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01.23.2008
दुष्यंत की पुण्यतिथि-३१ दिसम्बर के अवसर पर
हिन्दी-ग़ज़लको ग़ज़ल से भिन्न विधा मानें
वीरेन्द्र जैन

दुष्यन्त कुमार

आम तौर पर पारंपरिक उर्दू साहित्य के लोग हिन्दी ग़ज़ल को हीन दृष्टि से देख नाक भों सिकोड़ते हैं। उनके पास ग़ज़ल को मापने का जो पैमाना है उसके अनुसार वे ठीक ही करते हैं। किंतु उनके इस नाक भों सिकोड़ने के बाद भी आज हिंदी ग़ज़ल दूधों नहा कर पूतों फल रही है, हाँ रही बात अच्छी बुरी की, सो बड़े से बड़े शायर की भी सभी रचनाएँ एक जैसी श्रेष्ठता नहीं रखतीं तथा हर भाषा के लेखकों में स्तर भेद विद्यमान है आप किसी भाषा के खराब साहित्य को नमूने के तौर पर रख कर यह नहीं कह सकते कि यदि इस भाषा में लिखोगे तो ऐसा ही साहित्य निकलेगा।

वैसे तो ग़ज़ल भारतेन्दु हरिश्चन्द, मैथिली शरण गुप्त और निराला ने भी लिखी हैं तथा पंडित रघुपति सहाय फ़िराक़ तो निराला को छोड़ कर बाकी के हिन्दी लेखकों को माँ बहिन की गालियों के साथ याद करते थे। उनका कहना था कि उर्दू की जूतियों के चरमराने से जो आवाज़ आती है वह हिन्दी है। हो सकता है किसी समय उनकी बात सही रही हो और खड़ी बोली किसी की मातृभाषा न होने के कारण ऐसी बनावटी भाषा लगती रही हो जिसमें दिल की बात करना अस्वाभाविक लगने के  कारण उसकी कविता प्लास्टिक के फूलों जैसी लगती हो, किंतु खड़ी बोली वाली हिंदी आज लाखों लेागों की मातृभाषा बन चुकी है और वे इसी में पैदा होने के साथ साथ इसी भाषा में हँसने रोने लगे हैं। किसी भी भाषा के विकास में कुछ समय तो लगता ही है तथा खड़ी बोली को खड़े हुये अभी समय ही कितना हुआ है? सच तो यह है कि हिन्दी ग़ज़ल  हिन्दी कविता की केन्द्रीय विधा तब ही बन सकी जब खड़ी बोली ने लाखों लोगों के दैनिंदिन जीवन में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया।

बलवीर सिंह रंग, रामावतार त्यागी आदि ने दुष्यंत कुमार से भी पहले देवनागरी में हिंदुस्तानी भाषा की ग़ज़लें लिखना प्रारंभ कर दिया था पर इस विधा की हिंदी ग़ज़ल के रूप में पहचान दुष्यंत की लोकप्रियता के बाद उसी तरह की ग़ज़लों की बाढ़ आने के बाद ही हुयी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि पहली बार इस विधा को पुराने पैमाने पर नाप कर इसे खारिज करने के प्रयास भी हुये। इन प्रयासों में उसकी लोकप्रियता को नज़रअन्दाज़ किया गया। किसी भी लोकप्रिय विधा को आलोचक की छुरियाँ मार नहीं सकतीं अपितु कई बार तो उसकी लोकप्रियता के आगे वे छुरियाँ ही भोंतरी हो जाती हैं। हिन्दी ग़ज़ल के साथ भी ऐसा ही हुआ। साहित्य की सभी विधाएँ क्रमशः विकसित हुयी होंगीं और अपनी स्थापना के लिए सभी को पहले पहले ऐसे ही अस्वीकार के वाण झेलने पड़े होंगे।

ये नई ग़ज़ल पारंपरिक ग़ज़ल के बहर वज़न रदीफ़ काफ़िये मतले मक़्‍ते के नियमों का लगभग वैसा ही उल्लंघन कर रहीं थीं जैसा कि छंद मुक्त कविता वालों ने कभी छंद का किया था। पर इन लोगों की ये रचनाएँ लोगों  को पसंद आयीं व जिस छंदमुक्त नई कविता ने आम हिंदुस्तानी को कविता से दूर कर दिया था उसकी रुचियाँ फिर से कविता की ओेर लौटीं। उर्दू की परंपरागत ग़ज़ल के नियमों का उल्लंघन करने वालों ने भी आलोचकों की आपत्तियों को विनम्रतापूर्वक स्वीकारते हुये अपनी इन ग़ज़ल जैसी रचनाओं का नया नामकरण किया। हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार नीरज ने इसे गीतिका कहा तो किसी हास्यकवि ने उसे हजल का नाम दिया। व्यंगकारों ने उसे व्यंग़ज़ल कहा तो किसी ने उसे सजल कह दिया। पत्र पत्रिकाओं ने इसे आमतौर पर देवनागरी में लिखी ग़ज़ल ही मानते हुये ग़ज़ल या हिन्दी-ग़ज़ल का नाम देकर ही छापा। छन्दमुक्त नई कविता की तरह इसका कोई फार्म तय नहीं हुआ और यह हर तरह के  आकार प्रकार में ढल कर सामने आयी तथा दो तुकांत पंक्तियों के पाँच सात शेर नुमा जोड़ों को हिन्दी ग़ज़ल माना गया। यह देवनागरी में हिन्दी भाषा के शब्दों के आधिक्य वाली ग़ज़ल नहीं थी जैसेी कि कुछ लोगों को गलतफहमी है। ये ग़ज़लनुमा वे काव्य रचनाएँ हैं जो केवल कथ्य के आधार पर ही अपनी सफलता के सूत्र खेाजने बेसहारे खुले में निकल आयीं व जिन्दा बनी हुयी है। ऐेसी असुरक्षित दशा में इसका जिन्दा बने रहना इस बात का प्रमाण है कि इसमें जनभावनाओं के साथा एकाकार होने की ताकत है तथा सरकारी प्रोत्साहन, पुस्तकाकार प्रकाशन, और पुरस्कार के लालची टुकड़ों के बिना भी यह अपना अस्तित्व बचाये हुये है।

मुझे लगता है कि उर्दू ग़ज़ल के बारे में भरपूर ज्ञान होने और उस सन्दर्भ में लम्बी चर्चाओं के बाद दुष्यंत कुमार ने पूरे विश्वास के साथ इस क्षेत्र में अपने कदम रखे होंगे। यह बात न केवल साये में धूपकी उनकी भूमिका से ही प्रकट होती है अपितु उनके अनेक शेर भी आलोचनाओं के उत्तर देते से लगते हैं। भूमिका के अंश देखिये-

कुछ उरदू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है। उनका कहना है कि शब्द शहर नहीं होता है शह्र होता है, वज़न नहीं होता है वज़्न होता है।

-कि मैं उर्दू नहीं जानता लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि शहरकी जगह नगर लिख कर इस दोष से मुकित पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है जिस रूप में वे हिंदी में घुलमिल गये हैं।.............इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गयी हैं, जिसे मैं बोलता हूँ।

- कि ग़ज़ल की विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य रचना की है। हिंदी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आजमाया है। परंतु अपनी सामर्थ्य और सीमाओं को जानने के बाबजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारण ये है कि पत्र पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़ कर और सुनकर विभिन्न वादों, रुचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों, मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्मविश्वास दिया है।‘‘

 

यदि हम दुष्यंत को आज की हिंदी ग़ज़ल का अग्रदूत मानते हैं तो उपरोक्त पंक्तियों को इस विधा के सूत्र मान सकते हैं जिनके अनुसार बोलचाल व व्यवहार की भाषा का प्रयोग व कथ्य के आधार पर सम्प्रेषणीयता और जनप्रियता ही इसके प्राण तत्व हैं। उनके ही कुछ शेर देखें-

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

दुष्यंत की ग़ज़लें एक जनआंदोलन के लिए साथ जनता के साथ एकाकार होती उनके गले से लिपटती ग़ज़लें हैं-

मुझ में रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

और इस आंदोलन के लिए ग़ज़ल की भूमिका का औचित्य बताते हुये वे कह रहे हैं -

सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत

हर किसी के पास तो ऐसी नजर होती नहीं

वे नितांत व्यक्तिगत दर्द तक केन्द्रित ग़ज़ल के शायर नहीं हैं अपितु उनकी ओढ़ने बिछाने वाली ग़ज़लें हवाओं में घुल कर भी साँसों के द्वारा जीवन के साथ मिलती हैं-

जिन हवाओं ने तुझको दुलराया

उनमें मेरी ग़ज़ल रही होगी

उनकी ग़ज़लें ऊँघे हुये लोगों में चेतना के लिए भी काम करती हैं-

अब तड़फती सी ग़ज़ल कोई सुनाये

हमसफर ऊँघे हुये हैं अनमने हैं

उनकी ग़ज़लें फार्म की जकड़बन्दी को तोड़ कर स्वतंत्र रूप से व्यवहार करना चाहती है क्योंकि सिर्फ हंगामा खड़ा करना उनका मकसद नहीं है अपितु वे सूरत बदलना चाहते हैं इसलिए कहते हैं कि-

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में

हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं

वे पुराने ग़ज़लकारों पर व्यंग्य करते हुये नये लोगों को सावधान करते हुये कहते हैं कि-

इस दिल की बात कर तो सभी दर्द मत उड़ेल

अब लोग टोकते हैं कि ग़ज़ल है कि मर्सिया

हिन्दी ग़ज़ल के पितृ पुरूष के ये सीधे संवाद करते शेर हिन्दी ग़ज़ल की भूमिका हैं जो उसे पुरानी ग़ज़ल से अलग करते हुये एक नई विधा का रूप देते हैं भले ही वह किसी भी लिपि में लिखी गयी हो।


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