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| 03.22.2008 |
| दौड़ कर बाप से लिपटा बच्चा वीरेन्द्र जैन |
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दौड़ कर बाप से लिपटा बच्चा
जैसे चुम्बक चिपक गया सिक्का खत है उनका तो वो धरोहर है छोड़िये भी कि उसमें क्या लिक्खा एक हम पर निगाह उड़ती सी बात कितनी बड़ी है अलबत्ता आपका द्वार आपकी चौखट अपनी काशी यही, यही मक्का वो तो अब आसमान में होगा जो गिरा खा के इश्क में धक्का |
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