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04.30.2008
 
मख़्दूम मोइउद्दीन जन्म शताब्दी
वीरेन्द्र जैन

मुक्तिबोध किसी भी साहित्यकार से अपने पहले परिचय में जो सवाल आवश्यक रूप से करते थे वह होता था कि पार्टनर आपकी पॅालटिक्स क्या है?”

हमारे साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में जो बाद में नई पीढ़ी के सामने अंग्रेज़ भगाओ आन्दोलन कह कर विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है, हमारा स्वतंत्रता संग्राम था। इस संग्राम के किसी भी साहित्यकार को अपनी राजनीति छुपाने में शर्म नहीं आती थी। मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारीसिंह दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, मनुलाल शील नागार्जुन, फ़ैज़, फ़िराक कैफ़ीआज़मी, आदि हिन्दी उर्दू के सैकड़ों ऐसे कवि शायर हुये हैं जो राजनीति और साहित्य को अलग अलग करने की आवश्यकता महसूस नहीं करते थे और दोनों को ही मानवता के लिए किये गये काम मानते थे। उनके साहित्य में उनकी राजनीति बोलती थी और उनकी राजनीति में साहित्य का रंग नजर आता था। वे इतने ईमानदार लोग थे कि अपनी राजनीति को शर्म की चीज़ नहीं समझते थे इसलिए अपनी राजनीति को बनियान की जेब में रखने की जगह सामने की जेब में रखते थे। उपरोक्त कवि साहित्यकारों में एक बड़ा शायर ऐसा भी हुआ है जो अपनी राजनीति को मैडल की तरह गले में लटका कर चलता था और वह शायर था मख़्दूम मोइउद्दीन।

  मख़्दूम  का जन्म आंध्रप्रदेश के मेडक जिले के ग्राम अन्दोले में  ४ फरबरी १९०८ में हुआ। मेडक जिला उस समय की हैदराबाद रियासत में आता था। मख़्दूम ने उस्मानिया यूनीवर्सिटी से उर्दूसाहित्य में एम. ए. किया और हैदराबाद के सिटी कालेज में ही पढ़ाने लगे। अपने अध्यापन कर्म के साथ साथ ही उनका साहित्यिक और राजनीतिक काम भी समानान्तर चलता रहा। वे अपने सभी कामों में पूरी तरह डूबे रहे। उन्होंने ४६-४७ में चले निज़ाम के ख़िलाफ़ चले ख़िलाफ़त आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी की तो तेलंगाना के सशस्त्र किसान आंदोलन में कैफ़ी आज़मी के साथ बन्दूक लेकर भी लड़े। वे उस समय की कम्युनिस्ट पार्टी सी. पी. आई. के सक्रिय सदस्य थे तथा बाद में विधायक भी चुने गये और आंध्रप्रदेश विधान सभा में विपक्ष के नेता भी रहे। उन्होंने जेल यात्राएँ भी कीं।

मख़्दूम मोइउद्दीन को शायरे इंकिलाब की उपाधि से नवाजा गया था पर उनकी शायरी में वे सारे कोमल भाव अपनी उस भाषा और नाजुकी के साथ मिलते हैं जिससे परंपरागत उर्दू ग़ज़ल पहचानी जाती है। मुझे यह जानकर बड़ा सुखद  आश्चर्य हुआ था जब मुझे पहली बार पता चला था कि उनकी ग़ज़लों को हिन्दुस्तानी फिल्म वालों ने भी बहुत आदर और प्यार के साथ अपनाया है। फिल्म बाज़ार का वह गीत- फिर उठी रात बात फूलों की  हो या दो बदन प्यार की आग में जल गये इस चमेली के मंडवे तले हो वे उतने ही लोकप्रिय हुये हैं और लोगों की जुबान पर चढ़े रहे हैं। वेणु गोपाल कहते हैं- कि प्रेम और युद्ध की कविता अलग अलग नहीं होती, आखिर हम युद्ध भी तो प्रेम के लिए करते हैं और बिना प्रेम के युद्ध भी नहीं कर सकते।

मख़्दूम की शायरी की दो पुस्तकें प्रकाशित हुयी हैं जिनके नाम सुर्ख सवेरा और गुलो तर हैं तथा गद्य में प्रकाशित एक पुस्तक का नाम बिसाते रक्स है। उनके बारे में शकीला बानू भोपाली और शाहिद सिद्दीकी ने लिखा है कि उनके अन्दर बातचीत करते करते  बीच में ही शायरी के अंकुर पैदा होने लगते थे। उनकी प्रसिद्ध ग़ज़ल फिर छिड़ी रात बात फूलों की का आइडिया सन्‌ १९६३ में इन्हीं लोगों के साथ बातचीत करते करते आया था। एम. एफ. हुसैन के साथ ओरिएण्ट होटल में चाय के प्यालों पर प्याले पीते हुये उन्होंने सालों बिताये थे आज भी हुसैन उन क्षणों को बड़ी शिद्दत के साथ याद करते हैं। सन्‌ १९४० और १९५० में उन्होंने हुसैन के साथ ही मास्को और पीकिंग की यात्राएँ भी की थीं। हुसैन ने उनकी प्रसिद्ध नज़्म-

हयात ले के चलो

कायनात ले के चलो

चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो

पर एक खूबसूरत पेन्टिंग भी बनायी है।

 

   उनकी एक प्रसिद्ध ग़ज़ल है.-

इश्क के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे

दिल के अंगारे को धड़काओ कि कुछ रात कटे

हिज्र में मिलने शबे-माह के ग़म आये हैं

चारासाजों को बुलवाओ कि कुछ रात कटे

कोई जलता ही नहीं कोई पिघलता ही नहीं

मोम बन जाओ पिघल जाओ तो कुछ रात कटे

चश्म-ओ-रुख़्सा के अजगार को जारी रक्खो

प्यार के नग़मे को दुहराओं कि कुछ रात कटे

आज हो जाने दो हर एक को बद्‌मस्तओ-ख़राब

आज इक इक को पिलाओ कि कुछ रात कटे

कोह-ए-ग़म और गराँ और गराँ और गराँ

ग़मजदो तेश को चमकाओ कि कुछ रात कटे

 


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