँ पर
थूकना चाहिये। कार में बैठे बैठे और स्कूटर पर चलते-चलते लोग पीकों को ऐसे
हवा में उड़ाते रहते है जैसे कभी फिल्मों की हीरोइनें हवा में मलमल का लाल
दुपट्टा उड़ाया करती थीं। बहुमंज़िली इमारतें तो बन गयी है पर बालकनी का
उपयोग नीचे कचरा फेंकने के लिए हो रहा है। कहीं कोई इस बात की क्लास नहीं
कि कचरा कहाँ पर और कैसे फेंकना चाहिये। ट्रेन और बस में प्रवेश करने का
ढंग सिखाने वाला कोई नहीं है। स्कूटर कहाँ पर कैसे पार्क करें यह केवल
स्कूटर स्टैण्ड वाला जानता है। स्कूटर का ड्रायविंग लाइसेन्स रखने वाला
पार्किंग की तमीज़ नहीं रखता। आर्ट ऑफ लिविंग सिखानेवाले नेता और अफसरों को
यह नहीं सिखा पाते कि उनके कार्यालय में आये आम नागरिक से कैसे व्यवहार
किया जाना चाहिए। पहले के लोग तमीज़ सिखाने के लिए अपने बच्चों को वेश्याओें
के पास भेजा करते थे। अब के लोग तमीज़ सीखने की ज़रूरत ही भूल बैठे हैं।”
मेरी बात
पूरी होने से पहले ही मित्र जा चुका था। पता नहीं मेरे भाषण से ऊब कर या
तमीज़ सीखने की जल्दी में। |
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